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शरद पूर्णिमा और कोजागिरी व्रत: जानिए क्यों चांद की रोशनी में रखा जाता है मसाला दूध, क्या है इसका धार्मिक महत्व?

कोजागिरी पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा के दिन चांद की रोशनी में मसाला दूध रखने की परंपरा है. इस खबर में हम इस दिन के धार्मिक महत्व, पौराणिक कथा और आयुर्वेदिक फायदे के बारे में डिटेल से बताएंगे.

Written By Harsh Singh
Published: Oct 21, 2026, 03:12 PM IST | Updated: Oct 21, 2026, 03:30 PM IST
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अश्विन माह की पूर्णिमा को बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन को कोजागिरी पूर्णिमा या शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है.

दशहरा के त्योहार के बाद ये पूर्णिमा आता है. भारत के हर राज्यों में इसे मनाने के अलग-अलग तरीके हैं.

लेकिन एक बात हर जगह एक सी होती है. इस दिन लोग दूध या खीर का सेवन बड़े चाव से करते हैं.

इस खबर में हम आपको बताएंगे कि कोजागिरी पूर्णिमा को क्यों इतना खास माना जाता है और इस दिन महाराष्ट्र में चांद की रोशनी में मसाला दूध क्यों रखा जाता है.

इस साल कब है कोजागिरी पूर्णिमा का पर्व?

पंचांग के मुताबिक, इस साल तो ये तिथी 25 अक्टूबर को है. कथाओं की मानें तो, तो इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान धन की देवी मां लक्ष्मी प्रकट हुई थी.

बस इसी वजह से शरद पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी की खास पूजा की जाती है. इसके साथ एक और कहानी है कि इसी रात भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महाकाली के तट पर रासलीला रचाई थी.

महाराष्ट्र में मसाला दूध रखने की अनूठी परंपरा

चांद की रोशनी में मसाला दूध रखने की परंपरा की बात करें तो ये सदियों से महाराष्ट्र में चलती आ रही है.

इस समय में मौसम में हल्की-हल्की ठंड की शुरूआत हो जाती है. जिसके वजह से हमारे शरीर को पोषण की जरूरत पड़ती है.

जैसा की हम जानते हैं दूध में कैल्शियम बहुत होता है. जो हमारे शरीर को बहुत बना सकता है. इसलिए इस खास मौके लोगो दूध से बनी चीजों का सेवन करने की सलाह देते हैं.

सेहत से जुड़ा है मसाला दूध बनाने का ये तरीका

इस दिन दूध में बहुत सारे पौष्टिक चीजों को मिलाया जाता है. इसमें बदाम, काजू, पिस्ता जैसे सूखे मेवे डाले जाते हैं.

साथ में स्वाद और सेहत के लिए इसमें इलायची पाउडर, दालचीनी और चारौली डाली जाती है.

इन चीजों को मिलाने के बाद दूध की ताकत बढ़ जाती है. इस दूध को पीने से शरीर में गजब की ताकत आती है.

चांद की चांदनी में दूध रखने के पीछे का आयुर्वेदिक कारण

शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी पूरी सोलह कलाओं से पूरा होता है. कहा जाता है इस रात चांद की रोशनी अमृत के समान होता है.

ऐसा माना जाता है कि इस रात दूध को बाहर रखने से चांद के औषधीय गुण दूध में समा जाते हैं.

जब लोग ऐसे दूध को पीते हैं तो, उनके शरीर पॉजिटिव एनर्जी का फ्लो बढ़ जाता है. इसलिए ऐसा करना इस रात को जरूरी होता है. 

(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों, लोक मान्यताओं और आयुर्वेदिक परंपराओं पर आधारित है.
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About the Author

हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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