शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है. धार्मिक मान्यताएं हैं कि चंद्रमा की 16 कलाएं उसे पूर्णता देती हैं. ये कलाएं चंद्रमा की 16 अलग-अलग स्थिति को बताती हैं. ये कलाएं चंद्रमा को कैसे मिलीं, इसका किन देवी-देवताओं से संबंध और चंद्रमा की ये 16 कलाएं कैसे मानव जाती पर भी अपना गहरा प्रभाव डालती हैं? इन सभी जानकारियों को आइए इस लेख में विस्तार से जानें.
चंद्रमा को 16 कलाएं मिलने को लेकर कई धार्मिक मान्यता हैं. जिनमें से एक मान्यता ये भी है कि भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा ने चंद्रमा को ये 16 कलाएं दीं जो कलाएं बताती हैं कि जिस तरह चंद्रमा शून्य से पूर्णता की ओर बढ़ता है और फिर शून्य हो जाता वैसे ही प्रकृति में भी हर जीव और ऋतु का चक्र शून्य से पूर्णता की ओर और फिर शून्य की ओर चलता है.
चंद्रमा की सोलह कलाओं के नाम जानिए
अमृत, मनदा (विचार), पुष्प (सौंदर्य), पुष्टि (स्वस्थता), तुष्टि( इच्छापूर्ति)
ध्रुति (विद्या), शाशनी (तेज), चंद्रिका (शांति), कांति (कीर्ति)
ज्योत्सना (प्रकाश), श्री (धन), प्रीति (प्रेम), अंगदा (स्थायित्व)
पूर्ण (पूर्णता अर्थात कर्मशीलता) और पूर्णामृत (सुख)
शुक्ल पक्ष की 15 तिथियां है जो प्रतिपदा से शुरू होकर पूर्णिमा तक होती है और एक अमावस्या या पूर्णिमा का पूर्ण चक्र जब मिलता है तो चंद्रमा की 16 कलाएं बनती हैं. जिस प्रकार चंद्रमा का प्रकाश कम और ज्यादा होता है वैसे ही मानव मन और चेतना की भी अवस्थाएं पल-पल बदलती हैं. वैदिक ज्योतिष में मन का कारक चंद्रमा है यानी व्यक्ति के मन पर चंद्रमा गहरा प्रभाव होता है. चंद्रमा की 16 कलाएं मनुष्य की चेतना, भावनाओं से लेकर स्मृति और आत्मिक विकास के अलग-अलग 16 स्तरों को दर्शाती हैं.
पौराणिक कथा है कि चंद्र देव का विवाह राजा दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों से हुआ. यही 27 नक्षत्र हैं. हालांकि चंद्रमा का विवाह 27 कन्याओं से हुआ लेकिन उनका प्रेम और झुकाव रोहिणी के प्रति अधिक था. जिससे अन्य पत्नियों में असंतुष्टि का भाव आया और उन्होंने अपने पिता दक्ष प्रजापति से शिकायत कर दी. फिर क्या था राजा ने पहले तो चंद्र देव को समझाया लेकिन चंद्र देव का व्यवहार नहीं बदला. जिससे राजा दक्ष ने क्रोधित होकर चंद्र देव को श्राप दिया कि उन्हें क्षय रोग हो जाएगा यानी दिन-प्रतिदिन उनका शरीर व कलाएं क्षीण होंगी. इस श्राप से चंद्रमा का शरीर कम होने लगा और 16 कलाएं खत्म होने लगीं. जिससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा. इस परेशानी से उबरने के लिए चंद्र देव ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की. उनके तप से अंततः भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें मिले श्राप से उनकी रक्षा की. शिवजी ने एक नियम तय किया कि कृष्ण पक्ष में चंद्र देव की एक-एक कला हर दिन कम होती जाएगी और शुक्ल पक्ष में हर दिन एक-एक कला फिर से बढ़ जाएगी. चंद्र देव को भगवान शिव ने यह आशीर्वाद भी दिया कि कि घटने और बढ़ने की तुम्हारी यह प्रक्रिया ही तुम्हारी तुम्हारी विशिष्ट कला या विद्या जानी जाएगी. इस तरह चंद्र फिर से अपनी 16 कलाओं को प्राप्त कर पाए. चंद्र देव के कष्टों को दूर करने के लिए शिवजी ने चंद्र देव को अपने मस्तक पर धारण कर लिया.
भगवान श्रीकृष्ण को "पूर्णावतार" कहा गया है यानी विष्णु जी का एक ऐसा अवतार जो पूरी तरह से संपूर्ण हों. धार्मिक मान्यता है कि उनमें चंद्रमा की संपूर्ण 16 कलाएं हैं. से चंद्रमा की 16 कलाएं होती हैं और पूर्णिमा के दिन उसकी कला परिपूर्ण होता है वैसे ही श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व भी उनमें दिव्य गुण और शक्तियां विद्यमान हैं.
देवी भगवती की महाविद्याओं में से एक मां त्रिपुर सुंदरी का भी 16 कलाओं से संबंध है. मां त्रिपुर सुंदरी को 16 कलाओं की साम्राज्ञी माना गया है. देवी को सोलह का अंक अति प्रिय है.
Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक ग्रंथों पर आधारित है। इसकी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है। किसी भी उपाय से पहले विशेषज्ञ से सलाह लें.