)
सनातन परंपरा में शंख अति पवित्र माना जाता है. यह केवल नाद की वस्तु नहीं है बल्कि इसकी ध्वनि विजय और पवित्रता को दर्शाती है. शंखों का वर्णन जब भी होता है तो पाञ्चजन्य शंख के बारे में जरूर बात होती है.धार्मिक मान्यता है कि इस शंख की गूंज में ऐसी शक्ति है जो सभी नकारात्मक ऊर्जा का नाश कर देती थी. पाञ्चजन्य शंख का भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण से गहरा संबंध है. इसकी दिव्यता और पवित्रता के साथ ही इसके नाद की चर्चा दूर-दूर तक होती है. पाञ्चजन्य शंख की उत्पत्ति कैसे हुई, राक्षस के वध और यमलोक के हिलने से जुड़ी क्या कथा है और महाभारत से इस शंख का क्या संबंध है? आइए इस बारे में विस्तार से जानें.
पाञ्चजन्य बहुत ही दुर्लभ और पवित्र शंख है जिसकी उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी. समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों में से एक शंख को जब समुद्र मंथन से निकाला गया तो भगवान विष्णु ने इसे धारण किया. मां लक्ष्मी और पाञ्चजन्य शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी, यही कारण है कि इन दोनों के बीच भाई-बहन का रिश्ता है. समुद्र मंथन में पांच जन शामिल थे- सुर, असुर, नाग, गरुड़ और ऋषि-मुनि. यही कारण है कि इस शंख को पांचजन्य शंख नाम दिया गया.
शंखासुर राक्षस वध की कथा में ही पाञ्चजन्य शंख की उत्पत्ति की एक और कथा भी शामिल है. कथा है कि श्रीकृष्ण जब गुरुकुल में थे और उनकी शिक्षा पूर्ण हो गई तब उनके गुरु सांदीपनि ने उनसे दक्षिणा में अपने पुत्र को मांगा. जी हां, हुआ ये था कि गुरुदेव का पुत्र समुद्र में डूब गया था जिसे शंखासुर राक्षस ने निगल लिया. जब गुरु ने दक्षिणा में अपने पुत्र को मांगा तो श्रीकृष्ण ने गुरु दक्षिणा देने का वचन दिया. गुरु सांदीपनि के पुत्र को खोजने के लिए श्रीकृष्ण और बलराम भैया समुद्र में उतरे और शंखासुर राक्षस से कहा कि हे राक्षस, तुम हमें गुरुपुत्र को लौटा दो. राक्षस कहां सुनने वाला था उसने श्रीकृष्ण और भैया बलराम को युद्ध के लिए ललकारा. युद्ध शुरू हुआ और राक्षस को दोनों ने हरा दिया.
आगे राक्षस ने बताया कि उनके गुरु का पुत्र तो यमलोक चला गया है. फिर क्या था श्रीकृष्ण ने राक्षस का वध किया और जिसके शरीर से पांचजन्य शंख की उत्पत्ति हुई जिसे भगवान ने अपने पास ही रख लिया और यमलोक पहुंच गए. फिर क्या था क्रोध से भरे हुए भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य शंख का नाद किया जिससे पूरा यमलोक भय से डोल गया. भय में डूबे यमराज ने गुरु सांदीपनि के पुत्र को श्रीकृष्ण को सौंप दिया जिसे वे धरती पर लेकर आ गए. श्रीकृष्ण ने गुरु को उनका पुत्र और शंख दोनों ही उन्हें भेंट कर दिए. गुरु सांदीपनि ने अपने शिष्य से प्रसन्न होकर उन्हें पाञ्चजन्य शंख लौटा दिया. तब से हमेशा के लिए पाञ्चजन्य शंख कृष्ण के पास ही रहा. ऐसी मान्यता है कि गुरु की आज्ञा से उन्होंने पाञ्चजन्य शंख का नाद किया था जिससे पुराने युग की समाप्ति हुई और नया युग शुरू हुआ.
विजय, कीर्ति, यश और मंगल का प्रतीक पांचजन्य शंख की कई विशेषताएं बताई जाती हैं. आइए इसके बारे में एक-एक कर के जानें.
पांचजन्य शंख की ध्वनि कई किलोमीटर सुनी जा सकती थी.
पांचजन्य शंख नाद इतना तेज था कि लगता था जैसे 1000 शेरों की गर्जना हो रही है.
महाभारत युद्ध में कृष्ण ने इसी शंख का नाद 18 दिन तक किया था.
युद्ध की सुबह शुरुआत और अंत शाम को इसी शंख के शंखनाद के साथ होता था.
जैसे ही सुबह पांचजन्य शंख बजता था वैसे ही पांडव उत्साहित होते थे और कौरव भय से भर जाते थे.
पांचजन्य शंख विजय व सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
पाञ्चजन्य शंख अब भी हैं लेकिन ये चमत्कारिक नहीं हैं.
हालांकि, जिस घर में पाञ्चजन्य शंख होता है वहां पर किसी भी तरह के वास्तु दोष नहीं लगता है.
जिस घर में पाञ्चजन्य शंख होता है वहां पर राहु और केतु के दुष्प्रभाव भी खत्म होने लगते हैं.
(डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक ग्रंथों, पौराणिक मान्यताओं और जनश्रुतियों पर आधारित है. इसकी सत्यता का दावा नहीं किया जाता।. किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपने धर्मगुरु या ज्योतिषाचार्य से सलाह अवश्य लें.)