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रामायण में सोने की लंका के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन रामायण में एक और सोने का शहर था जिसके बारे में आपको नहीं पता होगा.
जहां सीता माता को खोजने गए वानरों को एक तपस्विनी मिली थी. जिनकी वजह से वानर सेना की जान बच पाई थी.
माता सीता के हरण होने के बाद, सुग्रीव ने चारों दिशाओं में माता सीता को खोजने के लिए अपनी सेना को भेज दिया था.
दक्षिण दिशा में जो टोली गई थी, उसका नेतृत्व बालि पुत्र अंगद कर रहे थे. इस टोली में हनुमान जी और जाम्बवंत जैसे बड़े योद्धा शामिल थे.
विंध्याचल के जंगलों में कई दिनों तक घूमते-घूमते ये वानर टोली भूख और प्यास से बहुत ज्यादा परेशान हो गई.
तभी पानी खोजते हुए उनकी नजर एक बहुत बड़ी और डरावनी गुफा पर पड़ी, जिसे ऋक्षबिल कहा जाता था.
उस गुफा से जलपक्षी बाहर निकल रहे थे, जिसे देखकर वानरों को अंदर पानी होने की उम्मीद जगी और वे सब उस गुफा के अंदर चले गए.
जब सेना अंदर पहुंचे तो वहां का नजारा देख हैरान हो गई. बाहर से इतना भयानक दिखने वाली उस गुफा के अंदर एक बहुत सुंदर सोने का शहर बसा हुआ था.
इस शहर को मय दानव ने बनाया था, जहां सोने-चांदी के महल और मीठे पानी के तालाब थे.
उसी जगह पर चेहरे पर तेज लिए एक तपस्विनी ध्यान में बैठी थीं. वे महातपस्वी मेरुसावर्णि की पुत्री स्वयंप्रभा थीं, जो अप्सरा हेमा के उपवन की रखवाली कर रही थीं.
वानरों की हालत देखकर उन्होंने आने का कारण पूछा और हनुमान जी ने उन्हें बताया कि वे भगवान राम के दूत हैं.
श्रीराम जी का नाम सुनकर वो खुश हो गईं. फिर क्या था उन्होंने बहुत प्रेम और आदर के साथ पूरी वानर सेना को मीठा पानी पिलाया और दिव्य फल खिलाए.
इससे वानर सेना की सारी थकान, भूख और प्यास दूर हो गई. जब वानरों ने गुफा से बाहर निकलने का रास्ता पूछा, तो स्वयंप्रभा ने बताया कि ये मय दानव की मायावी गुफा है.
इस गुफा के अंदर आने के बाद कोई भी जीवित बाहर नहीं जा सकता है. ये बात सुनकर वानर सेना बहुत निराश हो गई क्योंकि सुग्रीव द्वारा दी गई समय-सीमा भी खत्म हो रही थी.
वानरों को परेशान देखकर तपस्विनी ने कहा कि वे भगवान राम के लिए काम कर रहे हैं, इसलिए वो उनकी मदद करेंगी.
उन्होंने सभी वानरों से अपनी-अपनी आंखें बंद करने के लिए कहा. जैसे ही वानरों ने आंखें बंद कीं, स्वयंप्रभा ने अपनी योगमाया से पूरी सेना को उस गुफा से बाहर निकाल दिया.
सभी वानरों ने अपनी आंखें बंद कर ली, और जब उन्होंने अपनी आंखें खोली तो वो समुद्र के किनारे यानी महेंद्र पर्वत के पास पाया. अगर उस दिन स्वयंप्रभा मदद न करतीं, तो वानर सेना कभी बाहर नहीं आ पाती.
वानर सेना के बाहर आने के बाद उनकी मुलाकात जटायु के भाई संपाती से हुई थी. संपाती के पास दूर दृष्टि थी. उन्होंने ही वानर सेना को बताया था कि माता सीता समुद्र पार लंका के अशोक वाटिका में सुरक्षित हैं.
इस तरह ततपस्विनी स्वयंप्रभा का ये योगदान रामायण में बहुत ही बड़ा और जरूरी साबित हुआ था.
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं. विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें.