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Pitru Paksha 2026: पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म का जिक्र आते ही बिहार राज्य के एक शहर का नाम दिमाग में आता है. पितृपक्ष के दिनों में फल्गु नदी के तट पर बसे इस शहर में खूब चहल-पहल होती है. दरअसल गया शहर में पिंडदान करने का बड़ा महत्व है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या पर गया में पूर्वजों का पिंडदान करने से 108 कुल और 7 पीढ़ियों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. पितरों की आत्मा शांत होती है. यही कारण है कि गया को मोक्ष स्थली भी कहते हैं. ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों गया में ही पिंडदान किया जाता है. गया में पिंडदान करने का महत्व और इसस जुड़ी कथा क्या है? आइए इस बारे में इस लेख में विस्तार से जानें.
देशभर में श्राद्ध कर्म और पिंडदान करने के लिए अनेक स्थान बताए गए हैं जिनमें से एक है गया जिसे पिंडदान के लिए सर्वोपरि माना गया है. गया ही वो स्थान है जहां पर अपने पूर्वजों का पिंडदान और तर्पण कर देने के बाद व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो पाता है. गया में ही पिंडदान करना इसलिए सबसे शुभ बताया गया है क्योंकि यहीं फल्गु नदी के तट पर राम जी और माता जी ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति व मोक्ष के लिए श्राद्ध कर्म किया और उनके निमित्त पिंडदान किया. वहीं महाभारत काल में पांडवों ने यहीं अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म किया था.
गयासुर नाम का एक असुर हुआ करता था जिसने कठिन तप करके विष्णु जी को प्रसन्न किया और उनसे वरदान मांगा. विष्णु जी से गयासुर ने कहा कि प्रभु आप मुझे वरदान दें कि मेरा शरीर देवी-देवताओं से भी अधिक पवित्र हो जाए. इतना पवित्र हो जाए कि लोग मेरे दर्शन मात्र से अपने सभी पापों से मुक्त हो जाएं. इस वरदान के बाद लोगों के मन से पाप करने और उसका दंड भुगतने का भय समाप्त होने लगा. लोग पाप कर्म करते और फिर गयासुर के दर्शन कर पाप से मुक्त हो जाते. ऐसा कर पापी भी स्वर्ग पहुंच लगे. जिससे स्वर्ग-नरक और पाप-पुण्य का संतुलन बिगड़ने लगा. बड़े से बड़ा पापी भी स्वर्ग को प्रस्थान कर जाता. फिर क्या था देवताओं ने इस समस्या के निवारण के लिए एक योजना बनाई. देवताओं ने गयासुर के पास जाकर उससे यज्ञ के लिए पवित्र स्थान मांगी. ऐसे में गयासुर ने कहा मेरा शरीर पवित्र स्थान है आप सब मेरे शरीर के ऊपर ही यज्ञ कर लें. फिर क्या था गयासुर लेट गया. उसका शरीर इतना बड़ा था कि पांच कोस तक फैल गया. उत्तर की तरफ पांव और दक्षिण की ओर मुख करके गयासुर लेटा और उसके शरीर पर देवताओं ने यज्ञ किया. गयासुर की निष्ठा और त्याग को देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हो गए. उन्होंने उसे वरदान दिया कि उसके शरीर पर पिंडदान करने से पितरों को मुक्ति मिलेगी. आगे चलकर इस पांच कोस की भूमि पर गया शहर बस गया. गयासुर के पुण्य प्रभाव से यह एक तीर्थ के रूप में जाना जाता है. गया में भगवान विष्णु गदाधर स्वरूप में हैं.
(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)