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Death During Pitru Paksha Niyam: पितृ पक्ष में पितृ का तर्पण करने का विधान है. इस दौरान पितरों के श्राद्ध से उनकी तृप्ति और मुक्ति का रास्ता खुलता है. इस अवधि में पूर्वजों को याद किया जाता है और उन्हें सम्मान दिया जाता है. हालांकि, पितरों की तृप्ति के लिए सभी कर्म कांड किए जाते हैं. प्रश्न ये है कि पितृ पक्ष में घर के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाना शुभ होता है या अशुभ, ऐसा होना घर-परिवार के लिए भाग्यशाली या दुर्भाग्यशाली होता है? आइए इस बारे में विस्तार से जानें.
पितृ पक्ष में शुभ और मांगलिक कार्यों को करने की मनाही होती है. यह समय पितरों को सम्मान देने का है. लेकिन इस अवधि में घर के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए तो इसे शुभ माना जाता है या अशुभ. दरअसल, पितृ पक्ष के दौरान भी लाखों लोगों की मृत्यु होती होगी. शास्त्रों की मानें तो पितृ पक्ष में जिनकी मृत्यु होती है उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है. पितृ पक्ष में पितर अपने लोक से या सवर्ग लोग से पृथ्वी पर तर्पण ग्रहण करने आते हैं. जिसके कारण स्वर्ग लोक का द्वार खुला रहता है. ऐसे में पितृ पक्ष में जिनकी मृत्यु होती है वो सीधे स्वर्ग पहुंचते हैं. पितृ पक्ष में अगर घर के किसी सदस्य की प्राकृतिक मृत्यु होती है तो उसे शुभ माना जाता है. वो आत्मा पूर्वजों की आत्माओं सेमिलती हैं और उनके आध्यात्मिक यात्रा और आत्म-सुधार में मदद मिलता है.
गरुड़ पुराण के अनुसार, पितृ पक्ष में घर के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए तो उसके श्राद्ध कर्म को हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया गया है. मान्यताओं के अनुसार ऐसे लोगों की आत्मा देव तुल्य हो जाती है. ऐसे पितृ के श्राद्ध कर्म करने से घर में सुख-समृद्धि उसके परिवार के लोगों की तरक्की होती है. घरवालों के कर्म सुधरने लगते हैं.
गरुड़ पुराण की मानें तो जिन भी लोगों की पितृ पक्ष में अकाल मृत्यु होती है उनका पितृ पक्ष में मरना सही नहीं माना जाता. अकाल मृत्यु से मरने वालों की आत्मा अशांत रह जाती है और परिवार वालों को पितृ दोष भी लग सकता है. पितृ पक्ष में अकाल मृत्यु पाने वालों का अंतिम संस्कार सामान्य रूप से नहीं होता है. उसके दाह-संस्कार की विधि भी बदल जाती है. इस अवधि में अकाल मृत्यु हो तो घर पर श्राद्ध और पिंडदान नहीं किया जाता है, बल्कि व्यक्ति का पिंडदान बिहार के गया जाकर किया जाता है. तभी उनकी आत्मा को शांति मिलती है.
(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)