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जंगलों के बीच बसा है रहस्यमयी मंदिर... माता रानी खुद देती हैं अपनी मौजूदगी का सबूत; जानिए मचैल माता का इतिहास

इस खबर में हम जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में स्थित मचैल माता मंदिर में जानेंगे. जहां माता अपने आभूषण को हिलाकर आशीर्वाद देती हैं.

Written By Harsh Singh
Published: Oct 10, 2026, 02:47 PM IST | Updated: Oct 10, 2026, 03:03 PM IST
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अगर आप जम्मू-कश्मीर को सिर्फ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जानते हैं तो आज हम आपको एक और सबसे रहस्यमयी मंदिर के बारे में बताएंगे.

ये मंदिर किश्तवाड़ जिले में ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच मचैल गांव में बसा हुआ है. इसी गांव में एक मंदिर है जहां मां चंडी की पूजा होती है.

इस मंदिर की महिमा पूरे देश में फैली हुई है. वहां के लोगों का मानना है कि वहां माता रानी अपने आभूषणों को खुद हिलाकर भक्तों को अपनी मौजूदगी का अहसास कराती हैं.

कंगन में बंधे घुंघरू हों या कानों के कुंडल, इनके हिलने को श्रद्धालु देवी मां का सीधा आशीर्वाद मानते हैं.

इतना ही नहीं नवरात्रि और सालाना छड़ी यात्रा के समय यहां भक्ति का एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है. आज हम इस मंदिर के बारे में डिटेल से जानेंगे.

जानिए हिलते आभूषणों का अनोखा रहस्य

वहां के भक्तों का दावा है कि देवी के गहनों को उन्होंने अपने आप हिलते हुए देखा है. लोग इसे माता का चमत्कार मानते हैं.

सुरत से आए एक भक्त की कहानी वहां बहुत फेमस है. कहते हैं कि उसने अपनी आंखें बचपन से खो दी थी.

जब वो भक्त दर्शन करने पहुंचा तो उसके आंखों की रोशनी वापस आ चुकी थी. ऐसे ही कई लोगों के बारे में कहानियां सुनने को मिलती हैं.

गर्भगृह में विराजित पिंडी स्वरूप

मंदिर के बाहर लकड़ी पट्टियां हैं जिसपर देवी-देवताओं की सुंदर नक्काशी की गई है.  गर्भगृह के भीतर मां चंडी एक पवित्र पिंडी के रूप में हैं.

उसी पिंडी के पास दो और मूर्तियां रखी हैं. जिसमें एक मूर्ति चांदी की है. मूर्ति को लेकर मान्यता है कि उसे जंस्कार क्षेत्र से आए बौद्ध श्रद्धालुओं ने भेंट किया था.

इसी वजह से इस मूर्ती को भोट मूर्ति कहा जाता है. इन मूर्तियों को मंहगे आभूषणों से सजाया गया है.

डोगरा सेनापति जोरावर सिंह का इतिहास

मचैल माता धाम का इतिहास वीरता और गहरी आस्था से भरा हुआ है. कहा जाता है कि साल 1834 में प्रसिद्ध डोगरा सेनापति जनरल जोरावर सिंह ने लद्दाख फतह करने से पहले यहां आकर मां चंडी का आशीर्वाद लिया था.

इसके बाद साल 1981 में ठाकुर कुलवीर सिंह ने मां के दर्शन किए और 1987 से आधिकारिक रूप से छड़ी यात्रा की शुरुआत की.

आज यह छड़ी यात्रा बहुत बड़े पैमाने पर आयोजित की जाती है, जिसमें देशभर से श्रद्धालु शामिल होकर पुण्य कमाते हैं.

हेलीकॉप्टर सेवा भी है उपलब्ध

पहले के समय में गुलाबगढ़ से मचैल गांव तक लगभग 30 से 32 किलोमीटर का कठिन पहाड़ी रास्ता पैदल तय करना पड़ता था.

घने जंगलों और सीधे पहाड़ों के बीच यह यात्रा काफी जोखिम भरी होती थी. लेकिन अब सड़कों का बने होने से श्रद्धालुओं का सफर काफी आसान हो गया है.

इसके अलावा मौसम ठीक रहने पर श्रद्धालु हेलीकॉप्टर सेवा का लाभ भी ले सकते हैं. यात्रा पर निकलने से पहले स्थानीय प्रशासन से रास्ते और मौसम की सही जानकारी लेना जरूरी है.
ये भी पढ़ें: उम्मीद की नई किरण: 34 साल बाद खुला ऐतिहासिक शीतलनाथ मंदिर, कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की जगी आस

(Disclaimer): यह लेख स्थानीय धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक प्रसंगों और जम्मू-कश्मीर पर्यटन विभाग की सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है.

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About the Author

हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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