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अगर आप कभी हिमाचल प्रदेश की यात्रा पर जा रहे हैं, तो ऊना जिले में स्थित माता चिंतपूर्णी के मंदिर के दर्शन का प्लान जरूर बनाना चाहिए. ये मंदिर उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध और पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाता है.
ये पावन धाम चारों तरफ से सुंदर पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है. चिंतपूर्णी नाम का सीधा सा मतलब है, भक्तों की सभी चिंताओं को दूर करने वाली देवी.
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, यहां माता सती के पवित्र चरण गिरे थे. देवी चिंतपूर्णी को यहां छिन्नमस्तिका के नाम से भी पूजा जाता है.
माता चिंतपूर्णी मंदिर की खोज के पीछे 14वीं शताब्दी की एक बहुत ही प्रसिद्ध कहानी जुड़ी है. पटियाला के पास अठूर गांव में जन्मे माई दास जी दुर्गा मां के बहुत बड़े भक्त थे.
जब उनके भाइयों ने उन्हें परिवार से अलग कर दिया, तब भी उन्होंने पूजा-पाठ का रास्ता नहीं छोड़ा. एक बार अपने ससुराल जाते समय वो छपरोह के जंगलों में एक बड़े बरगद के पेड़ के नीचे आराम करने लगे.
थकावट की वजह से जब उन्हें नींद आई, तो सपने में देवी मां ने उन्हें दर्शन दिए और उसी पेड़ के नीचे अपनी पिंडी बनाकर पूजा करने को कहा.
जब माई दास जी ने देवी मां से कहा कि इस घने जंगल में पीने के लिए पानी भी नहीं है, तब मां दुर्गा ने उन्हें रास्ता दिखाया.
देवी के कहने पर माई दास जी ने पास में पड़ा एक भारी पत्थर हटाया, तो उसके नीचे से साफ पानी का झरना बह निकला.
आज भी मंदिर परिसर में वह सुंदर तालाब मौजूद है, जिसके जल से माता का अभिषेक किया जाता है. जिस पत्थर को हटाकर पानी निकला था, वो चमत्कारिक पत्थर आज भी मंदिर में दर्शन के लिए रखा गया है.
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, जब देवी चंडी ने राक्षसों का वध कर दिया, तो उनके साथ रहने वाली दो सहेलियों को बहुत तेज भूख और प्यास लगी.
उनकी प्यास बुझाने के लिए देवी ने अपना ही सिर काट लिया और बहती हुई रक्तधारा से उनकी प्यास शांत की. इसी वजह से देवी के इस रूप को छिन्नमस्तिका कहा गया.
इसके अलावा, चिंतपूर्णी धाम चारों तरफ से चार शिव मंदिरों, कालेश्वर महादेव, शिववाड़ी, नारायण महादेव और मुचकुंद महादेव से घिरा हुआ है.
चिंतपूर्णी पहुंचने के लिए चंडीगढ़, दिल्ली, शिमला, धर्मशाला और होशियारपुर से सीधी बसें मिल जाती हैं. यहां साल में तीन बार, चैत्र, सावन और अश्विन महीने के नवरात्रों में बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों भक्त पहुंचते हैं.
यात्रियों के ठहरने के लिए बस अड्डे और मंदिर के पास कई अच्छी धर्मशालाएं बनी हुई हैं. जब आप मुख्य मंदिर के अंदर जाते हैं, तो पहले आपको लक्ष्मी नारायण जी के दर्शन होते हैं, जिसके बाद मां चिंतपूर्णी की पवित्र पिंडी के दर्शन मिलते हैं.
साल 1987 से चिंतपूर्णी मंदिर की पूरी देखरेख हिमाचल प्रदेश सरकार के हाथों में है. इसके लिए एक सरकारी ट्रस्ट बनाया गया है, जिसके मुख्य अधिकारी ऊना जिले के कलेक्टर होते हैं.
वहीं स्थानीय एसडीएम और तहसीलदार मंदिर की रोजमर्रा की व्यवस्थाओं का ध्यान रखते हैं, ताकि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को दर्शन करने में कोई परेशानी न हो और सुरक्षा के पूरे इंतजाम रहें.
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(Disclaimer): यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग की जानकारियों पर आधारित एक विवरणात्मक रिपोर्ट है. इसका उद्देश्य पाठकों तक भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों से जुड़ी सही जानकारी पहुंचाना है.