त्रिशूल मारते ही फूट पड़ी थी पानी की धार... सोलन का वो 'जटोली मंदिर', जहां पत्थरों से आती है डमरू की आवाज
हिमाचल के सोलन में स्थित 122 फीट ऊंचे जटोली शिव मंदिर में पत्थरों को छूने पर डमरू की आवाज आती है. इस खबर में स्फटिक शिवलिंग और चमत्कारी जल कुंड के पूरे इतिहास के बारे में जानेंगे.
हिमाचल प्रदेश का सोलन शहर अपनी सुंदर पहाड़ियों के लिए जाना जाता है. लेकिन कुछ ही लोगों को पता होगा कि यहां एक बेहद खास धार्मिक स्थल भी है.
सोलन से करीब 7 किलोमीटर की दूरी पर एशिया का सबसे ऊंचा जटोली शिव मंदिर स्थित है. पौराणिक मान्यताओं के हिसाब से यहां भगवान शिव ने आराम किया था.
लंबी और घनी जटाओं को खोलकर यहीं भोलेनाथ सो गए थे. जिसके वजह से इस इलाके का नाम जटोली पड़ गया.
फिर साल 1950 के आसपास सिद्ध संत स्वामी श्री कृष्णानंद परमहंस जी यहां आएं. इस जगह की दिव्य शांति को महसूस कर उन्होंने यहां की एक गुफा में कई सालों तक कठोर तपस्या की.
बाद में स्वामी जी के मार्गदर्शन में ही इस विशाल मंदिर की बनाने का काम शुरू हुआ और 1974 में मंदिर निर्माण की नींव रखी गई.
39 सालों की लगातार मेहनत
इस बड़े देवालय को तैयार करने में कारीगरों और मंदिर समिति को लगभग 39 साल का लंबा समय लग गया.
बनाते समय ही 10 जुलाई 1983 को स्वामी कृष्णानंद परमहंस जी ने समाधि ले ली. इसके बाद भी मंदिर प्रबंधन समिति ने हार नहीं मानी और काम को लगातार जारी रखा.
आखिरकार साल 2013 में ये मंदिर पूरी तरह से बनकर तैयार हो गया. इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण इसका तीन मंजिला पिरामिड जैसा बना शिखर है.
मंदिर का शिखर 111 फीट ऊंचा है और इसके सबसे ऊपरी हिस्से पर एक सोने का सुंदर कलश स्थापित किया गया है.
कलश को मिलाकर इस मंदिर की कुल ऊंचाई लगभग 122 फीट हो जाती है. शिखर की दीवारों पर देवी-देवताओं, गंधर्वों और सुंदर फूलों की बारीकी से नक्काशी की गई है.
पत्थरों से आती है डमरू की थपकी
इस मंदिर के बारे में कुछ रहस्यमयी बातें भी कही जाती है. वो है इस मंदिर के दिवार में इस्तेमाल हुए पत्थरों के बारे में.
कहा जाता है इन पत्थरों को अगर आप थपथपाओगे तो उनमें से डमरू की अवाज आएगी. ये अवाज ऐसी होती है कि जैसे भगवन शिव ने डमरू बजाया हो.
इस चमत्कार को सुनने के लिए मंदिर में रोजाना दूर-दूर से शिवभक्त पहुंचते हैं. पत्थरों से निकलने वाली इस साउंड को सुनकर हर कोई भक्ति भाव से भर जाता है.
गर्भगृह में स्थापित है दुर्लभ स्फटिक शिवलिंग
इस मंदिर की एक और खास बात है. इसके पवित्र गर्भगृह में भगवान शिव का अत्यंत दुर्लभ और सुंदर स्फटिक का शिवलिंग स्थापित किया गया है.
हिंदू धर्म में स्फटिक को सबसे शुद्ध और पवित्र कहा जाता है. ये पत्थर सूरज की किरणों को अपनी तरफ खींचकर आसपास के पूरे वातावरण में पॉजटिव एनर्जी फैलाता है.
इतना ही नहीं शिवलिंग पर चांदी की बहुत ही आकर्षक और चमकीली जलहरी भी सजाई गई है.
गर्भगृह में कदम रखते ही श्रद्धालुओं को अद्भुत मानसिक शांति का अनुभव होता है और मन के सारे विचार एकदम शांत हो जाते हैं.
स्वामी जी के त्रिशूल से निकली थी जलधारा
इस मंदिर के परिसर में एक जल कुंड बना हुआ है. वहां के लोग इस कुंड के पानी को गंगाजल के तरह पवित्र मानते हैं.
कहा जाता है कि बहुत समय पहले जटोली गांव में पीने के पानी की भारी किल्लत हुआ करती थी. गांव वालों की इस परेशानी को दूर करने के लिए स्वामी कृष्णानंद जी ने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की.
शिव जी की कृपा से स्वामी जी ने जैसे ही अपने त्रिशूल से जमीन पर प्रहार किया, वहां से पानी की धारा बह निकली.
तब से लेकर आज तक ये कुंड हमेशा पानी से लबालब भरा रहता है. ऐसी मान्यता है कि इस कुंड का जल पीने और नहाने से त्वचा से जुड़े कई गंभीर रोग दूर हो जाते हैं.
मंदिर परिसर में आज भी सुरक्षित है वो दिव्य गुफा
जटोली शिव मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि ये आध्यात्म और शांति की तलाश करने वालों के लिए भी एक बेहतरीन जगह है.
मंदिर परिसर में आज भी वो प्राकृतिक गुफा पूरी तरह सुरक्षित रखी गई है, जहां स्वामी कृष्णानंद जी ध्यान लगाया करते थे.
महाशिवरात्रि और त्योहारों के मौकों पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों भक्त भगवान शिव का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं.
यदि आप भी कभी हिमाचल प्रदेश की यात्रा पर जाएं, तो सोलन के इस 122 फीट ऊंचे भव्य शिवधाम का दर्शन करना और इसके डमरू वाले पत्थरों को खुद महसूस करना बिल्कुल न भूलें.
(Disclaimer): यह लेख स्थानीय धार्मिक मान्यताओं, मंदिर प्रबंधन समिति के विवरणों और मीडिया रिपोर्ट्स में उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है.
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