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भारत में एक से एक रहस्यमयी मंदिर हैं, जो अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जाने जाते हैं. इन्हीं मंदिरों में से एक पूरी का फेमस जगन्नाथ मंदिर है.
जगन्नाथ मंदिर अपने कई रहस्यों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. यहां एक ऐसा खास नियम है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.
मंदिर में हर 12 से 19 साल के बीच एक ऐसी रहस्यमयी रात आती है, जब पूरे शहर की लाइट काट दी जाती है.
मंदिर के चारों तरफ कड़ी सुरक्षा लगा दी जाती है और उस समय हर तरफ सीआरपीएफ के जवान नजर आते हैं.
जब पूरी तरह अंधेरा हो जाता है, तब मंदिर के गर्भगृह के अंदर भगवान जगन्नाथ के सीने से एक रहस्यमयी चीज बाहर निकाली जाती है और उसे नई मूर्ति में स्थापित कर दिया जाता है.
अब आपके मन में भी ये सवाल उठ रहा होगा कि भगवान की मूर्ति को क्यों बदलना पड़ता है.
साथ ही, आखिर उस पुरानी मूर्ति के सीने के अंदर ऐसी क्या चीज छिपी होती है, जिसे देखना तो दूर छूने भर से इंसान की मौत हो सकती है.
आज हम इस खबर में आपको बताएंगे कि ये रहस्यमयी परंपरा क्या है और आखिर इसकी शुरुआत किसने की थी.
इस परंपरा को नव कलेवर कहते हैं. इसकी शुरुआत कैसे हुई, उसकी बात करें तो इसके पीछे भी एक कहानी है.
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक काला पहाड़ नाम के एक हमलावर ने 1568 में उड़ीसा पर अटैक कर दिया था. कहा जाता है कि उसने जगन्नाथ जी की मूर्तियों को मंदिर से बाहर निकालने का आदेश दिया.
साथ ही वो बंगाल में गंगा नदी के किनारे मूर्तियों को जलाने वाले थे.
सब कुछ खत्म होने वाला था, तभी बिसर मोहंती नाम का एक भक्त था. भगवान की मूर्ति को वापस लाना चाहता था.
वो रूप बदलकर दुश्मन की सेना का पीछा करते हुए बंगाल तक जा पहुंचा.
वहां उसने एक चमत्कार देखा. मूर्ति के आसपास की लकड़ियां तो आसानी से जल रही थी लेकिन मूर्ति के बीच में रखा वो ब्रह्म पदार्थ बिल्कुल सुरक्षित था.
फिर क्या था जैसे ही दुश्मन की नजर हटी, बिसर ने उस जलती हुई ढेर से उस ब्रह्म पदार्थ को निकाला, उसने अपने ढोलक के अंदर उसे छुपाया और वहां से भाग निकला.
फिर आगे चलकर, वहां के राजा रामचंद्र देव ने नई मूर्तियां बनवाईं, तब उस ब्रह्म पदार्थ को वापस भगवान के सीने के अंदर स्थापित किया गया.
बस उसी दिन से भगवान के पुराने शरीर को बदलकर नया शरीर देने की ये परंपरा शुरू हो गई.
अब सवाल ये उठता है कि जब मूर्ति को कुछ सालों बाद बदला जाता है, तो उसके लिए पेड़ कहां से आता है.
दरअसल भगवान जगन्नाथ की मूर्ति पेड़ से बनती है. उनके लिए पेड़ ढूंढना कोई आम बात नहीं है.
वहां के मान्यताओं के हिसाब से जब मूर्तियां पुरानी हो जाती हैं, तब मंदिर के सेवक नंगे पांव एक चमत्कारी नीम का पेड़ ढूंढने निकलते हैं.
कहा जाता है कि काकटपुर की देवी मां मंगला उन्हें सपने में आकर रास्ता दिखाती हैं.
इस पेड़ का मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं है. क्योंकि पेड़ कैसा होना चाहिए उसके लिए जो शर्तें रखी गई हैं वो बहुत कठीन हैं.
शर्त के हिसाब से पेड़ का रंग गहरा काला होना चाहिए, उस पेड़ पर किसी पक्षी का घोंसला नहीं होना चाहिए और सबसे हैरान करने वाली बात कि उस पेड़ की जड़ों में एक कोबरा सांप का बिल होना जरूरी है, जो मानो उस पेड़ की रक्षा कर रहा हो.
पेड़ मिलते ही उसे सोने और चांदी की कुल्हाड़ी से छुआ जाता है, फिर बाद में लोहे के कुल्हाड़ी से काट करके फिर लाया जाता है.
उसे कोयली बैकुंठ में रखा जाता है, इसी जगह को मंदिर का सीक्रेट गार्डन कहा जाता है.
पेड़ को लाने के बाद इस एरिया को 21 दिनों तक के लिए सील कर दिया जाता है. कहा जाता है कि इस दौरान उस एरिया से बहुत सारी अवाजें आती हैं.
इसलिए बाहर जोर-जोर से ढोल बजाए जाते हैं, जिससे अंदर की आवाज किसी को सुनाई ना दे.
फिर वो काली अंधेरी रात आती है. इस दिन पूरे पूरी शहर की बिजली गुल कर दी जाती है. इतना ही नहीं मंदिर में जलने वाले दिया को भी बुझा दिया जाता है.
जितने भी पुजारी अंदर जाते हैं, उनकी आंखों पर पट्टी और हाथों में मोटा कपड़ा बंधा होता है. उन्हें ये बताया जाता है कि उस ब्रह्म पदार्थ को ना देखना है, ना महसूस करना है.
कहा जाता है कि उस ब्रह्म पदार्थ को अगर किसी ने देख लिया तो उसकी मौत हो सकती है. वो बस अंदाजे से उसे पुरानी मूर्ति से निकालकर नई मूर्ति में रख देते हैं.
जैसे ही ब्रह्म पदार्थ को नए मूर्ति में रखा जाता है. पुरानी मूर्ति को मंदिर के कोयली बैकुंठ में दफना दिया जाता है.
वहां के मान्यताओंं के हिसाब से मंदिर के पुजारी और सेवक अगले 10 दिनों तक शोक मनाते हैं. वो अपने बाल मुंडवा लेते हैं, नए कपड़े नहीं पहनते हैं.
वो ठीक वैसे ही रिचुअल्स करते हैं जो हम अपने किसी फैमिली मेंबर के गुजर जाने पर करते हैं.
कहा जाता है वो ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके लिए जगन्नाथ सिर्फ भगवान नहीं, बल्कि उनके घर के बड़े सदस्य हैं.
डिस्क्लेमर: यह खबर जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं, लोकगाथाओं और ऐतिहासिक वृत्तांतों पर आधारित है.