पाकिस्तान के रेगिस्तान का वो मंदिर, जहां गिरा था माता सती का सिर; मुस्लिम भी कहते हैं 'नानी की हज'
पाकिस्तान के रेगिस्तान में एक मंदिर स्थित है, जहां माता सती का सिर गिरा था. साथ ही वहां मुस्लिम भी दर्शन करने जाते रहते हैं.
पाकिस्तान में मंदिर... सुनकर ही कितना अजीब लगता है. सब सोचते हैं कि वहां तो अब कोई मंदिर बचा ही नहीं होगा.
लेकिन क्या आपको पता है कि वहां 51 पवित्र शक्तिपीठों में से एक मंदिर अभी भी स्थित है. लोग वहां आज भी पूजा करने जाते हैं.
पौराणिक मान्यताओं की मानें तो वहां माता सती का सिर गिरा था. अब आपके मन में यही होगा कि वहां जो थोड़े बहुत हिंदू हैं वही दर्शन करने जाते होंगे.
लेकिन ऐसा नहीं है. वहां के मुस्लिम भी माता के दर्शन करने के लिए जाता है. दरअसल इस मंदिर का नाम हिंगलाज माता मंदिर है.
ये पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के बीहड़ पहाड़ों और तपते रेगिस्तान स्थित है. वहीं हिंगोल नदी बहती है जिसके पास में एक गुफा है, जिसमें माता सालों से निवास कर रही हैं.
यहीं गिरा था माता सती का सिर
धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं की मानें तो, नारायण ने जब अपने चक्र से माता सती के पार्थिवव शरीर को अलग-अलग किया था, तब उनके अंग जहां-जहां गिरे थे उस जगह शक्तिपीठ कहा जाता है.
कहा जाता है जहां हिंगलाज मंदिर है वहीं माता सती का सिर गिरा था. जिसकी वजह से इस मंदिर को शक्तिपीठ कहा जाता है.
इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है. बल्कि वहां एक पवित्र शिला है जिसकी पूजा पूरे भक्ति भाव से किया जाता है.
क्या है नानी की हज?
इस मंदिर में कई खास चीजें हैं. जैसे यहां इस मंदिर में हिंदुओं के अलावा मुस्लिम भी दर्शन करने आते हैं.
मुस्लिम धर्म के लोग इस जगह को नानी का मंदिर या नानी पीर कहकर पुकारते हैं. अप्रैल के महीने में वहां एक कठिन तीर्थयात्रा होती है.
जिसको मुस्लिम समुदाय में नानी की हज कहा जाता है. लोग वहां दर्शन करने के लिए रेगिस्तान के मुश्किल रास्तों को पार करके जाते हैं.
मध्य एशिया से जुड़े तार
शोधकर्ताओं की मानें तो ये मंदिर बहुत पुरानी है. कहा जाता है मुस्लिमों के आने के पहले से ही वहां पूजा-पाठ किया जाता है.
कुछ लोग तो इस मंदिर का संबंध प्राचीन नाना देवी की परंपरा से भी जोड़ते हैं. जिसके बारे में मध्य एशिया तक लोग जानते थे.
आज के दौर में क्या हैं परेशानी?
फिलहाल तो भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव और वीजा की समस्या है. जिसकी वजह से भारत से श्रद्धालुओं का जाना कठिन है.
साथ ही बलूचिस्तान के दुर्गम और खतरनाक रास्तें इतने खतरनाक हैं कि सबका वहां तक पहुंच पाना बहुत मुश्किल होता है.
लेकिन वहां के हिंदू और मुस्लिम दर्शन करने जाते रहते हैं. लेकिन इंडिया के लोगों के थोड़ा कठिन है.
उम्मीद और आस्था का अमर प्रतीक
माता का का ये मंदिर वहां के लोगों के विश्वास, शांति और उम्मीद का प्रतीक है. इस मंदिर में कोई धर्म या मजहब नहीं देखता है.
यहां लोग अपने-अपने आस्था और भाईचारे की वजह से आते हैं.
(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और ऐतिहासिक मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है.
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