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भारत में मंदिर का इतिहास हमारी सोच से भी पुराना है. अगर आपसे पूछा जाए की देश के किसी सुर्य मंदिर का नाम बताइए, तो आपके मन में तुरंत कोणार्क सुर्य मंदिर या मोढेरा का सुर्य मंदिर आएगा.
लेकिन इतिहास में कुछ ऐसे भी सुर्य मंदिर हैं जो समय के साथ दफ्न हो चुके हैं. आज हम उन्ही में से एक के बारे में बताएंगे.
ये सुर्य मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में हुआ करता था. वहां एक गांव है जिसको आज के समय में लोग धामलेज के नाम से जानते हैं.
ये गांव सोमनाथ मंदिर से 33 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है. अगर आप वहां घूमने जाएंगे तो आज के समय वो जगह बहुत शांत लगेगा.
लेकिन वहां कि सच्चाई कुछ और है. एक समय में वहां एक बहुत बड़ा सुर्य मंदिर हुआ करता था. इसका महत्व उतना ही था जितना आज मोढेरा सूर्य मंदिर का माना जाता है. लेकिन समय के साथ और विदेशी आक्रमण की वजह से ये मंदिर इतिहास में कहीं खो गया.
पहले के समय में इस जगह को मूल-गया कहा जाता था. यहां भगवान सुर्य का बहुत बड़ा और भव्य मंदिर था.
विदेशी आक्रमणकारियों ने इस मंदिर को कई बार तोड़ा और बर्बाद किया गया. जितनी बार भी मंदिर को तोड़ा जाता, वहां के लोकल लोग शासकों द्वारा फिर से बनवा दिया जाता था.
लेकिन समय के साथ मंदिर का अस्तित्व ही खत्म हो गया. अब तो ये हालात हो गए हैं कि वहां के इतिहास के बारे में वहां के लोगों को ही नहीं पता है.
अब आपके मन में आ रहा होगा इसके बारे में लोगों को पता कैसे चला था. तो जे.डब्ल्यू. वॉटसन नामक एक इतिहासकार ने 1870 से 1880 के बीच में सौराष्ट्र के तटीय इलाकों का दौरा किया था.
जहां उन्हें बड़ी संख्या में प्राचीन शिलालेख मिले थे. उन्होंने पुरातत्व विभाग को पत्र लिखा था. उनका कहना था कि इस क्षेत्र पर खास ध्यान देना चाहिए.
इसके बाद साल 1939 में इतिहासकार डी.बी. डिस्लकर ने भी इस जगह का दौरा किया. उन्हें वहां एक बहुत पुराना शिलालेख मिला, जो 23 जून 1380 ईस्वी का था.
ये शिलालेख वहां एक पीपल के पेड़ के नीचे पड़ा हुआ था. इस शिलालेख में इस बात का पूरा जिक्र मिलता है कि कैसे कठिन दौर में भी हमारे पूर्वजों ने अपने धार्मिक स्थलों को बचा कर रखा था.
इतिहास में थोड़ा पीछे जाया जाए तो पता चलता है कि महमूद गजनी के सोमनाथ पर हमले के बाद पूरे गुजरात में उथल-पुथल मच गई थी.
इसके बाद मलिक काफूर ने भी सौराष्ट्र को बुरी तरह बर्बाद किया. लेकिन इतना होने के बाद भी वहां के हिंदू राजाओं ने हार नहीं मानी.
फीरोज शाह तुगलक के शासनकाल के दौरान भी जूनागढ़ के इलाके में चूड़ासमा राजाओं का प्रभाव बना हुआ था.
उस समय जूनागढ़ के राजा भरमा हुआ करते थे, जिनका प्रभाव प्रभास क्षेत्र तक फैला हुआ था. इस समय में इस मंदिर को फिर से बनवाया गया था.
राजा भरमा के मंत्री का नाम कर्म सिंह था, जो एक बहुत धार्मिक व्यक्ति थे. उन्होंने ही खंडहर बन चुके सूर्य मंदिर की मरम्मत कराई और मूल-गया के कुंड को फिर से बनवाया.
कर्म सिंह ने प्रभास-पाटन के शहर के दरवाजे पर एक बड़ा कुंड भी बनवाया था, जिससे रास्ते से गुजरने वाले मवेशी पानी पी सकें.
उनके पिता ने भी हमेशा धर्म की रक्षा की थी. कर्म सिंह खुद भगवान सोमनाथ के बहुत बड़े भक्त थे और वे रोज दोपहर के समय उनकी आराधना करते थे.
उन्होंने विद्वान ब्राह्मणों के लिए एक गांव दान में दिया था, ताकि वे धार्मिक शिक्षा को आगे बढ़ा सकें.
आज धामलेज का वो प्राचीन मंदिर भले ही हमारी आंखों के सामने न हो, लेकिन इतिहास के दस्तावेज इसकी गवाही देते हैं.
इतिहासकार आज भी इस बात की खोज में लगे हैं कि इस जगह की पुरानी पहचान को कैसे फिर से जीवित किया जाए.
जो जगह कभी मूल-गया के नाम से जानी जाती थी, वह आज एक छोटा सा गांव बनकर रह गई है.
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी ऐतिहासिक दस्तावेजों, शोध पत्रों और पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित है. हमारा उद्देश्य पाठकों तक प्रामाणिक इतिहास पहुंचाना है.