पावली के मौके पर चित्रकूट के रामघाट पर लाखों लोग दीपदान करते हैं. इस खबर में आज हम जानेंगे कि इस परंपरा का भगवान श्रीराम से क्या नाता है और इसका धार्मिक महत्व क्या है?
आपने रामायन में ये जरूर सुना होगा की चित्रकूट को भगवान श्री राम की तपोस्थली माना जाता है. दिवाली के मौके पर यहां का नजारा देखने लायक होता है.
दिवाली के समय में यहां हजारों की संख्या में भीड़ पहुंचती है. सब लोग मंदाकनी नदी के रामघाट पर दीपदान करते हैं.
इस खबर में हम जानेंगे कि रामघाट पर दीया जलाने की परंपरा कब शुरू हुई थी.
ये परंपरा भगवान श्री राम से जुड़ी है. कहा जाता है कि जब भगवान रावण को मारकर अयोध्या को लौट रहे थे, उस समय उनका पुष्पक विमान चित्रकूट में भी उतरा था.
जब ये खबर वहां के संतों को मिली तो उनके बीच में खुशी की लहर दौड़ गई. वहां के संतों, ऋषियों ने दीया जलाकर भगवान का स्वागत किया. ठीक उसी समय से वहां पर ये परंपरा चलती आ रही है.
वहां पर दिवाली के समय में दीया जलाने के लिए बहुत भीड़ लग जाती है. ऐसा नहीं है कि सिर्फ वहीं के लोग आते हैं. वहां पूरे देश भर से लोग दीया जलाने आते हैं.
माना जाता है कि वहां मन से दीया जलाने से लोगों को बहुत आशीर्वाद मिलता है. उनके परिवार में ढ़ेर सारी खुशियां आती हैं.
चित्रकूट में यह धार्मिक अनुष्ठान और दीपदान का त्योहार किसी एक दिन का नहीं होता है. ये धनतेरस के दिन से शुरू हो जाता है.
इसके बाद भाई दूज तक यानी करीब पांच दिनों तक यह पूरा उत्सव धूमधाम से चलता रहता है.
इन पांच दिनों में पूरे मेला जैसा माहौल रहता है. भगवान राम का आशीर्वाद पाने के लिए उमड़ने वाली भक्तों की यह भीड़ हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है.
धार्मिक जानकारों का मानना है कि मंदाकिनी नदी के तट पर दीपदान करने से जीवन के सारे अंधकार दूर हो जाते हैं.
रामघाट की पवित्र धारा में जब हजारों दीप तैरते हैं, तो वह दृश्य देखने लायक होता है. लोग अपने परिवार की सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की कामना के साथ यहां दीप जलाते हैं.
ऐसा विश्वास है कि यहां सच्चे मन से दीया गया एक भी दीपक इंसान के भाग्य के द्वार खोल देता है.
आज भी चित्रकूट की हवाओं में प्रभु राम की मौजूदगी का अहसास होता है. दीपावली के मौके पर यहां आने वाला हर भक्त राम की भक्ति में पूरी तरह डूब जाता है.
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(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, कथाओं और स्थानीय परंपराओं पर आधारित है.