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वो जगह जहां शिव जी ने ब्रह्महत्या के पाप को धोया, ये है गया से आठ गुना ज्यादा फलदायी तीर्थ जहां पितरों का होता है अंतिम श्राद्ध!

Brahm Kapal Teerth Katha: उत्तराखंड के चमोली में एक ऐसा तीर्थ है जो बद्रीनाथ धाम के पास ही स्थित है, यह है ब्रह्मकपाल तीर्थ जिसका संबंध शिव जी, ब्रह्मा जी पितरों और पांडवों से है. आइए इस तीर्थ के बारे में और इसकी कथा विस्तार से जानें.

Written By Padma Shree Shubham
Published: Oct 01, 2026, 11:42 AM IST | Updated: Oct 01, 2026, 11:53 AM IST
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पितृपक्ष में गया जाकर पितरों के नाम से पिंडदान करने का बड़ा महत्व बताया गया है. यहां दुनिया भर से लोग पहुंचकर तर्पण और पिंडदान की प्रक्रिया को पूरी करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक तीर्थ उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है जहां पिंडदान करने से पितरों को नर्क भोगने से भी मुक्ति मिलती है. यह तीर्थ है ब्रह्मकपाल जहां की मान्यताएं अद्भुत हैं. आइए इस लेख में विस्तार से जानें कि ब्रह्मकपाल से जुड़ी शिव जी की पौराणिक कथा क्या है और बदरीनाथ के पास स्थित ब्रह्मकपाल का पितृपक्ष व पिंडदान से क्या संबंध है.

ब्रह्मकपाल तीर्थ से जुड़ी कथा क्या है?

ब्रह्मकपाल की महिमा से जुड़ी रोचक और पौराणिक कथा है कि जब ब्रह्माजी ने जब सृष्टि की रचना की तो उस समय उनके पांच मुख थे. समय के बीतने के साथ ही ब्रह्मा जी के भीतर अहंकार ने जन्म लिया. उनका पांचवां सिर उनके अहंकार को दर्शाता था. अहंकार के कारण ही ब्रह्मा जी ने अपने आपको सर्वोच्च मान लिया. उनके इसी अहंकार के अंत के लिए शिव जी ने उनके पांचवें सिर को अपने त्रिशूल से काट डाला.

ब्रह्मा जी का शीश जैसे ही कटा भगवान शिव पर ब्रह्महत्या का दोष लग गया. ब्रह्मा जी का कटा हुआ शीश उनके त्रिशूल से चिपक गया. कई प्रयासों के बाद भी शीश शिव जी से अलग ही नहीं हो रहा था. तब इस पाप से मुक्ति के लिए महादेव ने पृथ्वी के कोने-कोने जाकर भिक्षाटन किया लेकिन फिर भी शिव जी को कपाल और ब्रह्म हत्या से मुक्ति नहीं मिली. जब भगवान शिव बदरी क्षेत्र में गए तो वहां पर ब्रह्म कपाल उनके त्रिशूल से निकल कर गिर गया और जिस स्थान पर यह गिरा उसे ही ब्रह्मकपाल कहा गया. ब्रह्मकपाल उत्तराखंड में चमोली जिले में स्थिति है जहां पर शिव जी के ब्रह्महत्या का पाप धुल सका. बद्रीनाथ धाम के पास अलकनंदा नदी के तट पर स्थिति इस पवित्र तीर्थ की बहुत मान्यता है.

ब्रह्मकपाल तीर्थ का श्राद्ध कर्म और पिंडदान से संबंध

यहां बहने वाली अलकनंदा नदी ब्रह्मकपाल को पवित्र करती है. मान्यता है कि ब्रह्मकपाल पर जिन पितरों का श्राद्ध किया जाता है उन्हें प्रेत योनी से तत्काल मुक्ति मिलती है. भगवान विष्णु के धाम में उन पितरों को स्थान मिलता है. अकाल मृत्यु पा चुके पितरों का इस तीर्थ पर तर्पण करने से उनकी अशांत आत्मा शांत होती है. ब्रह्मकपाल में तर्पण और पिंडदान करने से गया से 8 गुणा ज्यादा फल प्राप्त होता है. पिंडदान के लिए ब्रह्मकपाल सबसे श्रेष्ठ स्थान माना गया है.

ब्रह्मकपाल तीर्थ पर होता है पितरों का 'अंतिम श्राद्ध'

शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मकपाल में जब पितृ का पिंडदान कर दिया जाता है तो उसे ही अंतिम पिंडदान मान लिया जाता है. इसका अर्थ ये है कि इस स्थान पर जब पितृ का एक बार पिंडदान और तर्पण कर दिया जाता है तब उन पितृ के लिए जीवन में फिर कभी कहीं और पिंडदान या श्राद्ध करने की जरूरत नहीं रह जाती है. इसके बाद केवल वार्षिक श्राद्ध तिथियों पर ब्रह्म भोज करने का नियम होता है.

ब्रह्मकपाल तीर्थ पर पाण्डवों ने किया श्राद्ध

महाभारत युद्ध के समाप्त होने पर भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को सुझाया कि ब्रह्मकपाल में जाकर पितरों का श्राद्ध करें. ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण के कहे का अनुसरण करते हुए पाण्डवों ने बद्रीनाथ गए और फिर ब्रह्मकपाल तीर्थ पहुंचकर पितरों एवं युद्ध में दिवंगत हुए सभी लोगों का श्राद्ध कर्म किया.

(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)

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About the Author

पद्मा श्री शुभम् को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव. मॉस कम्‍युनिकेशन ग्रेजुएट और हिंदी लिटरेचर से पोस्‍ट ग्रेजुएट. मीडिया में डिजिटल प्लेटफॉर्म से करियर शुरू करने के बाद कई संस्थाओं में काम किया. Nedrick News, TFI Post जैसी संस्थाओं में कार्यरत रहीं. इसके बाद Zee News जॉइन किया. समाचार और वर्तमान घटनाओं पर लिखने पढ़ने में रुचि. धर्म और ज्योतिष में अधिक रुचि. वर्तमान में धर्म और ज्योतिष संबंधी लेख लिखने में कार्यरत. पद्मा से आप padma.shubham@India.com मेल के जरिए सीधे संपर्क कर सकते हैं.
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