)
16 अक्टूबर को उत्तराखंड के बागेश्वर के बदियाकोट मंदिर में आग लग गई, नवरात्र के दौरान देवी मंदिर में आग लगने को लेकर कई लोग किसी संकट की आशंका से जोड़कर देख रहे हैं. यह मंदिर बेहद प्राचीन है और लकड़ी से बना था. लकड़ी पर बेहद खूबसूरत नक्काशी करके बनाया गया यह देवी मंदिर तिब्बती देवताओं की पूजा का भी स्थल है.
इस मंदिर का बड़ा धार्मिक महत्व है. इसे राक्षस निशुंभ का वध स्थल माना जाता है. इस ऐतिहासिक मंदिर में नवरात्र के दौरान आग लगना भक्त अशुभ मान रहे हैं. आग में मंदिर के मुख्य ढांचे को काफी नुकसान पहुंचा है. यह मंदिर पहाड़ों की पारंपरिक स्थापत्य कला को सहेजे बेहद सुंदर कलाकृति की पहचान रही है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राक्षस शुंभ और निशुंभ ने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि उन्हें न तो कोई पुरुष मार सकता है, न देवता और न दानव. यह वरदान मिलते ही उन्होंने आतंक मचा दिया और तीनों लोकों पर अधिकार जमा दिया. तब देवताओं ने माता पार्वती से उसका अंत करने की प्रार्थना की. फिर माता पार्वती के शरीर के तेज से एक देवी का प्रकट हुईं, जो बेहद सुंदर थीं. उनका नाम महागौरी/चंडिका था. देवी मां और शुंभ-निशुंभ के बीच भयंकर युद्ध हुआ था. फिर देवी मां ने त्रिशूल निशुंभ की छाती चीर कर वध कर दिया.
धार्मिक मान्यता है कि आज जहां बदियाकोट में मां भगवती का प्राचीन मंदिर है, वहीं देवी मां ने निशुंभ का वध किया था. इसलिए यहां देवी मां के भक्त उनकी कृपा पाने के लिए आते हैं. खासतौर पर नवरात्र में काफी संख्या में भक्त इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं.
इस मंदिर में तिब्बती देवता हूण और लाटू की भी पूजा होती है. उन्हें देवी भगवती का धर्मभाई माना जाता है. इस तरह यह स्थान हिंदुओं के साथ-साथ तिब्बतियों का भी आस्था स्थल है. इस मंदिर को आदि बद्री भगवती माता मंदिर भी कहा जाता है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक प्रसंग स्थानीय परंपराओं पर आधारित हैं. इनकी ऐतिहासिक पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं की गई है.)