तपस्यारत पवित्र आत्माओं से अखंड ज्योति तक, ये हैं बद्रीनाथ धाम के 10 रहस्य जो करते हैं हैरान!
Badrinath Temple Facts: बद्रीनाथ मंदिर के साथ चारधाम की यात्रा शुरू होती है. ये चार धाम मोक्ष प्राप्ति के द्वार माने गए हैं जिनमें बद्रीनाथ धाम का विशेष स्थान हैं. आइए जानते हैं बद्रीनाथ मंदिर से जुड़े ऐसे 10 रहस्य जिसके बारे में बहुत कम लोगों को ही पता है.
Badrinath Dham Secrets: देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा पर बद्रीनाथ धाम स्थित है. जिसे भगवान विष्णु का भू-वैकुंठ कहा गया है. यह भगवान का परम निवास स्थान माना गया है. बद्रीनाथ धाम को लेकर पौराणिक मान्यता है कि श्रीहरि विष्णु यहां स्नान और आराम करने के लिए आते हैं. भगवान बद्रीविशाल आज भी इस स्थान पर अदृश्य रूप में निवास करते हैं. इसी अदृश्य रूप में भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं. यहां अच्छी मात्रा में जंगली बेरी यानी बदरी मिलने की वजह से ही इस जगह को 'बद्रीनाथ' कहा गया. आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे बद्रीनाथ धाम को आप जितना ही जानेंगे उतना ही आश्चर्य से भरते जाएंगे. आइए इस लेख में विस्तार से जानें कि बद्रीनाथ धाम के ऐसे कौन से 10 अद्भुत रहस्य हैं जिसके बारे में जानकर किसी को भी हैरानी हो सकती है.
बद्रीनाथ धाम के 10 अद्भुत रहस्य
तीन चाबियों का रहस्य
बद्रीनाथ धाम मंदिर के कपाट खोलने के लिए एक चाबी की नहीं बल्कि तीन चाबियों की जरूरत पड़ती है. ये तीनों चाबियां अलग-अलग लोगों के पास सुरक्षित रहती हैं. बद्रीनाथ धाम के कपाट को खोलने की तिथि क्या होगी इसका चयन वसंत पंचमी के दिन टिहरी महाराज के दरबार में किया जाता है. इसके बाद तय तिथि पर मंदिर का ताला खोलने के लिए तीन जगहों से चाबियां लाने का विधान है. टिहरी राजपरिवार के प्रतिनिधि के पास पहली चाबी सुरक्षित रहती है. बामणी गांव के 'भंडारी थोक' के पास दूसरी चाबी होती है और तीसरी चाबी बामणी गांव के 'मेहता थोक' के पास से लाया जाता है. परंपरा के अनुसार इन तीनों चाबियों के मिलन से ही मंदिर के कपाट खोले जाते हैं.
केदारनाथ और बद्रीनाथ का संबंध
मान्यता है कि बद्रीनाथ दर्शन से पहले भक्तों को केदारनाथ के दर्शन करने चाहिए. पौराणिक कथाओं की मानें तो बद्रीनाथ धाम में पहले शिव जी और मां पार्वती वास करते थे लेकिन विष्णु जी ने बालक रूप धारण किया और अपनी लीलाओं के जरिए इस स्थान को शिव जी और मां पार्वती से ले लिया. जिसके कारण शिव जी और मां पार्वती ने केदारनाथ धान में वास करना शुरू किया.
भविष्य बद्री का रहस्य
बद्रीनाथ धाम मंदिर को लेकर ऐसी मान्यता है कि आने वाले भविष्य में यानी कलयुग के अंत तक नर और नारायण पर्वत जब एक दूसरे से मिल जाएंगे तब बद्रीनाथ धाम का रास्ता बंद हो जाएगा और फिर जोशीमठ के करीब ही 'भविष्य बद्री' नाम की एक जगह पर बद्रीनाथ जी की उपासना की जाएगी.
तप्त कुंड का रहस्य
तप्त कुंड हिमालय की अत्यधिक ऊंचाई और ठंड वाली जगह पर स्थित है लेकिन इसके बाद भी तप्त कुंड में प्राकृतिक रूप से गर्म पानी निकलता है.
भगवान बद्रीनाथ की प्रतिमा का रहस्य
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अलकनंदा नदी में बद्री नारायण भगवान की काली पत्थर की प्रतिमा जो कि शालिग्राम पत्थर की है, उसकी खोज गुरु शंकराचार्य ने की थी. उन्होंने तप्त कुंड के गर्म झरनों के पास इस प्रतिमा को एक गुफा में स्थापित कर दिया. गढ़वाल के राजा ने प्रतिमा को मंदिर के वर्तमान स्थल पर सोलहवीं शताब्दी में स्थापित किया.
तपस्यारत पवित्र आत्माओं का रहस्य
बद्रीनाथ धाम से जुड़ी एक बड़ी धार्मिक मान्यता है. ऐसा कहा जाता है कि बद्रीनाथ धाम की पुण्य भूमि पर कई ऋषि मुनि और पवित्र आत्माएं सूक्ष्म रूप में विराजती हैं और तपस्या में लीन हैं.
अखंड ज्योति का रहस्य
अखंड ज्योति का रहस्य आज तक कोई समझ नहीं पाया है. दरअसल बद्रीनाथ धाम के कपाट जब 6 महीने के लिए बंद हो जाते हैं तब भी गर्भगृह की ज्योति जलती रहती है वो भी बिना किसी बाहरी ईधन के.
मंदिर के रक्षक 'घंटाकर्ण' का रहस्य
बद्रीनाथ धाम के द्वारपाल के रूप में भगवान शिव के परम भक्त 'घंटाकर्ण' वास करते हैं. मंदिर के कपाट खोलने से पहले घंटाकर्ण की अनुमति की जाती है और उनकी पूजा की जाती है. पौराणिक कथा है कि बद्रीनाथ में उसी जगह पर घंटाकर्ण ने तपस्या की थी जहां पर भगवान नारायण ने तपस्या की. घंटाकर्ण की तपस्या से प्रसन्न हो भगवान कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए और उसे बद्रीनाथ धाम का क्षेत्रपाल बना दिया जिसके बाद से ही घंटाकर्ण द्वारपाल के रूप में नियुक्त है.
वनतुलसी की माला का रहस्य
आपने सुना या पढ़ा होगा कि भगवान विष्णु जी को तुलसी अति प्रिय है लेकिन जब बात बद्रीनाथ मंदिर की आती है तो यहां पर बद्री नारायण को तुलसी नहीं बल्कि 'वनतुलसी' की माला अर्पित करने का विधान है. यह वनतुलसी केवल इसी ऊंचाई पर ही पनपती है जिनका गंध सामान्य तुलसी से अलग है.
शंख बजाना वर्जित
बद्रीनाथ मंदिर में शंख बजाना वर्जित है. जिसे लेकर धार्मिक मान्यता है कि एक बार यहां पर देवी लक्ष्मी तपस्या कर रही थीं तभी विष्णु जी ने शंखचूर्ण नाम के एक राक्षस का वध किया. सनातन धर्म के अनुसार विजयी होने पर शंखनाद किया जाता है लेकिन विष्णु जी ने शंख नहीं बजाया, यह सोचकर कि ऐसा करने से लक्ष्मी जी का ध्यान भंग हो जाएगा. तब से ही बद्रीनाथ में शंख न बजाने का विधान है.
Disclaimer: यह लेख पुराणों, स्थानीय मान्यताओं और लोक श्रुतियों पर आधारित है. इसका उद्देश्य सिर्फ जानकारी देना है, हम किसी चमत्कारिक दावे की पुष्टि नहीं करते हैं.