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श्री कृष्ण और नरकासुर की कथा से जुड़ा है असम का अश्वक्रांता मंदिर, जानें किसने बनवाया?

गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित अश्वक्रांता मंदिर का इतिहास द्वापर युग से जुड़ा है. आज हम इस स्टोरी में अहोम राजा प्रमत्त सिंह द्वारा बनाए गए इस विष्णु धाम के इतिहास और ट्रैवल प्लान की पूरी जानकारी देंगे.

श्री कृष्ण और नरकासुर की कथा से जुड़ा है असम का अश्वक्रांता मंदिर, जानें किसने बनवाया?

अगर आपको पता चले कि आपके एक मंदिर में दर्शन करने मात्र से आपके द्वारा किए गए सारे पाप धुल जाएंगे, तो क्या आपको यकीन होगा? लेकिन आज हम ऐसे ही कमाल के अलौकिक मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां जाते ही आपके सारे पाप छूमंतर हो जाएंगे.

इस मंदिर का नाम अश्वक्रांता मंदिर है. ये पूर्वी भारत के असम राज्य में स्थित है. ये मंदिर गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर एक पथरीली पहाड़ी पर स्थित है. ये जगह उस इलाके के सबसे पवित्र और जरूरी स्थलों में से एक माना जाता है.

इस मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. जो अनंतशयन मुद्रा में यहां विराजमान हैं, इसका मतलब है कि वे शेषनाग की शय्या पर आराम करते हुए दिखाई देते हैं.

सनातन धर्म में ये माना जाता है कि इस देवालय का दर्शन करने से लोगों के सभी पाप मिट जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है.

कब और किसने बनवाया?

अब सवाल उठता है कि इस मंदिर को बनवाया किसने? इस मंदिर की इमारत का निर्माण 18वीं शताब्दी में अहोम राजवंश के शक्तिशाली राजा स्वर्गदेव प्रमत्त सिंह ने 1720 ईस्वी के आसपास करवाया था.

हालांकि इस जगह पर पूजा-पाठ प्राचीन काल से ही होता आया है. जब पुराने मंदिर का ढांचा टूट गया, तो अहोम के राजाओं ने इसको फिर से बनवाकर भव्य रूप दिया.

अब वास्तुकला के बारे में समझें तो इसमें असमिया और हिंदू शैली की अनोखी झलक देखने को मिलती है.

द्वापर युग से जुड़ा है नाम और पौराणिक कथा

देखने में तो ये मंदिर भव्य है ही, इसके साथ ही इसे लेकर कई कथाएं भी मशहूर हैं. इस मंदिर का नाम अश्वक्रांता पड़ने के पीछे द्वापर युग की एक बहुत ही दिलचस्प पौराणिक कथा जुड़ी है.

जब भगवान श्री कृष्ण ने प्रागज्योतिषपुर के अत्याचारी राजा नरकासुर का वध करने का फैसला लिया, तब वे अपनी चतुरंगिणी सेना और घोड़ों के साथ यहां पहुंचे थे.

युद्ध में उतरने से पहले श्री कृष्ण ने इसी पथरीले टीले पर अपने घोड़ों के साथ विश्राम किया था. संस्कृत में अश्व का अर्थ घोड़ा और क्रांत का अर्थ चढ़ाई या आराम से है. माना जाता है कि पहाड़ी की चट्टानों पर आज भी घोड़ों के टापों के निशान मौजूद हैं.

क्या है मंदिर की खास बातें?

इस मंदिर को 2 भागों में बाट दिया गया है. जिसे ऊपरी अश्वक्रांता और निचला अश्वक्रांता कहा जाता है. इस मंदिर का मुख्य गर्भगृह निचले भाग में स्थित है. वहीं भगवान विष्णु की शेषनाग पर विराजी मूर्ति स्थित है.

वहीं ऊपरी भाग से ब्रह्मपुत्र नदी का विहंगम और मनमोहक नजारे दिखाई देता है. मंदिर परिसर के पास बहती ब्रह्मपुत्र नदी का तट ढलते सूर्य के समय बेहद खूबसूरत दिखता है.

यहां की शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है.

कैसे बनाएं अश्वक्रांता मंदिर का ट्रैवल प्लान?

अब अगर आपको वहां घूमने जाना है तो ये बहुत आसान है. ये मंदिर गुवाहाटी शहर से लगभग 10 से 12 किलोमीटर दूर उत्तरी गुवाहाटी में स्थित है. 

जहां गुवाहाटी रेलवे स्टेशन या गुवाहाटी एयरपोर्ट से कैब या ऑटो करके आराम से पहुंच सकते हैं.

यात्रा को और भी रोमांचक बनाने के लिए आप फैंसी बाजार घाट से ब्रह्मपुत्र नदी पार करने वाली नाव या फिर देश के सबसे लंबे गुवाहाटी पैसेंजर रोप-वे का आनंद ले सकते हैं. नाव से उतरकर मंदिर तक पहुंचना एक कमाल का अनुभव होता है.

यात्रा का सही समय और जरूरी जानकारी

यहां जाने के लिए अक्टूबर से मार्च के बीच का महीना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि इस दौरान असम का मौसम बहुत सुहावना रहता है.

मानसून के समय ब्रह्मपुत्र का जलस्तर बढ़ने से नौका सेवाएं रुक सकती हैं. मंदिर रोजाना सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है. दोपहर की आरती और संध्या आरती के समय यहां की दिव्यता देखते ही बनती है.

मंदिर दर्शन के साथ आप आसपास स्थित कामाख्या देवी मंदिर और उमानंद द्वीप मंदिर का भ्रमण भी अपने यात्रा प्लान में शामिल कर सकते हैं.

(Disclaimer): यह आलेख पुरातात्विक संदर्भों, असम पर्यटन विभाग के ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय पौराणिक मान्यताओं के आधार पर तैयार किया गया है. यात्रा से पूर्व स्थानीय नौका व समय सारणी की जांच अवश्य करें.
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Harsh Singh

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हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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