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दीवाली का नाम आते ही हमारे मन में दीयों की चमक, पटाखों की आवाज और मिठाइयों की मिठास आ जाती है.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस बड़े त्योहार की रात गांवों में कुछ ऐसी गुप्त रस्म भी होती हैं, जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं.
उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में दीवाली की शाम एक बहुत दिलचस्प परंपरा निभाई जाती है, जिसे लोग प्यार से अलाई-बलाई या अलाया बलैया उतारना कहते हैं.
ये कोई पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अपनों को बुरी नजर से बचाने का एक देसी तरीका है. आज इस खबर में हम इस बारे में डिटेल से जानेंगे.
सीधे शब्दों में कहें तो ये बच्चों की नजर उतारने का एक पुराना तरीका है. हमारे घरों में बुजुर्ग दादी-नानी हमेशा से मानती आई हैं कि त्योहारों के समय नेगेटिव ताकतें जाग जाती है.
इसलिए घर के छोटे बच्चों को किसी की बुरी नजर न लगे और वे हमेशा स्वस्थ रहें, इसके लिए दीवाली की रात ये रस्म की जाती है.
गांव की महिलाएं आज भी इस परंपरा को पूरे भरोसे के साथ निभाती हैं ताकि परिवार पर कोई आंच न आए.
इस रस्म को निभाने के तरीके हर घर में थोड़े अलग हो सकते हैं. पुराने जमाने में लोग सूखी घास या पतली लकड़ियों को बांधकर एक छोटी सी जलती मशाल जैसी बनाते थे, जिसे अलाई-बलाई कहा जाता था.
समय के साथ-साथ कुछ तरीके भी थोड़े बदल गए. आज के समय में कई घरों में पानी का लोटा भरकर बच्चों के सिर से सात बार वार लिया जाता है.
वहीं कुछ जगहों पर पुरानी झाड़ू या चप्पलों को भी सिर से घुमाकर घर से बाहर फेंक दिया जाता है.
भले ही ये आज एक लोक परंपरा बन गई हो, लेकिन इसका इतिहास काफी पुराना है.
हमारे धार्मिक ग्रंथों, खासकर श्रीमद्भागवत महापुराण में भी बच्चों की रक्षा और नजरदोष हटाने के कई तरीके मिलते हैं.
जरा सोचिए, द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण छोटे थे और उन पर तरह-तरह के संकट आए थे, तब माता यशोदा ने भी उनकी नजर उतारने के लिए ऐसे ही उपाय किए थे.
दीवाली की अमावस्या की रात बहुत गहरी और शांत होती है, इसलिए इस काम के लिए इसे सबसे सही समय माना गया है.
जब घर की दादी या मां बच्चों की नजर उतारती हैं, तो वे बड़े प्यार से भगवान से दुआ मांगती हैं.
कई जगहों पर ऐसा बोलते हैं कि घर की सारी बलाएं दूर हों और सुख-शांति का वास हो.
कुछ घरों में ये काम बिल्कुल चुपचाप और बिना किसी शोरगुल के किया जाता है ताकि इसका असर पूरा हो सके.
ये पूरी तरह से परिवार के पुराने रीति-रिवाजों पर निर्भर करता है कि वे इसे कैसे करते हैं.
नजर उतारने के बाद जो भी चीज इस्तेमाल की जाती है, उसे कभी भी घर के अंदर या छत पर नहीं रखा जाता.
रस्म पूरी होते ही उसे तुरंत घर की चारदीवारी से बाहर ले जाना पड़ता है. लोग इसे ले जाकर गांव के किसी चौराहे पर या सुनसान रास्ते पर छोड़ आते हैं.
नियम ये है कि इसे रखकर पीछे मुड़कर बिल्कुल नहीं देखना चाहिए.
लोगों का मानना है कि ऐसा करने से घर की सारी बदकिस्मती और बुरी बलाएं बाहर ही छूट जाती हैं और घर में केवल पॉजिटिव एनर्जी बचती है.
(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारियां पारंपरिक लोक मान्यताओं, सांस्कृतिक परंपराओं और ग्रामीण संस्कृति पर आधारित हैं. इसका उद्देश्य केवल पाठकों को हमारी प्राचीन लोक-संस्कृति और रीति-रिवाजों से अवगत कराना है. किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा देना हमारा उद्देश्य नहीं है. पाठक अपनी आस्था और विवेक के अनुसार ही इन परंपराओं को समझें.