कुर्सी की चाह, पर पेंशन का भी मोह ! चुनाव से पहले सरकारी कर्मचारी 'इस्तीफे' की जगह आखिर क्यों लेते हैं VRS ?
Rajasthan Politics : राजनीति एक अनिश्चित क्षेत्र है, जहां जीत की कोई गारंटी नहीं होती. ऐसे में सरकारी कर्मचारी अपनी बरसों की नौकरी से मिलने वाली वित्तीय सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाना चाहते. चुनाव लड़ने के लिए 'इस्तीफा' देना बिना पैराशूट के छलांग लगाने जैसा होगा, जिसमें पेंशन और अन्य लाभ छिन जाते हैं. वहीं, 'स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति'यानी कि VRS वो 'गोल्डन पैराशूट' है, जो उन्हें चुनाव हारने की स्थिति में भी आजीवन पेंशन और ग्रेच्युटी की गारंटी देता है. ये कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक बेहद सोची-समझी 'रिस्क मैनेजमेंट' रणनीति है.
Rajasthan Politics : क्या आपने कभी सोचा है कि जब भी कोई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी चुनाव लड़ने मैदान में उतरता है, तो वो नौकरी से 'इस्तीफा' क्यों नहीं देता ? वह हमेशा 'VRS' यानी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ही क्यों चुनता है ? हाल ही में अलवर में ये चर्चा रही की. अलवर नगर परिषद के नेता प्रतिपक्ष की पत्नी ने बड़ौदामेव से पंचायत चुनाव लड़ने की तैयारी में अपनी सरकारी नौकरी से VRS ले लिया है. सिर्फ अलवर ही नहीं, चुनाव से ठीक पहले ऐसा पूरे देश में देखने को मिलता है. लेकिन इसका असली कानूनी पेंच क्या है ? आइए इसे समझते हैं.
दरअसल भारत में कोई भी सरकारी कर्मचारी अपनी कुर्सी पर रहते हुए चुनाव नहीं लड़ सकता. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 102(1)(a) और 191(1)(a) के तहत इसे 'लाभ का पद' (Office of Profit) माना गया है. इसके अलावा 'केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964' (Rule 5) और राज्य के पंचायती राज नियमों के अनुसार सरकारी कर्मचारी किसी भी राजनीतिक दल या चुनाव का हिस्सा नहीं बन सकता. चुनाव लड़ने के लिए आपको सरकारी सेवा से पूरी तरह मुक्त होना ही पड़ेगा.
असली गणित - इस्तीफा बनाम VRS
नौकरी से मुक्त होने के दो ही रास्ते हैं : पहला इस्तीफा और दूसरा VRS और बस यहीं से शुरू होता है असली गणित. अगर कोई कर्मचारी चुनाव के जोश में सीधे 'इस्तीफा' दे दे, तो उसकी बरसों की सर्विस जीरो मान ली जाती है. उसे भविष्य में मिलने वाली पेंशन, ग्रेच्युटी और रिटायरमेंट के सभी वित्तीय लाभों से हाथ धोना पड़ता है. दूसरी तरफ है VRS- नियमों के अनुसार, अगर किसी कर्मचारी ने 15 या 20 साल की न्यूनतम सेवा पूरी कर ली है, तो वो VRS ले सकता है. VRS लेने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि कर्मचारी को 'रिटायर्ड' माना जाता है. इससे उसकी पेंशन, प्रोविडेंट फंड (PF) और ग्रेच्युटी के सारे लाभ विधिवत मिलते रहते हैं.
यही वजह है कि चुनावी मैदान में किस्मत आजमाने से पहले सरकारी कर्मचारी सीधे इस्तीफा देने के बजाय VRS का सुरक्षित रास्ता चुनते हैं. अगर वे चुनाव जीत गए, तो उनके पास पावर और पद दोनों हैं. और अगर किसी वजह से चुनाव हार भी गए, तो उन्हें बुढ़ापे की चिंता नहीं सताती क्योंकि VRS के जरिए उनकी पेंशन हर महीने खाते में आती रहती है. ये 'आम के आम और गुठलियों के दाम' वाली वो परफेक्ट रणनीति है, जो हर महत्वाकांक्षी सरकारी कर्मचारी अपनाता है.
राजस्थान से वो बड़े नाम जो VRS लेकर राजनीति में आए
अर्जुन राम मेघवाल (IAS से VRS लेकर संसद और केंद्रीय मंत्रालय तक)
1982 बैच के आरएएस (RAS) अधिकारी, जो बाद में पदोन्नत होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में आए और चूरू जिला कलेक्टर भी रहे.
VRS का मामला: साल 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने अपनी प्रशासनिक नौकरी से VRS लिया.
नतीजा (शानदार जीत) : भाजपा ने उन्हें बीकानेर (सुरक्षित) सीट से टिकट दिया. वे 2009 में चुनाव जीते और उसके बाद लगातार 2014, 2019 और 2024 में जीतकर संसद पहुंचे. वे केंद्र सरकार में कानून एवं न्याय मंत्री सहित कई अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. ये राजस्थान में नौकरशाही से VRS लेकर राजनीति में सफल होने का सबसे बड़ा उदाहरण है.
हरीश चंद्र मीणा (DGP पद से VRS लेकर बने सांसद और विधायक)
1976 बैच के वरिष्ठ आईपीएस (IPS) अधिकारी, जो राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (DGP) के शीर्ष पद पर रहे.
VRS का मामला: 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने सुरक्षा सलाहकार/DGP स्तर पर रहते हुए सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ली और भाजपा में शामिल हुए.
नतीजा (जीत दर्ज की): भाजपा के टिकट पर उन्होंने दौसा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और अपने ही बड़े भाई (पूर्व केंद्रीय मंत्री नमोनारायण मीणा) और डॉ. किरोड़ी लाल मीणा को हराकर बड़ी जीत दर्ज की. बाद में 2018 में वे कांग्रेस में शामिल हुए और देवली-उनियारा से विधायक बने.
मदन गोपाल मेघवाल (IPS से VRS लिया, टिकट कटा और नौकरी भी गई)
प्रोफाइल: राजस्थान पुलिस सेवा (RPS) से पदोन्नत होकर 2015 में आईपीएस (IPS) बने. पुलिस मुख्यालय सीआईडी (CID) में एसपी पद पर तैनात थे.
VRS का मामला: 2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में खाजूवाला सीट से कांग्रेस का टिकट मिलने के आश्वासन पर उन्होंने 15 नवंबर 2018 को VRS की अर्जी दी और 16 नवंबर को आनन-फानन में इसे मंजूर करवाया.
नतीजा (दांव उल्टा पड़ा): उसी रात जब पार्टी की आधिकारिक सूची आई, तो उनका नाम कट गया. इसके बाद वे अपना VRS रद्द करवाने और वापस नौकरी पाने के लिए कार्मिक विभाग के चक्कर काटते रहे, लेकिन नियमों के तहत VRS वापस नहीं हो सका. बाद में 2019 के लोकसभा चुनाव में बीकानेर से टिकट मिला, लेकिन वे चुनाव हार गए.
जगमोहन मीणा (पूर्व RAS, VRS के 10 साल बाद मिला चुनावी मैदान)
प्रोफाइल: राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) के अधिकारी और कैबिनेट मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के छोटे भाई.
VRS का मामला: राजनीति में अपनी पारी शुरू करने के लिए इन्होंने अपनी प्रशासनिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ली थी.
नतीजा: नौकरी छोड़ने के बाद इन्हें पार्टी से टिकट के लिए एक लंबा राजनीतिक इंतजार करना पड़ा. आखिरकार 2024 में दौसा विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने इन्हें अपना प्रत्याशी बनाकर चुनावी मैदान में उतारा.
ताराचंद मीणा (कलेक्टर रहते VRS लिया और लोकसभा का टिकट पाया)
प्रोफाइल: RAS से प्रमोट होकर 2011 बैच के आईएएस (IAS) बने। उदयपुर के जिला कलेक्टर और टीएडी कमिश्नर रहे.
VRS का मामला: 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने प्रशासनिक सेवा से VRS लिया, जिसे कार्मिक विभाग ने तुरंत मंजूरी दी.
नतीजा: कांग्रेस ने उन्हें उदयपुर (एसटी) संसदीय सीट से प्रत्याशी बनाया. हालांकि वे भाजपा के मन्नालाल रावत से चुनाव हार गए, लेकिन VRS की बदौलत उनकी पेंशन और रिटायरमेंट लाभ पूरी तरह सुरक्षित रहे.
डॉ. विनय मल्होत्रा (वरिष्ठ डॉक्टर, चुनाव के लिए कोर्ट से मांगी VRS की राह)
प्रोफाइल: जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) मेडिकल कॉलेज में नेफ्रोलॉजी विभाग के सीनियर प्रोफेसर और वरिष्ठ सरकारी चिकित्सक.
VRS का मामला: अंता विधानसभा उपचुनाव लड़ने के लिए 15 साल की न्यूनतम सेवा शर्त के आधार पर VRS की अर्जी लगाई. सरकार द्वारा तत्काल अनुमति न मिलने पर मामला राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने उनके VRS पर त्वरित निर्णय लेने के निर्देश दिए.