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भरतपुर की रियासत से सियासत तक : विश्वेंद्र सिंह का अंतहीन द्वंद्व - वो जो किसी के ना हो सके

Vishvendra Singh political career : राजस्थान की राजनीति में राजघरानों का दखल कोई नई बात नहीं है, लेकिन भरतपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य विश्वेंद्र सिंह की कहानी, बाकी राजनेताओं से एकदम जुदा रही है. महाराजा सूरजमल की विरासत का प्रतीक होने का गौरव, बेबाक और सत्ता के शीर्ष गलियारों में सीधी धमक, इन सबने विश्वेंद्र सिंह को एक ऐसा नेता बनाया जो कभी चर्चाओं से दूर नहीं रहे. लेकिन उनका राजनीतिक और निजी जीवन एक गहरे सवाल के इर्द-गिर्द घूमता रहा है. क्या विश्वेंद्र सिंह कभी किसी राजनीतिक दल या व्यवस्था से खुश हो पाए, या फिर वे अपने मिजाज के चलते किसी को लंबे समय तक खुश नहीं रख सके ? हाल का घटनाक्रम इस अंतहीन सिलसिले की एक नई कड़ी भर है.

भरतपुर की रियासत से सियासत तक : विश्वेंद्र सिंह का अंतहीन द्वंद्व - वो जो किसी के ना हो सके
Image Credit: vishwendra singh politics bharatpur

दलों की अदला-बदली
जनता दल का दौर (1989) : विश्वेंद्र सिंह ने पहली बार संसद का रास्ता 1989 में जनता दल के टिकट पर तय किया. ये वो दौर था जब पूरे देश में गैर-कांग्रेसी लहर चल रही थी और उन्होंने रियासती रसूख के बूते दिल्ली की दहलीज पर कदम रखा.
कांग्रेस में वापसी (1993): जनता दल का बिखराव होते ही वे 1993 में कांग्रेस में आए और नदबई से विधायक चुने गए.
भाजपा का लंबा सफर (1999–2008): नब्बे के दशक के अंत में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने भाजपा के टिकट पर भरतपुर से जीत दर्ज की और संसद में पार्टी का प्रमुख जाट चेहरा बनकर उभरे.
फिर से कांग्रेस का दामन (2008–2026): 2008 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले उन्होंने भाजपा को अलविदा कह दिया और कांग्रेस में लौट आए. डीग-कुम्हेर विधानसभा सीट से वे 2013 और 2018 में विधायक बने और अशोक गहलोत मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री रहे.

अब 2026 में कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व, खासकर गोविंद सिंह डोटासरा और स्थानीय नेताओं से तल्खी के बाद उन्होंने पार्टी से अपनी नाराजगी जता दी है.

राजे से गहलोत तक कैसा रहा सफर
विश्वेंद्र सिंह के राजनीतिक जीवन का सबसे दिलचस्प पहलू ये रहा कि वे राजस्थान के दोनों कद्दावर मुख्यमंत्रियों यानी कि भाजपा की वसुंधरा राजे और कांग्रेस के अशोक गहलोत के बेहद करीबी रहे, लेकिन दोनों के साथ ही उनकी पटरी हमेशा डगमगाती रही.

वसुंधरा राजे के साथ समीकरण
वसुंधरा राजे खुद धौलपुर राजघराने की बहू हैं, जो भरतपुर के पड़ोस में ही है. 2003 में जब राजस्थान में वसुंधरा राजे की सरकार बनी, तो विश्वेंद्र सिंह उनके सबसे खास सिपहसालारों में गिने जाते थे. लेकिन जब संगठन और सरकार में स्थानीय शक्ति संतुलन बिगड़ा, तो विश्वेंद्र सिंह ने बगावत का झंडा बुलंद कर 2008 में भाजपा छोड़ दी.

अशोक गहलोत के साथ खट्टे-मीठे रिश्ते
कांग्रेस में आने के बाद वे अशोक गहलोत के करीबी बने और 2018 में पर्यटन और नागरिक उड्डयन जैसे अहम महकमे के कैबिनेट मंत्री बने. लेकिन 2020 में जब सचिन पायलट ने अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ मानेसर में बगावत की, तो विश्वेंद्र सिंह खुलकर पायलट गुट के साथ खड़े हो गए. गहलोत ने उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया. हालांकि, बाद में जाट संतुलन साधने के लिए गहलोत ने उन्हें दोबारा कैबिनेट में शामिल किया. 

दिगंबर सिंह से अदावत 
भरतपुर की राजनीति को अगर समझना हो, तो विश्वेंद्र सिंह और स्वर्गीय डॉ. दिगंबर सिंह की अदावत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दिगंबर सिंह ,दिग्गज जाट नेता और वसुंधरा सरकार में ताकतवर मंत्री रहे.
2000 के दशक में जब विश्वेंद्र सिंह भाजपा में थे, तब दिगंबर सिंह का कद पार्टी में लगातार बढ़ रहा था. दोनों के बीच वर्चस्व की ये जंग इतनी तीखी हुई कि विश्वेंद्र सिंह ने भाजपा छोड़ दी. 2013 के चुनाव में विश्वेंद्र सिंह ने दिगंबर सिंह को बेहद नजदीकी मुकाबले में हराया.लेकिन नियति का खेल देखिए-2023 के विधानसभा चुनाव में स्वर्गीय दिगंबर सिंह के बेटे, डॉ. शैलेश सिंह ने भाजपा के टिकट पर विश्वेंद्र सिंह को हरा दिया.

राजमहल की चहारदीवारी से अदालत तक
विश्वेंद्र सिंह का जीवन सिर्फ सियासी बगावतों तक सीमित नहीं रहा है. पत्नी दिव्या सिंह (जो खुद 1996 में भरतपुर से सांसद रह चुकी हैं) और उनके इकलौते बेटे अनिरुद्ध सिंह के साथ उनके रिश्ते बेहद कटु मोड़ पर पहुंच गए .
संपत्ति के बंटवारे, भरण-पोषण और पारिवारिक ट्रस्ट को लेकर विवाद इस कदर बढ़ा कि मामला अदालत और पुलिस तक जा पहुंचा.बेटे अनिरुद्ध सिंह ने सोशल मीडिया पर अपने पिता के खिलाफ खुलकर मोर्चेबंदी की और उन पर गंभीर आरोप लगाए.विश्वेंद्र सिंह ने भी अपनी पत्नी और बेटे पर संपत्ति हड़पने और उपेक्षा के आरोप लगाए.

जाट राजनीति और पूर्वी राजस्थान पर क्या पड़ेगा असर ?
भरतपुर रियासत इतिहास में जाट शक्ति का केंद्र रही है. ऐसे में  विश्वेंद्र सिंह का कांग्रेस छोड़ना पूर्वी राजस्थान की जाट राजनीति को कई मायनों में प्रभावित करेगा.


पूर्वी राजस्थान में कांग्रेस का नेतृत्व संकट : शेखावाटी और मारवाड़ की जाट राजनीति से भरतपुर-धौलपुर (ब्रज क्षेत्र) की जाट राजनीति बिल्कुल अलग है.शेखावाटी में गोविंद सिंह डोटासरा भले ही प्रभावशाली हों, लेकिन पूर्वी राजस्थान के जाटों पर उनका कोई खास भावनात्मक प्रभाव नहीं है.विश्वेंद्र सिंह के जाने से कांग्रेस के पास इस इलाके में कोई सर्वमान्य बड़ा जाट चेहरा नहीं बचा है.


वोट बैंक में बिखराव: विश्वेंद्र सिंह के साथ एक पारंपरिक समर्थक वर्ग जुड़ा हुआ है.वे जिस भी खेमे का समर्थन करेंगे या अगर वे निर्दलीय धड़ा तैयार करेंगे, तो कांग्रेस के जाट वोट बैंक में सीधा छेद होगा.

जाट आरक्षण आंदोलन पर असर: भरतपुर और धौलपुर के जाटों को केंद्र में ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, जिसे लेकर समय-समय पर आंदोलन होते रहे हैं.विश्वेंद्र सिंह अक्सर इस आंदोलन की अगुआई या मध्यस्थता करते रहे हैं.पार्टी से मुक्त होकर वे इस मुद्दे को और ज्यादा हवा दे सकते हैं, जो राज्य और केंद्र दोनों सरकारों के लिए सिरदर्द बन सकता है.

 क्या ब्रज बेल्ट में ढह जाएगा कांग्रेस का किला ? 
भरतपुर,डीग,धौलपुर,करौली और सवाई माधोपुर..यानी पूरे भरतपुर संभाग में पूर्व राजपरिवार का गहरा सामाजिक और ऐतिहासिक प्रभाव रहा है. ऐसे संवेदनशील समय में जब पार्टियां गांव-ढाणी तक अपनी बिसात बिछा रही हैं,विश्वेंद्र सिंह की बगावत कांग्रेस के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है,जबकि भारतीय जनता पार्टी को बैठे-बिठाए एक मजबूत चुनावी हथियार मिल गया है. भाजपा इस मुद्दे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी कि कांग्रेस अपने वरिष्ठ जाट नेताओं और ब्रज के ऐतिहासिक नेतृत्व का सम्मान नहीं कर सकती.आने वाले चुनावों में विश्वेंद्र सिंह समर्थित उम्मीदवार निर्दलीय मैदान में उतरते हैं, तो वे मुख्य रूप से कांग्रेस के वोटों में ही सेंध लगाएंगे,जिससे भाजपा उम्मीदवारों की राह आसान हो जाएगी.
 

संभाग में वापसी का मौका
2018 के दौर में कांग्रेस ने इस बेल्ट में मजबूत पकड़ बनाई थी. अब भाजपा के पास पंचायत चुनावों के जरिए ग्रामीण क्षेत्र में कांग्रेस के इस गढ़ को ध्वस्त करने का मौका मिल सकता है. विश्वेंद्र सिंह का कांग्रेस छोड़ना पंचायत चुनावों की दहलीज पर खड़ी कांग्रेस के लिए एक गहरी रणनीतिक चोट है. ग्रामीण राजनीति की नब्ज समझने वाले जानते हैं कि ब्रज बेल्ट में विचारधारा से ज्यादा चेहरे और प्रतिष्ठा के नाम पर वोट पड़ते हैं. अगर कांग्रेस ने समय रहते डैमेज कंट्रोल नहीं किया,तो पूर्वी राजस्थान में पार्टी का ये मजबूत किला पंचायत चुनावों में दरक जाएं इससे इनकार नहीं किया जा सकता है.

घटता हुआ राजसी प्रभाव: हालांकि असर बड़ा होगा, लेकिन ये भी सच है कि 2023 में उनकी हार यह साबित कर चुकी है कि नई पीढ़ी का जाट मतदाता अब सिर्फ 'महाराजा' के नाम पर वोट नहीं देता.सामाजिक समीकरण, विकास और स्थानीय मुद्दे अब राजमहल की छाया पर हावी हो रहे हैं.

कभी किसी से खुश नहीं हुए, या किसी को खुश नहीं रख पाए ?
कुल मिलाकर विश्वेंद्र सिंह की पूरी दास्तान एक ऐसे राजनेता की है, जिसके पास विरासत थी, जनसमर्थन था और सत्ता के शीर्ष तक सीधी पहुंच थी. वे जनता दल में रहे तो वहां नहीं टिके, भाजपा में गए तो वसुंधरा राजे और दिगंबर सिंह से टकराव हो गया, कांग्रेस में आए तो पहले गहलोत के खिलाफ बगावत की और फिर डोटासरा से विवाद के बाद पार्टी को छोड़ने को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल दिया. 
 

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About the Author

Pragati Pant Awasthi

Pragati Pant Awasthi

मीडिया की दुनिया में 18 साल का सफर... एंकरिंग से लेकर डिजिटल की स्क्रीन तक, हर नया बदलाव दिल से अपनाया, जो सोचती हूं, वही कहती हूं, बातों को घुमाना मेरी आदत नहीं, दिल की बात जुबां पर रखना पहचान है. फिलहाल 'ज़ी राजस्थान डिजिटल' के साथ सफर जारी है और हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बरकरार है और रहेगी. Pragati.Pant@india.com ईमेल के जरिए आप संपर्क कर सकते हैं.
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