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राजस्थान पंचायत चुनाव 2026 : राजस्थान के टोंक जिले के ठिकरिया गांव में पंचायत चुनाव खास होता हैं,सरपंच पद के लिए खड़े हो रहे, उम्मीदवार की जीत होती है तो पूरा गांव जीतता है और हार होती है तो पूरा गांव भागेदारी निभाता है. इस बार ठिकरिया ग्राम पंचायत बन चुका है और सरपंच की सीट एसटी वर्ग महिला के लिए आरक्षित हो चुकी है. ऐसे में जल्द ही गांव के बड़े बुजुर्ग अपना प्रत्याशी चुनेंगे.
आमतौर पर किसी भी चुनाव में हारने वाले प्रत्याशी को आर्थिक और मानसिक नुकसान अकेले ही झेलना पड़ता है,लेकिन ठिकरिया गांव में ऐसा नहीं होता है.पिछले दो चुनावों में गांव के बड़े बुजुर्गों ने जगदीश मीणा को चुनावी मैदान में खड़ा किया,लेकिन जगदीश मीणा हार गये.दोनों बार चुनाव का पूरा खर्च पूरे गांव में मिलकर जगदीश मीणा को दिया.
जगदीश मीणा के बेटे रघुवीर मीणा बताते हैं कि उनके गांव में पिछले दो दशकों से ये अनूठी परंपरा कायम है.गांव के लोग आपसी सहमति से अपना एक उम्मीदवार खड़ा करते हैं.रघुवीर मीणा बताते हैं कि उनके पिता,जगदीश मीणा खुद, इस परंपरा के तहत दो बार चुनाव लड़ चुके हैं और दोनों ही बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा.इसके बावजूद,गांव वालों का भरोसा उन पर कायम है और उम्मीद है कि इस बार भी गांव वाले उन्हें या उनके परिवार को ही चुनेंगे.हालांकि इस बार एक बड़ा बदलाव ये आया है कि ये सीट अब एसटी वर्ग महिला के लिए आरक्षित हो चुकी है.ऐसे में उन्हे उम्मीद है कि इस बार जगदीश मीणा के परिवार से ही किसी महिला को गांव की तरफ से प्रत्याशी बनाया जाए. हालांकि अभी तक आधिकारिक तौर पर कुछ पक्का नहीं है, लेकिन गांव की ये एकजुटता अपने आप में एक मिसाल है.
कैसे जमा होता है हारे प्रत्याशी के लिए चंदा ?
जब गांव का चुना हुआ प्रत्याशी चुनाव हार जाता है. हारने के बाद प्रत्याशी को कर्ज या घाटे में नहीं डूबने दिया जाता. चुनाव के नतीजे आने के बाद गांव के सभी बड़े-बुजुर्ग गांव के प्राचीन बालाजी मंदिर पर इकट्ठा होते हैं. वहां एक बैठक होती है और गांव का हर व्यक्ति अपनी हैसियत के मुताबिक चंदा जमा करता है. फिर ये सारा पैसा इकट्ठा करके गांव के बुजुर्ग उस हारने वाले प्रत्याशी को सौंप देते हैं, जिसे गांव वालों ने खुद चुनाव लड़ने के लिए खड़ा किया था. इससे ये साबित होता है कि -जीत पूरे गांव की है,तो हार की जिम्मेदारी भी पूरे गांव की है.
गांव में अब तक 10 सरपंच चुने जा चुके हैं और हर बार यही परंपरा निभाई गयी
गांव के लोगों का कहना है कि इस परंपरा का मकसद चुनाव में पैसे का प्रभाव कम करना और योग्य लोगों को आगे आने के लिए प्रोत्साहित करना है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि ये परंपरा दशकों पहले शुरू हुई थी ,जब आर्थिक रूप से कमजोर परिवार चुनाव लड़ने में असमर्थ होते थे. नई ग्राम पंचायत बनने के बाद ग्रामीणों में विकास को लेकर नई उम्मीदें हैं. गांव के युवाओं का कहना है कि इस बार पंचायत बनने के साथ ही क्षेत्र में शिक्षा,सड़क,पानी और रोजगार की दिशा में बड़े बदलाव देखने की उम्मीद है.
अब तक चुने गये सरपंच और उनके नाम
दुर्गा लाल विजय
छीतर लाल धाकड़ दो बार
रामलाल मीणा दो बार
राजू मीणा
ममता बैरवा
सुशीला गुर्जर
हरिराम मीणा
निवर्तमान सरपंच झमरी देवी मीणा
ठीकरिया कलां गांव पहले चंदवाड़ ग्राम पंचायत में था, इस दौरान ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से जगदीश मीणा को दो बार मैदान उतरा था. लेकिन दोनों बार वो चुनाव हार गए. चुनाव का सारा खर्चा ग्रामीणों ने चंदा जमाकर हारे प्रत्याशी को दिया. यहां ये भी बता दें कि अगर ठिकरिया कलां का कोई ग्रामीण बिना सहमति चुनाव में खड़ा होता है और हार जाता है तो गांव के लोग उसका खर्च नहीं उठाते हैं.
कैसे चुने जाते हैं सरपंच ?
गांव के 18 साल या उससे ज्यादा उम्र के सभी मतदाता, जिनका नाम वोटर लिस्ट में है,वोट डालते हैं.
सरपंच का चुनाव : मतदाता दो वोट डालते हैं. जिसमें एक अपने वार्ड के पंच के लिए और दूसरा सीधे ग्राम पंचायत के सरपंच के लिए होता है. जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वो सरपंच बनता है.
सरपंच के पास क्या पावर होती है ?
सरपंच सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि पूरे गांव का पावर सेंटर है. गांव में पक्की सड़कें बनवाना, नालियों की व्यवस्था,पीने के पानी का प्रबंध और स्ट्रीट लाइट लगवाने का पूरा काम सरपंच की देखरेख में होता है. सरपंच गांव में नियमित तौर पर ग्राम सभा की बैठकें बुलाता है,जिसमें गांव के विकास कार्यों के प्रस्ताव पारित किए जाते हैं.VB-G RAM G/वीबी-जी राम जी,प्रधानमंत्री आवास योजना और पेंशन योजनाओं जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ सही लाभार्थियों तक पहुंचाना सरपंच की जिम्मेदारी है. ये ही नहीं पंचायत के खाते में आने वाले सरकारी फंड को विकास कार्यों पर खर्च करने की शक्ति भी सरपंच के पास होती है. पंचायत के किसी भी भुगतान के लिए सरपंच के हस्ताक्षर जरूरी है. गांव के छोटे-मोटे झगड़ों,जमीन विवाद और पारिवारिक मसलों को पुलिस तक पहुंचने से पहले पंचायत स्तर पर सुलझाने का अधिकार भी सरपंच के पास होता है. इसके अलावा जन्म,मृत्यु और निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भी सरपंच की मुहर जरूरी है.