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दोपहर में सिंबल, रात में प्रचार, सुबह मतदान: 24 घंटे की 'स्प्रिंट रेस' में उलझा सरपंच चुनाव, नए प्रत्याशियों के सामने पहचान का संकट

Rajasthan News: राजस्थान सरपंच चुनाव में एक दिन नामांकन और अगले दिन मतदान की व्यवस्था ने बहस छेड़ दी है. यह तरीका नया नहीं, बल्कि 1995-2015 के बैलेट पेपर दौर की वापसी है. 2020 में EVM के कारण प्रक्रिया अलग थी.

Written By SAGAR CHAUDHARY
Published: Oct 05, 2026, 10:06 PM IST | Updated: Oct 05, 2026, 10:09 PM IST
Image Credit: Rajasthan Panchayat Chunav (AI IMAGE)
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Rajasthan Panchayat Chunav: राजस्थान के सरपंच चुनावों में इस बार एक दिन नामांकन और अगले दिन मतदान की व्यवस्था ने गांवों में नई चर्चा छेड़ दी है. प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न मिलने के बाद प्रचार के लिए बहुत कम समय मिल रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इतनी कम समय-सीमा क्यों रखी गई और क्या यह व्यवस्था नई है? दरअसल, यह तरीका पूरी तरह नया नहीं है. 1995 से 2015 के बीच बैलेट पेपर से होने वाले सरपंच चुनावों में इसी तरह कम समय में नामांकन, चुनाव चिह्न आवंटन और मतदान की प्रक्रिया होती थी. 2020 में EVM के इस्तेमाल के कारण मतदान में अंतर आया था. अब बैलेट पेपर की वापसी के साथ पुरानी व्यवस्था भी लौटती दिखाई दे रही है.

1995 से 2015 तक कैसे होते थे चुनाव?
सरपंच चुनावों में कम समय के अंतराल वाली व्यवस्था को समझने के लिए पुराने चुनावों पर नजर डालना जरूरी है. 1995 से 2015 के बीच सरपंच के चुनाव बैलेट पेपर से होते थे. उस समय प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न मिलने और मतदान के बीच ज्यादा लंबा अंतर नहीं होता था. गांवों में चुनाव प्रचार का बड़ा आधार व्यक्तिगत संपर्क, चौपाल, रिश्तेदारी और स्थानीय पहचान हुआ करता था.

यानी आज जिस व्यवस्था को लेकर कई प्रत्याशी और मतदाता सवाल उठा रहे हैं, उसका एक पुराना आधार पहले से मौजूद है. ग्रामीण इलाकों में चुनावी प्रक्रिया लंबे समय तक इसी तरह कम समय में पूरी होती रही है.

2020 में क्यों बदली थी व्यवस्था?
2020 के सरपंच चुनाव इस मामले में अलग थे. उस चुनाव में EVM का इस्तेमाल किया गया था. EVM के जरिए मतदान कराने के लिए प्रत्याशियों के नाम और चुनाव चिह्न मशीनों में फीड करने, बैलेट यूनिट तैयार करने और जरूरी जांच पूरी करने में समय लगता है. इसी वजह से नामांकन के करीब सात दिन बाद मतदान कराया गया था.

इस बार फिर बैलेट पेपर से चुनाव होने के कारण EVM से जुड़ी तैयारी की जरूरत नहीं है. ऐसे में नामांकन और मतदान के बीच कम समय रखने वाली पुरानी व्यवस्था फिर लागू होती दिख रही है.

एक दिन में चुनाव प्रचार की पूरी चुनौती
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत और चुनौती दोनों ही समय है. प्रत्याशी को चुनाव चिह्न मिलने के बाद उसके पास मतदाताओं तक अपनी पहचान और चुनाव चिह्न पहुंचाने के लिए बहुत कम वक्त होता है. कई मामलों में दोपहर या शाम तक चुनाव चिह्न मिलने के बाद रात में प्रचार की तैयारी करनी पड़ती है और अगली सुबह मतदान शुरू हो जाता है.

ऐसे में प्रत्याशी के पास लंबी रैलियां, घर-घर संपर्क या अलग-अलग गांवों और ढाणियों में जाकर प्रचार करने का मौका नहीं रहता. पूरी रणनीति कुछ घंटों में तैयार करनी पड़ती है.

सोशल मीडिया ने बदली प्रचार की तस्वीर
हालांकि आज की स्थिति 1995 या 2000 के दशक से काफी अलग है. उस समय प्रत्याशी को अपना चुनाव चिह्न लोगों तक पहुंचाने के लिए पर्चे छपवाने पड़ते थे और घर-घर जाकर प्रचार करना पड़ता था. इसमें समय लगता था.

अब WhatsApp, Facebook और Instagram जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने प्रचार का तरीका बदल दिया है. चुनाव चिह्न मिलते ही प्रत्याशी अपना फोटो, नाम और सिंबल सोशल मीडिया पर भेज सकता है. कुछ ही समय में यह जानकारी बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकती है. इस लिहाज से कम समय की प्रचार अवधि को तकनीक कुछ हद तक आसान बना देती है. लेकिन यह सुविधा हर प्रत्याशी के लिए बराबर हो, ऐसा जरूरी नहीं है.

नए प्रत्याशियों के सामने बड़ी चुनौती
कम समय की यह व्यवस्था सबसे ज्यादा उन प्रत्याशियों के लिए चुनौती बन सकती है, जो पहली बार चुनाव मैदान में उतरे हैं. पुराने और स्थानीय स्तर पर चर्चित प्रत्याशियों की पहचान पहले से होती है. गांव के लोगों को उनका नाम और चेहरा पता होता है.

इसके उलट नए प्रत्याशी को अपने नाम के साथ चुनाव चिह्न भी मतदाताओं तक पहुंचाना होता है. अगर उसके पास मजबूत जमीनी नेटवर्क या डिजिटल पहुंच नहीं है, तो कुछ घंटों में अपनी पहचान बनाना मुश्किल हो सकता है.

यही वजह है कि कुछ लोग इसे चुनाव प्रचार के लिए पर्याप्त समय नहीं मानते. उनके अनुसार लोकतांत्रिक चुनाव में मतदाताओं को सभी प्रत्याशियों के बारे में जानकारी हासिल करने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए.

वोटर टर्नआउट पर क्या असर पड़ेगा?
कम समय की चुनाव प्रक्रिया का एक अहम पहलू वोटर टर्नआउट भी है. ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाता अक्सर प्रत्याशियों की व्यक्तिगत पहचान, परिवार और स्थानीय समीकरणों के आधार पर चुनावी फैसला करते हैं. लेकिन जब प्रचार का समय बहुत कम हो, तो नए प्रत्याशियों की जानकारी ज्यादा लोगों तक नहीं पहुंच पाने की संभावना रहती है.

दूसरी तरफ, कम समय में चुनाव होने से मतदाताओं के बीच लंबे समय तक चलने वाली चुनावी गतिविधियां और विवाद भी कम हो सकते हैं. यानी इसका असर सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह से देखा जा सकता है.

हालांकि वास्तविक असर जानने के लिए मतदान प्रतिशत के आंकड़ों की तुलना पुराने चुनावों से करनी होगी. सिर्फ कम प्रचार अवधि के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि इससे वोटर टर्नआउट बढ़ेगा या घटेगा.

अमान्य वोट का भी रहेगा सवाल
बैलेट पेपर की वापसी के साथ अमान्य वोट यानी Invalid Votes का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो जाता है. EVM में मतदाता को अपनी पसंद के प्रत्याशी का बटन दबाना होता है, जबकि बैलेट पेपर में निर्धारित तरीके से निशान लगाना पड़ता है.

अगर मतदाता गलत जगह निशान लगाता है, एक से ज्यादा जगह निशान लगा देता है या निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार वोट नहीं करता, तो उसका मत अमान्य हो सकता है. इसलिए बैलेट पेपर चुनाव में मतदाताओं को मतदान का तरीका ठीक से समझना जरूरी है.

खासकर ऐसे मतदाता जो पहली बार बैलेट पेपर से मतदान कर रहे हैं, उनके लिए प्रक्रिया की जानकारी महत्वपूर्ण होगी. अमान्य वोट की संख्या चुनाव परिणाम पर कितना असर डालती है, यह चुनाव के बाद सामने आने वाले आंकड़ों से ही स्पष्ट होगा.

क्या कम समय में चुनाव गलत है?
इस सवाल का सीधा जवाब देना आसान नहीं है. प्रशासनिक नजरिए से देखें तो बैलेट पेपर के जरिए चुनाव प्रक्रिया जल्दी पूरी करना संभव है. पुरानी व्यवस्था में भी ऐसा होता रहा है. वहीं प्रत्याशियों के नजरिए से देखें तो प्रचार के लिए बहुत कम समय मिलना निश्चित तौर पर चुनौती है. इसलिए बहस असल में सिर्फ एक दिन और दूसरे दिन मतदान की नहीं है. सवाल यह है कि क्या मतदाता को सभी प्रत्याशियों और उनके चुनाव चिह्न के बारे में पर्याप्त जानकारी मिल पा रही है.

पुरानी व्यवस्था, लेकिन बदला हुआ दौर
सरपंच चुनावों की मौजूदा व्यवस्था को 1995 से 2015 के दौर की वापसी इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि उस समय भी बैलेट पेपर के साथ कम समय में चुनाव प्रक्रिया पूरी होती थी. 2020 में EVM के कारण व्यवस्था बदली और अब बैलेट पेपर आने के साथ पुराना तरीका वापस दिखाई दे रहा है.

फर्क सिर्फ इतना है कि तब चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम गांव की चौपाल और घर-घर संपर्क था, जबकि अब मोबाइल फोन और सोशल मीडिया भी अहम भूमिका निभाते हैं. इसलिए आज का चुनाव पुराने सिस्टम और नई तकनीक का मिला-जुला रूप नजर आता है.

FAQ: सरपंच चुनाव से जुड़े सवाल

सवाल: एक दिन नामांकन और अगले दिन मतदान क्यों हो रहा है?
जवाब: बैलेट पेपर से चुनाव होने के कारण EVM में नाम और चुनाव चिह्न फीड करने जैसी तैयारियों की जरूरत कम हो जाती है. इसी वजह से पुरानी कम समय वाली व्यवस्था अपनाई जा रही है.

सवाल: क्या ऐसी व्यवस्था पहले भी रही है?
जवाब: हां. 1995 से 2015 के बीच सरपंच चुनाव बैलेट पेपर से होते थे और कम समय में मतदान की प्रक्रिया पूरी होती थी.

सवाल: 2020 में ज्यादा समय क्यों मिला था?
जवाब: 2020 में EVM का इस्तेमाल हुआ था. मशीनों में प्रत्याशियों की जानकारी फीड करने और जरूरी तैयारी के कारण मतदान बाद में कराया गया था.

सवाल: क्या कम समय से नए प्रत्याशियों को नुकसान हो सकता है?
जवाब: नए प्रत्याशियों के लिए चुनौती जरूर बढ़ सकती है, क्योंकि उन्हें कम समय में अपना नाम और चुनाव चिह्न मतदाताओं तक पहुंचाना होता है.

सवाल: क्या बैलेट पेपर में वोट अमान्य हो सकता है?
जवाब: हां. अगर मतदाता निर्धारित तरीके से निशान नहीं लगाता या एक से ज्यादा विकल्प पर निशान लगा देता है, तो मत अमान्य हो सकता है.

सवाल: क्या कम समय से वोटिंग प्रतिशत प्रभावित होगा?
जवाब: इसका पक्का निष्कर्ष मतदान के आंकड़े आने के बाद ही निकाला जा सकता है. सिर्फ प्रचार के कम समय के आधार पर टर्नआउट बढ़ने या घटने का दावा नहीं किया जा सकता.

सवाल: इस चुनाव में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
जवाब: चुनाव प्रक्रिया पुरानी बैलेट पेपर वाली है, लेकिन प्रचार का तरीका बदल गया है. अब गांव की चौपाल के साथ सोशल मीडिया भी प्रत्याशियों के लिए बड़ा माध्यम बन गया है.

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सागर चौधरी, अप्रैल 2024 से वे ज़ी न्यूज़ संस्थान का हिस्सा हैं और अपनी मेहनत व काम करने की क्षमता से लगातार टीम में योगदान दे रहे हैं.सागर चौधरी का संबंध हरियाणा के फरीदाबाद से है, जहां उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की और मीडिया क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की.
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