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Rajasthan Nikay Chunav Independent Candidate Symbols: राजस्थान में निकाय चुनाव की तस्वीर गुरुवार शाम तक पूरी तरह साफ हो जाएगी. गुरुवार दोपहर 3 बजे तक प्रत्याशी अपना नामांकन वापस ले सकेंगे. इसके बाद जिला निर्वाचन अधिकारी की ओर से प्रत्याशियों की फाइनल लिस्ट जारी की जाएगी. इसके अगले दिन चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे. राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को उनके तय पार्टी चिन्ह मिलेंगे, जबकि निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए अलग-अलग चुनाव चिन्ह तय किए गए हैं. इन चिन्हों में अलमारी, चारपाई से लेकर हरी मिर्च और फूलगोभी तक शामिल हैं.
निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए 40 चुनाव चिन्ह
निर्दलीय प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने के लिए निर्वाचन अधिकारी की ओर से मुक्त चुनाव चिन्ह दिए जाते हैं. निकाय चुनाव में ऐसे 40 चुनाव चिन्ह उपलब्ध हैं. इनमें रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाली कई चीजों को शामिल किया गया है.
इनमें अलमारी, चप्पल, सेब, कोट, गुब्बारा, चारपाई, चूड़ियां, मिक्सी, पेंसिल डिब्बा, बेंच, तकिया, बक्सा, बांसुरी, बाल्टी, टीवी, टेलीफोन, गैस का चूल्हा, साइकिल पंप, अंगूर, आरी, हरी मिर्च, स्कूल का बस्ता, हाथ गाड़ी, कैंची, हारमोनियम, सिलाई मशीन, आइसक्रीम और जूता जैसे चिन्ह हैं. यानी इस बार निर्दलीय प्रत्याशी लोगों से यह कह सकेंगे कि वोट उनके नाम पर नहीं, बल्कि किसी पहचानी जाने वाली चीज के निशान पर देना है.
अलमारी और चारपाई बनी पहली पसंद
निर्दलीय प्रत्याशियों के बीच सबसे ज्यादा पसंद अलमारी और चारपाई जैसे चुनाव चिन्हों को किया जा रहा है. कई प्रत्याशियों ने घरेलू काम में आने वाली चीजों को अपनी पसंद में रखा है.
इसके अलावा गुब्बारा, मिक्सी, सेब, आइसक्रीम और सिलाई मशीन जैसे चिन्ह भी प्रत्याशियों को पसंद आ रहे हैं. जयपुर नगर निगम में हरी मिर्च, फूलगोभी और चूड़ियों को ज्यादा पसंद नहीं किया गया है. वहीं फ्रिज, टीवी, गैस का चूल्हा और जूते जैसे चिन्हों को चुनने वाले प्रत्याशी भी हैं.
चाय की केतली से चिमटे तक
चुनाव चिन्हों की इस सूची में कई ऐसे प्रतीक भी हैं जो राजस्थान के गांवों और कस्बों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हुए हैं. इनमें चाय की केतली, चिमटा, ओखली-मूसल, लाठी, स्लेट, पेंसिल, लेटर बॉक्स, राजमिस्त्री की करनी और पारंपरिक भारी इस्त्री जैसे चिन्ह शामिल हैं.
वार्ड सदस्य पद के निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए चारपाई, हाथ से चलने वाली पत्थर की चक्की, सिलाई मशीन, पुराना टेलीफोन, आरी, लोहे का संदूक और चेन जैसे चिन्ह भी रखे गए हैं.
हरी मिर्च, फूलगोभी और नाव भी चुनाव मैदान में
इस बार चुनाव चिन्हों में सब्जी और रोजमर्रा की दूसरी चीजों की भी झलक दिखाई दे रही है. फूलगोभी, अंगूर, हरी मिर्च, हाथगाड़ी, ईंट, फव्वारा, साइकिल पंप और पाल वाली नाव जैसे चिन्ह भी निर्दलीय प्रत्याशियों को दिए जा सकते हैं.
वहीं राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों के चिन्ह पहले से तय हैं. ऐसे में उनके सामने पार्टी का वही चुनाव चिन्ह रहेगा, जिससे मतदाता उन्हें पहचानते हैं.
प्रत्याशी खुद चुनेंगे तीन पसंद
नामांकन भरते समय निर्दलीय प्रत्याशी अपनी पसंद के तीन चुनाव चिन्ह बता सकते हैं. वे इन्हें पहली, दूसरी और तीसरी पसंद के तौर पर दर्ज कराते हैं. हालांकि अंतिम रूप से कौन सा चिन्ह मिलेगा, इसका फैसला निर्वाचन अधिकारी करते हैं.
नामांकन वापस लेने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव चिन्हों का आवंटन किया जाएगा. अगर किसी चिन्ह को केवल एक प्रत्याशी ने पसंद किया है और वह उपलब्ध है, तो उसे वह चिन्ह दिया जा सकता है.
एक ही चिन्ह पर कई दावेदार तो लॉटरी
अगर एक ही चुनाव चिन्ह को कई निर्दलीय प्रत्याशियों ने पहली पसंद बताया है, तो मामला दिलचस्प हो जाएगा. ऐसी स्थिति में लॉटरी के जरिए फैसला किया जाएगा.
लॉटरी में जिस प्रत्याशी के नाम वह चुनाव चिन्ह आएगा, उसे वही चिन्ह आवंटित कर दिया जाएगा. बाकी प्रत्याशियों को उनकी अगली पसंद या उपलब्ध दूसरे चिन्ह दिए जाएंगे. इस तरह नाम वापसी के बाद न सिर्फ प्रत्याशियों की संख्या साफ होगी, बल्कि यह भी तय हो जाएगा कि मैदान में कौन किस निशान के साथ वोट मांगने उतरेगा.
पुराने चिन्हों की आज भी अपनी पहचान
आज चुनाव प्रचार में 5G, सोशल मीडिया, AI, ड्रोन और इंस्टाग्राम रील्स का इस्तेमाल खूब हो रहा है. इसके बावजूद मतपत्र पर चुनाव चिन्ह अब भी ऐसी चीजों के रखे जाते हैं जिन्हें आम आदमी आसानी से पहचान सके.
चारपाई, चिमटा, केतली, चक्की या अलमारी जैसी चीजें गांव-कस्बों में हर किसी की नजर में जानी-पहचानी हैं. खासकर स्थानीय चुनाव में जहां कई मतदाता उम्मीदवारों के नाम से ज्यादा उनके चुनाव चिन्ह को याद रखते हैं, वहां ये प्रतीक काफी काम आते हैं.
अब आने वाले दिनों में चुनावी मैदान में इन चिन्हों को लेकर भी खूब प्रचार देखने को मिलेगा. कोई प्रत्याशी चारपाई को अपनी पहचान बनाएगा तो कोई केतली, चिमटा या अलमारी के नाम पर वोट मांगेगा. यानी निकाय चुनाव की चुनावी चौपालों में इस बार मुद्दों और नारों के साथ-साथ चुनाव चिन्हों की भी अलग कहानी देखने को मिलेगी.