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Jaipur Nagar Nigam: जयपुर नगर निगम चुनाव में इस समय हर वार्ड में टिकट की दौड़ तेज है. बड़ी संख्या में दावेदार पार्षद बनने के लिए जोर लगा रहे हैं. लेकिन इस चुनावी माहौल के बीच जयपुर नगर निगम का राजनीतिक इतिहास एक दिलचस्प सवाल खड़ा करता है- क्या पार्षद बनना विधानसभा पहुंचने की पहली सीढ़ी है? जयपुर के पुराने चुनावों और नेताओं के राजनीतिक सफर को देखें तो इसका जवाब पूरी तरह हां नहीं है. निगम से विधानसभा तक पहुंचने वाले नेताओं की संख्या काफी कम रही है. खास बात यह है कि महापौर की कुर्सी संभाल चुके तीन नेता बाद में विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने, जबकि सामान्य पार्षद से सीधे विधायक बनने का उदाहरण अब तक सिर्फ सुरेंद्र पारीक के नाम है.
मेयर की कुर्सी से विधानसभा तक पहुंचे मोहनलाल गुप्ता
जयपुर नगर निगम की राजनीति से विधानसभा तक पहुंचने वाले प्रमुख नेताओं में सबसे पहला नाम पूर्व महापौर मोहनलाल गुप्ता का आता है. वे जयपुर के पहले महापौर रहे. निगम की राजनीति में पहचान बनाने के बाद उन्होंने विधानसभा चुनाव का रुख किया. वर्ष 2003 में वे किशनपोल विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर पहली बार विधायक बने.
इसके बाद उनका राजनीतिक सफर यहीं नहीं रुका. वे कुल तीन बार विधानसभा पहुंचे. यानी नगर निगम से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर आगे बढ़ते हुए प्रदेश की राजनीति तक पहुंचा. मोहनलाल गुप्ता का उदाहरण बताता है कि जयपुर शहर की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाने के बाद विधानसभा का रास्ता खुल सकता है.
अशोक परनामी ने भी नगर निगम से बनाई बड़ी पहचान
जयपुर नगर निगम से विधानसभा और फिर प्रदेश संगठन तक पहुंचने वाले नेताओं में अशोक परनामी का नाम भी खास है. परनामी महापौर की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. शहर की राजनीति में सक्रिय रहने के बाद उन्हें विधानसभा चुनाव में मौका मिला.
उन्होंने आदर्श नगर विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर वर्ष 2008 और 2013 में चुनाव जीता. लगातार दो बार विधायक बनने के बाद उनका कद पार्टी में और बढ़ा. आगे चलकर उन्हें भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी मिली.
इस तरह उनका राजनीतिक सफर भी एक पूरी सीढ़ी जैसा दिखाई देता है. पहले नगर निगम की राजनीति, फिर महापौर की कुर्सी, उसके बाद विधानसभा और फिर प्रदेश संगठन में बड़ी जिम्मेदारी. जयपुर नगर निगम से निकलकर प्रदेश स्तर तक पहुंचने वाले नेताओं में उनका सफर सबसे चर्चित उदाहरणों में शामिल है.
अशोक लाहोटी के लिए भी मेयर की कुर्सी बनी विधानसभा की एंट्री
जयपुर नगर निगम के पूर्व महापौर अशोक लाहोटी का राजनीतिक सफर भी कुछ ऐसा ही रहा. महापौर की जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई. उन्हें सांगानेर विधानसभा सीट से भाजपा का टिकट मिला और उन्होंने चुनाव जीतकर विधानसभा में एंट्री की.
लाहोटी के लिए नगर निगम की राजनीति विधानसभा तक पहुंचने का बड़ा जरिया बनी. हालांकि बाद के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उनका टिकट दोबारा नहीं दिया. इसके बावजूद उनका उदाहरण जयपुर नगर निगम के उस इतिहास को मजबूत करता है, जिसमें महापौर की कुर्सी संभालने वाले नेता विधानसभा की राजनीति में जगह बनाने में सफल रहे.
यानी अब तक जयपुर के तीन महापौर ऐसे रहे हैं, जिन्होंने नगर निगम की राजनीति के बाद विधानसभा चुनाव जीता. यही वजह है कि इस बार पार्षद बनने की दौड़ में शामिल कई दावेदारों की नजर सिर्फ वार्ड तक सीमित नहीं है. कई नेताओं के लिए पार्षद का टिकट भविष्य में महापौर बनने की पहली कोशिश हो सकती है.
सुरेंद्र पारीक का सफर सबसे अलग
जयपुर नगर निगम की राजनीति से विधानसभा पहुंचने का सबसे अलग उदाहरण पूर्व विधायक सुरेंद्र पारीक का है. उन्होंने महापौर बने बिना ही पार्षद रहते हुए विधानसभा का सफर तय किया.
सुरेंद्र पारीक हवामहल विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और विधायक बनने में सफल रहे. खास बात यह है कि वे दो बार विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहे. नगर निगम के इतिहास में सामान्य पार्षद से सीधे विधानसभा पहुंचकर दो बार विधायक बनने का उदाहरण फिलहाल उनके नाम से जुड़ा है.
यही वजह है कि पार्षद से विधायक बनने की बात आती है तो सुरेंद्र पारीक का नाम सबसे पहले लिया जाता है. उनका राजनीतिक सफर यह भी बताता है कि विधानसभा पहुंचने के लिए महापौर बनना जरूरी नहीं है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं.
कई बड़े चेहरे चुनाव लड़े, लेकिन विधानसभा नहीं पहुंच सके
ऐसा नहीं है कि नगर निगम की राजनीति में सक्रिय रहने वाले हर नेता को विधानसभा में जगह मिली. जयपुर में कई ऐसे नेता रहे, जिन्होंने पार्षद या महापौर के तौर पर अपनी पहचान बनाई और बाद में विधानसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके.
भाजपा की शील धाभाई महापौर रह चुकी हैं. पार्टी ने वर्ष 2008 में उन्हें कोटपूतली विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा. लेकिन वे चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं पहुंच सकीं.
इसी तरह ज्योति खंडेलवाल जयपुर नगर निगम की एकमात्र कांग्रेस महापौर रही हैं. वे सीधे चुनाव के जरिए महापौर चुनी गई थीं. नगर निगम में अपनी पहचान बनाने के बाद उन्होंने जयपुर से लोकसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन जीत हासिल नहीं कर पाईं. अब वे भाजपा में हैं.
इससे साफ है कि महापौर बनना राजनीतिक रूप से बड़ा पड़ाव जरूर है, लेकिन इसके बाद चुनाव जीतना अपने आप तय नहीं हो जाता.
अर्चना शर्मा और हरीश यादव को भी नहीं मिली सफलता
जयपुर नगर निगम की राजनीति से विधानसभा चुनाव तक पहुंचने वाले दूसरे नामों में अर्चना शर्मा भी शामिल हैं. वे पार्षद रह चुकी हैं और कांग्रेस के टिकट पर मालवीय नगर विधानसभा सीट से तीन बार चुनाव लड़ चुकी हैं. हालांकि तीनों ही मौकों पर उन्हें जीत नहीं मिली.
बाद में कांग्रेस सरकार में उन्हें समाज कल्याण बोर्ड की चेयरमैन की जिम्मेदारी मिली. यानी चुनावी हार के बावजूद पार्टी में उनका राजनीतिक कद बना रहा.
हरीश यादव ने भी झोटवाड़ा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन वे विधानसभा तक नहीं पहुंच सके. वहीं विक्रम सिंह शेखावत पहले पार्षद रहे. इसके बाद उन्होंने विद्याधर नगर विधानसभा सीट से दो बार कांग्रेस के टिकट पर और एक बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा. तीनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा.
इन उदाहरणों से एक बात साफ होती है कि नगर निगम की राजनीति में मजबूत पकड़ होना और विधानसभा चुनाव जीतना दो अलग बातें हैं.
2026 में फिर कई दावेदारों की नजर मेयर की कुर्सी पर
अब 2026 के नगर निगम चुनाव में एक बार फिर बड़ी संख्या में नए चेहरे पार्षद बनने की तैयारी कर रहे हैं. टिकट के लिए दावेदारों के बीच मुकाबला तेज है. कई नेता पहली बार चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि कुछ पुराने चेहरे भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं.
इनमें से कई दावेदार ऐसे भी होंगे, जिनकी नजर सिर्फ पार्षद बनने तक नहीं रहेगी. पहले वार्ड जीतना, फिर बोर्ड में प्रभाव बनाना और उसके बाद मेयर की कुर्सी तक पहुंचना उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है. इसके आगे विधानसभा चुनाव भी उनके लिए बड़ा लक्ष्य हो सकता है.
जयपुर का इतिहास दावेदारों को क्या बताता है?
जयपुर नगर निगम का पुराना रिकॉर्ड देखें तो मेयर से विधायक बनने का रास्ता कुछ नेताओं के लिए जरूर खुला है. मोहनलाल गुप्ता, अशोक परनामी और अशोक लाहोटी इसके बड़े उदाहरण हैं. वहीं सुरेंद्र पारीक ने पार्षद रहते हुए सीधे विधानसभा पहुंचकर अलग मिसाल कायम की.
लेकिन दूसरी तरफ शील धाभाई, ज्योति खंडेलवाल, अर्चना शर्मा, हरीश यादव और विक्रम सिंह शेखावत जैसे उदाहरण भी हैं, जो बताते हैं कि निगम की राजनीति में पहचान बनाने के बाद भी विधानसभा चुनाव जीतना आसान नहीं है.
यही वजह है कि 2026 में चुने जाने वाले पार्षदों के लिए वार्ड की जीत सिर्फ पहला पड़ाव होगी. असली चुनौती अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की होगी. जयपुर का इतिहास साफ संकेत देता है कि पार्षद की कुर्सी विधानसभा तक पहुंचने की सीढ़ी जरूर बन सकती है, लेकिन हर किसी के लिए यह सीढ़ी मंजिल तक नहीं पहुंचाती. इस बार चुने जाने वाले पार्षदों में से किसे मेयर की कुर्सी मिलेगी और कौन आगे विधानसभा तक छलांग लगाएगा, इस पर सभी की नजर रहेगी.