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Jal Jeevan Mission: दिल्ली-राजस्थान के जल जीवन मिशन से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और टेंडर अनियमितता के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दो आरोपियों को जमानत दे दी. कोर्ट ने संजय बड़ाया और शुभांशु दीक्षित की जमानत याचिकाओं पर राजस्थान हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए दोनों को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है.
104 टेंडर और ₹979.45 करोड़ की राशि
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में अभियोजन के मामले का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि राजस्थान के पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (PHED) में जल जीवन मिशन के क्रियान्वयन के दौरान कथित वित्तीय अनियमितताएं सामने आईं. अभियोजन के अनुसार दो निजी ठेका कंपनियों ने कथित तौर पर IRCON International Limited के नाम से फर्जी कार्य-अनुभव और पूर्णता प्रमाणपत्र हासिल किए.
इन दस्तावेजों के आधार पर दोनों कंपनियों ने कथित तौर पर पात्रता हासिल कर करीब 104 टेंडर प्राप्त किए. इन टेंडरों की कुल राशि करीब ₹979.45 करोड़ बताई गई है. अभियोजन ने आरोप लगाया है कि इससे राज्य के खजाने को भारी आर्थिक नुकसान हुआ.
ACB ने दाखिल की चार्जशीट
मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने 12 अप्रैल 2026 को चार्जशीट और 29 जून 2026 को सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की. अभियोजन के मुताबिक मामले में 124 गवाहों को पेश किया जाना है और हजारों पन्नों के दस्तावेजी साक्ष्यों पर भरोसा किया गया है.
दोनों आरोपियों पर क्या आरोप हैं?
शुभांशु दीक्षित संबंधित अवधि में राजस्थान वाटर सप्लाई एंड सीवरेज मैनेजमेंट बोर्ड के सचिव थे और PHED फाइनेंस कमेटी में भी भूमिका निभा रहे थे. अभियोजन ने आरोप लगाया कि उन्होंने कथित शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की और कथित रूप से अयोग्य फर्मों को टेंडर मिलने में मदद की. उन्हें 17 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया था.
संजय बड़ाया निजी व्यक्ति हैं. अभियोजन ने उन्हें तत्कालीन PHED मंत्री महेश जोशी की ओर से काम करने वाला कथित बिचौलिया बताया है. उन पर ठेकेदारों से कथित तौर पर रिश्वत लेने और विभागीय कामकाज को प्रभावित करने के आरोप लगाए गए हैं. उन्हें 11 मई 2026 को गिरफ्तार किया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दी जमानत?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों आरोपियों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल हो चुकी है. मामले में अधिकांश साक्ष्य दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक हैं तथा जांच एजेंसी के पास सुरक्षित हैं. कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि अभी आरोप तय नहीं हुए हैं और मुकदमे की शुरुआत नहीं हुई है.
कोर्ट ने कहा कि मुकदमे में बड़ी मात्रा में साक्ष्य पेश किए जाने हैं और सुनवाई लंबी चलने की संभावना है. ऐसे में दोनों आरोपियों को आगे प्री-ट्रायल हिरासत में रखने का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं होगा.
₹979.45 करोड़ की राशि को कोर्ट ने जुर्माने के रूप में निर्धारित नहीं किया है. यह राशि अभियोजन के अनुसार 104 टेंडरों की कुल कीमत है और कथित रूप से राज्य के खजाने को हुए नुकसान का उल्लेख भी अभियोजन के आरोप के रूप में है.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश केवल जमानत याचिकाओं के निस्तारण तक सीमित है. कोर्ट ने आरोपों की सत्यता, आरोपियों की भूमिका या साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर कोई राय नहीं दी है. इन मुद्दों पर फैसला ट्रायल कोर्ट करेगा.