Hanumanta Exo Suit: राजस्थान के कोटा के इंजीनियर गौरव राय की टीम भारतीय जवानों के लिए ऐसा ह्यूमन एक्सोसूट तैयार कर रही है, जो भारी सैन्य सामान उठाकर चलने के दौरान शरीर पर पड़ने वाले बोझ और दबाव को कम करने में मदद करेगा. इस तकनीक को ‘हनुमंता एक्सो-1’ नाम दिया गया है. यह अभी अपने एडवांस वर्जन तक पहुंच चुका है और इसका मकसद खासतौर पर उन सैनिकों की परेशानी कम करना है, जो रेगिस्तान, बर्फीले इलाकों, पहाड़ों और जंगलों जैसे कठिन क्षेत्रों में लंबे समय तक भारी सामान लेकर चलते हैं. यह सूट फिलहाल बिना बिजली और बैटरी के काम करने वाला उपकरण है. टीम ने अभी तक करीब 80 किलो वजन संभालने की क्षमता हासिल कर ली है और आगे इसे और बेहतर बनाने पर काम चल रहा है.
आखिर क्या है ह्यूमन एक्सोसूट?
ह्यूमन एक्सोसूट को आसान भाषा में शरीर के बाहर पहने जाने वाला ऐसा ढांचा समझ सकते हैं, जो भारी सामान उठाते समय शरीर का साथ देता है. सैनिक जब लंबे समय तक हथियार, बैग और दूसरे जरूरी सामान लेकर चलते हैं तो इसका असर उनके कंधों, पीठ, कमर, कूल्हों और पैरों पर पड़ता है.
इंजीनियर गौरव राय के मुताबिक, सैनिकों के सामने सिर्फ एक तरह का वजन नहीं होता. एक स्थिति में उन्हें पीठ पर बैग लेकर चलना होता है, जबकि दूसरी स्थिति में जमीन से कोई भारी सामान उठाना पड़ता है. दोनों परिस्थितियों में शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर दबाव पड़ता है. इसी दबाव को कम करने के लिए अलग-अलग तरह के एक्सोसूट तैयार किए जा रहे हैं.
सैनिकों के शरीर पर कैसे पड़ता है भारी सामान का असर?
भारतीय जवानों को कई बार 60 किलो या उससे ज्यादा वजन लेकर भी लंबे समय तक चलना पड़ सकता है. खासकर कठिन इलाकों में यह काम और मुश्किल हो जाता है. लंबे समय तक ऐसा करने से कंधों और पीठ पर दबाव बढ़ता है. घुटनों और कमर में दर्द जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं.
गौरव बताते हैं कि जब कोई सैनिक बुलेटप्रूफ जैकेट और भारी सामान के साथ चलता है तो वजन का असर केवल कंधों तक सीमित नहीं रहता. रीढ़ की हड्डी और शरीर के निचले हिस्से पर भी इसका दबाव पड़ता है. इसलिए ऐसा ढांचा जरूरी है जो पूरे शरीर के साथ काम करे और वजन के असर को कम कर सके.

‘हनुमंता एक्सो-1’ कैसे करता है काम?
‘हनुमंता एक्सो-1’ एक पैसिव एक्सोसूट है. यानी इसे चलाने के लिए मोटर, बैटरी या बिजली की जरूरत नहीं पड़ती. यह पूरी तरह यांत्रिक तरीके से काम करता है.
गौरव के अनुसार, इस उपकरण में डेल्टा स्प्रिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है. इसे इस तरह समझ सकते हैं कि पीठ पर रखा वजन सीधे शरीर पर दबाव डालने के बजाय जूतों के रास्ते जमीन की तरफ भेजा जाता है. गौरव ने इसे बिजली की अर्थिंग से समझाया.
यानी सैनिक की पीठ पर जो वजन है, उसका कुछ हिस्सा शरीर पर टिके रहने के बजाय इस ढांचे के जरिए जमीन की तरफ चला जाता है. इससे शरीर पर पड़ने वाला दबाव कम होता है.

क्या इसे पहनने के बाद जवान को वजन महसूस ही नहीं होगा?
यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है. एक्सोसूट पहनने का मतलब यह नहीं है कि जवान को वजन बिल्कुल महसूस नहीं होगा या वह सुपरहीरो की तरह कई गुना ज्यादा ताकतवर हो जाएगा.
गौरव साफ कहते हैं कि यह कोई मोटर वाला सूट नहीं है. यह पैसिव तकनीक पर काम करता है और शरीर पर पड़ने वाले दबाव को कम करता है. थकान पूरी तरह खत्म नहीं होगी, लेकिन शरीर पर पड़ने वाला खिंचाव और दर्द कम किया जा सकता है.

इसे एक उदाहरण से समझें. अगर कोई व्यक्ति एक्सोसूट के बिना 10 किलोमीटर चलता या दौड़ता है तो उसके शरीर पर काफी दबाव पड़ सकता है. एक्सोसूट पहनने के बाद दूरी वही रहेगी, लेकिन शरीर के उन हिस्सों पर पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है, जहां आमतौर पर ज्यादा दर्द या खिंचाव महसूस होता है.
80 किलो तक वजन संभालने की क्षमता
गौरव के मुताबिक एक्सोसूट मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं. एक पैसिव एक्सोसूट और दूसरा एक्टिव एक्सोसूट.
पैसिव एक्सोसूट में किसी मोटर या बैटरी की जरूरत नहीं होती और इसकी क्षमता करीब 80 किलो तक हो सकती है. दूसरी तरफ एक्टिव एक्सोसूट में बैटरी, मोटर और दूसरे उपकरण लगाए जाते हैं. इसकी क्षमता 100 से 150 किलो के बीच तक ले जाने पर काम किया जा रहा है.
गौरव की टीम ने फिलहाल 80 किलो वजन की क्षमता हासिल कर ली है. अब उनका ध्यान इसे और आगे बढ़ाने पर है. साथ ही सेना की मौजूदा जरूरतों के हिसाब से भी इस तकनीक को बेहतर करने की कोशिश की जा रही है.
11 किलो से घटकर करीब साढ़े 7 किलो हुआ वजन
इस एक्सोसूट के शुरुआती मॉडल का वजन करीब 11 किलो था. टीम ने अब इसे घटाकर लगभग साढ़े 7 किलो कर दिया है. यानी उपकरण को खुद पहनने वाले व्यक्ति पर पड़ने वाला अतिरिक्त वजन भी कम किया गया है.
गौरव बताते हैं कि इसके लिए इंजीनियरिंग में इस्तेमाल होने वाली ‘वजन कम करने’ की तकनीक अपनाई गई. इसमें यह देखा जाता है कि डिजाइन के किन हिस्सों में वजन कम किया जा सकता है और किन हिस्सों में मजबूती बनाए रखना जरूरी है.
इसे कार के उदाहरण से समझा जा सकता है. कार के कुछ हिस्से ऐसे होते हैं, जिनकी मजबूती से समझौता नहीं किया जा सकता. वहीं बाहरी हिस्सों में डिजाइन और इस्तेमाल होने वाली सामग्री को जरूरत के हिसाब से बदला जा सकता है. इसी तरह एक्सोसूट में भी जरूरी हिस्सों की मजबूती बरकरार रखते हुए दूसरे हिस्सों का वजन कम किया गया.
सियाचिन और थार जैसे इलाकों में कैसे मदद करेगा?
भारत में सैनिकों को बिल्कुल अलग-अलग तरह के इलाकों में तैनात किया जाता है. सियाचिन जैसे बर्फीले और ऊंचाई वाले क्षेत्र में सैनिकों को चढ़ाई करनी पड़ती है, जबकि थार रेगिस्तान में हालात बिल्कुल अलग होते हैं. ऐसे इलाकों के लिए एक ही तरह का उपकरण हर जगह काम नहीं कर सकता.
गौरव के मुताबिक, पहाड़ चढ़ने, ग्लेशियर पर चलने या सड़क पर चलने के लिए अलग-अलग जरूरतें हो सकती हैं. लेकिन एक बड़ी समस्या सभी जगह सामने आती है-भारी सामान को लंबे समय तक लेकर चलना.
कई बार सैनिक करीब 60 किलो या उससे ज्यादा वजन वाला बैग लेकर चलते हैं. ऐसे में एक्सोसूट पहनने के बाद बैग का भार सीधे शरीर पर पड़ने के बजाय एक्सोसूट के ढांचे पर आएगा और वहां से जमीन की तरफ पहुंचाया जाएगा. इससे सैनिक के शरीर पर पड़ने वाला बोझ कम करने में मदद मिलेगी.
इस उपकरण को बनाने का विचार कहां से आया?
इस तकनीक के पीछे गौरव के लिए एक व्यक्तिगत वजह भी रही. उनके पिता सतेंद्र राय सेना में अधिकारी रह चुके हैं. लंबे समय तक भारी बैग लेकर गश्त करने के कारण उन्हें आज भी घुटने और पीठ में दर्द की समस्या रहती है.
गौरव ने सैनिकों की इस परेशानी को करीब से देखा. इसी से उनके मन में यह विचार आया कि ऐसा उपकरण बनाया जाए, जो भारी सामान उठाने के दौरान जवानों के शरीर पर पड़ने वाले दबाव को कम कर सके.
इसके बाद इस पर काम शुरू किया गया. साल 2023 में एआईसी आईआईटी दिल्ली के सोनीपत कैंपस में इसके निर्माण का काम शुरू हुआ. धीरे-धीरे डिजाइन में बदलाव किए गए और इसे हल्का तथा ज्यादा उपयोगी बनाने पर काम हुआ.
क्या भारतीय सेना ने इसका ट्रायल कर लिया है?
इस सवाल पर गौरव ने स्पष्ट किया कि अभी इसे भारतीय सेना का अंतिम रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला उपकरण नहीं माना जा सकता. इसके लॉजिस्टिक वर्जन के लिए सप्लाई की जा रही है और टीम अभी ट्रायल, टेस्टिंग और इसमें जरूरी सुधार के दौर में है.
यानी अभी इस तकनीक का विकास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. अलग-अलग परिस्थितियों में इसे जांचने और जरूरत के हिसाब से इसमें बदलाव करने का काम चल रहा है. इसके बाद आगे के चरण में इसे अंतिम रूप दिया जाएगा.
अब एक्टिव एक्सोसूट पर भी काम
फिलहाल गौरव की टीम ने पैसिव एक्सोसूट में करीब 80 किलो वजन संभालने की क्षमता हासिल कर ली है. लेकिन काम यहीं रुकने वाला नहीं है. आगे एक्टिव एक्सोसूट पर भी काम किया जा रहा है.
एक्टिव एक्सोसूट में बैटरी, मोटर और दूसरे यांत्रिक हिस्सों का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे इसकी क्षमता को और बढ़ाने की संभावना रहती है. हालांकि, गौरव की टीम अभी उस तकनीक पर काम कर रही है और मौजूदा जरूरत के मुताबिक पैसिव एक्सोसूट को भी बेहतर बनाने में जुटी है.
क्यों महत्वपूर्ण है यह तकनीक?
सैनिकों के लिए हथियार और जरूरी सामान लेकर चलना उनकी ड्यूटी का अहम हिस्सा है. लेकिन लंबे समय तक भारी वजन उठाने का असर शरीर पर पड़ता है. ऐसे में ऐसी तकनीक जो वजन को गायब करने के बजाय उसके दबाव को शरीर से हटाकर जमीन की तरफ पहुंचाए, सैनिकों के लिए काफी उपयोगी हो सकती है.
‘हनुमंता एक्सो-1’ इसी दिशा में तैयार किया गया एक प्रयास है. इसकी खास बात यह है कि मौजूदा पैसिव मॉडल को चलाने के लिए बिजली या बैटरी की जरूरत नहीं है. टीम ने वजन कम करने के साथ इसकी क्षमता बढ़ाने पर भी काम किया है.
अभी यह तकनीक ट्रायल, टेस्टिंग और सुधार के चरण में है. इसलिए इसे लेकर यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे सैनिक बिना किसी थकान के बहुत ज्यादा वजन उठा सकेंगे. फिलहाल इसका लक्ष्य शरीर पर पड़ने वाले दबाव और दर्द को कम करना है, ताकि कठिन इलाकों में लंबे समय तक काम करने वाले जवानों को कुछ राहत मिल सके.