300 साल पुराना जल महल फिर बना चर्चा का केंद्र: 'लैंड डील' विवाद से Gen-Z की सफाई मुहिम तक, जानें क्या है पूरा मामला
Rajasthan News: जयपुर का 300 साल पुराना जल महल प्रदूषण और बदबू की समस्या से जूझ रहा है. 99 साल की लीज का विवाद भी रहा. अब Gen-Z युवा पिछले 8 महीनों से बिना सरकारी मदद के झील की सफाई में जुटे हैं.
Jal Mahal Jaipur: जयपुर का जल महल आज एक बार फिर चर्चा में है. करीब 300 साल पुराना यह ऐतिहासिक महल मान सागर झील के बीचों-बीच बना है और जयपुर की पहचान का अहम हिस्सा है. कभी साफ पानी और खूबसूरत नजारे के लिए मशहूर रही यह झील अब गंदगी और बदबू की समस्या से जूझ रही है. इसी बीच जयपुर की Gen-Z ने पिछले 8 महीनों से बिना सरकारी मदद के जल महल और उसके आसपास सफाई का अभियान चला रखा है. युवाओं की यह कोशिश अब लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है.
300 साल पहले कैसे बना था जल महल?
मान सागर झील के बीच बना जल महल 18वीं शताब्दी में तैयार हुआ था. इसका निर्माण मुख्य रूप से महाराजा सवाई माधो सिंह प्रथम ने 1750 के दशक में कराया था. बाद में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने इसमें विस्तार कराया. महल की बनावट में राजपूत और मुगल शैली की झलक साफ दिखाई देती है.
लाल बलुआ पत्थर से बने इस महल की पांच मंजिलें हैं. इसकी खास डिजाइन इस तरह तैयार की गई थी कि झील में पानी बढ़ने पर चार मंजिलें पानी में डूब जाती हैं और सिर्फ सबसे ऊपर की मंजिल नजर आती है. यही खूबी जल महल को बाकी ऐतिहासिक इमारतों से अलग बनाती है.
शुरुआत में जल महल का इस्तेमाल राजपरिवार गर्मियों में ठहरने और बत्तखों के शिकार के लिए करता था. उस दौर में मान सागर झील का पानी काफी साफ था. झील में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी भी पहुंचते थे, लेकिन समय के साथ जयपुर शहर का तेजी से विस्तार हुआ और झील की हालत बिगड़ती चली गई.
साफ झील से गंदे पानी तक कैसे पहुंचा मान सागर?
मान सागर झील की हालत अचानक खराब नहीं हुई. शहर के बढ़ते विस्तार और लंबे समय तक चली लापरवाही का असर धीरे-धीरे झील पर पड़ा. कई बड़े नालों का पानी झील की तरफ पहुंचने लगा. इसके साथ सीवेज, प्लास्टिक और औद्योगिक कचरा भी झील में जाने लगा.
इसका सीधा असर झील के पर्यावरण पर पड़ा. पानी की गुणवत्ता खराब होती गई और धीरे-धीरे मान सागर झील प्रदूषण की समस्या से घिर गई. इसी बीच झील की सफाई और विकास को लेकर एक बड़ी लैंड डील सामने आई.
100 एकड़ जमीन की 99 साल की लीज क्यों बनी विवाद?
22 नवंबर 2005 को राजस्थान सरकार ने मान सागर झील के विकास के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी PPP मॉडल के तहत एक समझौता किया. इसके तहत जल महल रिसॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को झील के आसपास करीब 100 एकड़ जमीन 99 साल की लीज पर दी गई. इस कंपनी में KGK Enterprises भी शामिल थी.
योजना के मुताबिक निजी कंपनी को झील की सफाई और विकास का काम करना था. इसके बदले लीज पर मिली जमीन पर पर्यटन से जुड़ा केंद्र विकसित किया जाना था. लेकिन यह समझौता ज्यादा समय तक विवाद से बाहर नहीं रह सका.
प्रो. के.पी. शर्मा, धरोहर बचाओ समिति और हेरिटेज प्रिजर्वेशन सोसाइटी की ओर से इस डील के खिलाफ जनहित याचिकाएं दाखिल की गईं. याचिकाओं में पर्यावरण और जमीन से जुड़े नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाए गए. साथ ही पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन का भी मुद्दा उठाया गया.
2012 में हाईकोर्ट ने लीज को कर दिया था रद्द
मई 2012 में राजस्थान हाईकोर्ट ने 99 साल की इस लीज को अवैध और शून्य घोषित कर दिया. कोर्ट ने जल महल रिसॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को 100 एकड़ जमीन वापस उसकी मूल स्थिति में लाने के निर्देश दिए.
इसके अलावा झील के अंदर बनाई गई दीवार को कंपनी के खर्च पर हटाने और झील के कैचमेंट एरिया से अतिक्रमण हटाने के आदेश भी दिए गए. इसके बाद प्रशासनिक और कानूनी विवादों के बीच सफाई का काम आगे नहीं बढ़ पाया. दूसरी तरफ झील में गंदगी बढ़ती गई और पानी से बदबू आने की समस्या भी सामने आती रही.
मध्य प्रदेश के 'बिट्टू तबाही' से जयपुर के युवाओं को मिली प्रेरणा
इसी बीच मध्य प्रदेश के ब्यावरा के रहने वाले 21 साल के BSc छात्र सुरेंद्र सिंह चौधरी ने अपनी मुहिम से युवाओं को नई राह दिखाई. सोशल मीडिया पर 'बिट्टू तबाही' नाम से पहचान बनाने वाले सुरेंद्र ने अजनार नदी की सफाई का काम अकेले शुरू किया.
उन्होंने 26 जनवरी को फावड़ा उठाकर नदी की सफाई शुरू की थी. शुरुआत में न उनके पास सरकारी मदद थी और न ही बड़ी मशीनें या टीम. उन्होंने करीब 30 हजार रुपये अपनी जेब से खर्च किए और खुद नदी में उतरकर प्लास्टिक, पॉलीथिन और जमा हुआ कचरा निकालना शुरू किया.
सफाई के दौरान उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. नदी में सांपों का खतरा रहा और गंदे पानी के कारण उनके हाथ-पैरों में संक्रमण भी हुआ. इसके बावजूद उन्होंने काम जारी रखा.
सोशल मीडिया से देशभर में पहुंची सुरेंद्र की कहानी
सुरेंद्र ने नदी की सफाई से पहले और बाद की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किए. देखते ही देखते ये वीडियो वायरल हो गए. शुरुआत में कुछ लोगों ने उनकी कोशिश पर सवाल भी उठाए, लेकिन लगातार काम करने का असर यह हुआ कि उनकी मुहिम की चर्चा दूर तक पहुंच गई.
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी भोपाल में सुरेंद्र से मुलाकात कर उनके काम की सराहना की. इसके बाद ब्यावरा नगर पालिका ने भी नदी की सफाई के लिए JCB और पोकलेन जैसी मशीनें उपलब्ध कराईं.
सुरेंद्र की मुहिम को देश के बाहर भी पहचान मिली. डच पर्यावरण संगठन The Ocean Cleanup ने उन्हें नौकरी का ऑफर तक दिया. एक व्यक्ति से शुरू हुई यह कोशिश धीरे-धीरे बड़े अभियान में बदल गई.
8 महीने से जल महल की सफाई में जुटी जयपुर की Gen-Z
सुरेंद्र सिंह चौधरी की इसी मुहिम से प्रेरणा लेकर जयपुर के युवाओं ने भी जल महल को साफ करने की जिम्मेदारी अपने हाथ में ली. पिछले करीब 8 महीनों से Gen-Z के युवा लगातार इस अभियान से जुड़े हुए हैं.
इस अभियान की खास बात यह है कि युवा अपने स्तर पर ही सफाई कर रहे हैं. स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले युवा वीकेंड और छुट्टियों के दिन जल महल के आसपास पहुंचते हैं.
ग्लव्स, मास्क और कचरा जमा करने वाले बैग लेकर ये युवा झील के किनारे से प्लास्टिक, कचरा और गंदगी हटाते हैं. कई युवा पानी और दलदल वाले हिस्सों से भी कचरा बाहर निकालते हैं. सफाई अभियान के वीडियो और रील सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे हैं, जिससे हर हफ्ते नए लोग भी इस मुहिम से जुड़ रहे हैं.
जल महल की सफाई सिर्फ सफाई अभियान नहीं
जयपुर के युवाओं की यह पहल सिर्फ झील से कचरा हटाने तक सीमित नहीं है. इसके जरिए यह सवाल भी सामने आ रहा है कि शहर की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए सिर्फ योजनाएं बनाना काफी है या जमीन पर भी लगातार काम करने की जरूरत है.
मध्य प्रदेश में सुरेंद्र सिंह चौधरी की अजनार नदी वाली मुहिम और जयपुर में जल महल की सफाई में जुटे युवाओं ने यह दिखाया है कि छोटे स्तर से शुरू की गई कोशिश भी बड़ा असर डाल सकती है. अगर स्थानीय प्रशासन इन युवाओं के अभियान को जरूरी मशीनों और संसाधनों की मदद दे, तो जल महल और मान सागर झील की सफाई का काम ज्यादा तेजी से आगे बढ़ सकता है.