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2 महीने, 4 इंजीनियर और 0 रुपये: सरकारी अफसरों ने बना दिया 2 करोड़ का सॉफ्टवेयर, जानें उन्हीं की जुबानी

Rajasthan News: जयपुर में PHED के इंजीनियरों ने महज 2 महीने में PHED_IT_PMU सॉफ्टवेयर तैयार किया. डॉ. पूनम रिजवानी ने बताया कि इसे बनाने में Python और PostgreSQL का इस्तेमाल हुआ. टीम ने सीनियर इंजीनियर्स की एक्सपर्टीज को सॉफ्टवेयर में शामिल किया और इसके लिए वीकेंड पर भी काम किया.

Written By SAGAR CHAUDHARY
Published: Sep 30, 2026, 09:42 PM IST | Updated: Sep 30, 2026, 09:48 PM IST
Image Credit: PHED_IT_PMU Software
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PHED_IT_PMU Software: जयपुर में PHED के चार इंजीनियरों ने महज दो महीने में PHED_IT_PMU सॉफ्टवेयर तैयार किया है. विभाग के अनुसार, इसे निजी कंपनी से बनवाने पर करीब 2 करोड़ रुपये खर्च होते. यह सॉफ्टवेयर जल जीवन मिशन और AMRUT 2.0 जैसी योजनाओं के तहत जल परियोजनाओं की प्लानिंग, डिजाइन, अनुमानित लागत और निर्माण अवधि तय करने में मदद करेगा. इसे देशभर की करीब 700 परियोजनाओं और प्रविष्टियों में से स्कॉच सिल्वर अवार्ड भी मिला है. अब सरकार इसे जल्द लॉन्च करने की तैयारी कर रही है. इसी को लेकर इंजीनियर टीम में शामिल डॉ. पूनम रिजवानी से बातचीत हुई.

सवाल: सरकारी महकमों में छोटे-बड़े IT काम के लिए टेंडर निकाले जाते हैं और प्राइवेट वेंडर्स की मदद ली जाती है. बिना बाहरी मदद के इन-हाउस सॉफ्टवेयर बनाने का आइडिया सबसे पहले किसके दिमाग में आया और इसके पीछे क्या चुनौती थी?

जवाब: जी, इस प्रोजेक्ट का आइडिया हमारे चीफ इंजीनियर और एडिशनल सेक्रेटरी के दिमाग में काफी समय से था. वे इसे इन-हाउस ही बनाना चाहते थे, क्योंकि इसमें उनके बहुत सारे इनपुट लगने थे. एक दिन उन्होंने मुझसे इसको लेकर चर्चा की और मुझे पता चला कि उनके दिमाग में यह आइडिया है.

बेसिकली इसमें प्रोजेक्ट की प्लानिंग, एस्टिमेशन और शेड्यूलिंग होती है. वे चाहते थे कि सब कुछ ऑनलाइन आ जाए और उसी के जरिए हमारा वर्क प्लान और एस्टिमेट भी तैयार हो जाए. उन्होंने कहा कि एक बार इन-हाउस ट्राई करते हैं. इसके बाद सर की गाइडेंस में मैं स्टेप बाय स्टेप डेवलपमेंट करती गई और हम इसे बनाते गए. आज हम इसे यूज भी कर पा रहे हैं.

सवाल: आज का दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है. महज दो महीने में इस प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर को तैयार करने के लिए क्या आपने ChatGPT या किसी दूसरे AI टूल की मदद ली? आपका टेक-स्टैक क्या था और कोडिंग का एक्सपीरियंस कैसा रहा?

जवाब: इसमें हमने बेसिकली Python यूज किया है. Python के जरिए हमने एस्टिमेशन की. डेटाबेस के लिए मैंने PostgreSQL लिया.

हालांकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को डेफिनेटली यूज किया जा सकता है. आगे जब हमारे पास डेटा इकट्ठा हो जाएगा, तो हम उसी के आधार पर एस्टिमेशन की प्रेडिक्शन कर सकते हैं. इससे हमारे लिए काम और आसान हो जाएगा.

लेकिन अभी हमारे पास डेटा नहीं था. हमारे सीनियर इंजीनियर्स के पास काफी एक्सपर्टीज और आइडिया हैं. हमने उनकी नॉलेज को लॉजिक में कन्वर्ट करके यह प्लानिंग और एस्टिमेशन सॉफ्टवेयर बनाया है. फ्यूचर में हम इसमें AI इनेबल कर सकते हैं.

ChatGPT और Gemini एक टूल हैं. इनकी मदद लेकर काम को थोड़ा आसान और बेहतर किया जा सकता है. फिलहाल हमारे सीनियर इंजीनियर्स की नॉलेज को हमने स्टैंडर्डाइज करके इस एस्टिमेशन बेस्ड सॉफ्टवेयर में इस्तेमाल किया है.

सवाल: आपकी टीम में SE और AEN कोर इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से आते हैं, जबकि ACP IT से हैं. ट्रेडिशनल इंजीनियरिंग टीम और IT की यह जुगलबंदी कैसे हुई? क्या कोर इंजीनियर्स ने भी इस प्रोजेक्ट के लिए कोडिंग सीखी?

जवाब: हम सभी चीफ इंजीनियर और एडिशनल सेक्रेटरी संदीप शर्मा सर के अंडर में काम करते हैं. जैसा मैंने बताया, सर के दिमाग में पहले से ही आइडिया था. सर ने अपने इंजीनियर्स के जरिए इसे एक्सेल पर बनवाना शुरू किया था.

मैं कुछ मीटिंग्स में जाती थी, तो मुझे पता चला कि सर इस आइडिया को काफी समय से कॉन्सेप्चुअलाइज करना चाहते हैं. फिर हम पूरी टीम एक साथ बैठे. हमने एक यूनिफॉर्मिटी पर काम किया और सोचा कि यह बहुत अच्छा आइडिया है, जिससे डिसीजन मेकिंग काफी फास्ट हो जाएगी.

अभी मैनुअल कैलकुलेशन होती हैं, एस्टिमेशन में एरर होते हैं, अप्रूवल लेने में दिक्कत आती है और वर्क प्लान जनरेट करने में भी परेशानी होती है. सर गाइड करते गए और हम चारों ने बहुत अच्छे से कोऑर्डिनेट करके इसे बनाया.

सवाल: बाजार के हिसाब से इस सॉफ्टवेयर की कीमत करीब 2 करोड़ रुपये बताई जा रही है. जब आपने हाई ऑफिशियल्स को डेमो दिया और बताया कि यह सिस्टम फ्री में तैयार हुआ है, तो उनका पहला रिएक्शन क्या था?

जवाब: सर खुश थे. सर डेफिनेटली बहुत खुश थे, क्योंकि वे काफी समय से चाहते थे कि ऐसा कुछ काम हो जाए.

लेकिन यह डोमेन इंजीनियरिंग और वाटर डोमेन है, जो काफी टेक्निकल है. जब हम किसी बाहर की टीम को यह प्रोजेक्ट देते हैं, तो उसके लिए वाटर डोमेन की नॉलेज होना बहुत जरूरी है.

मुझे यहां PhD में दो-तीन साल हो गए हैं और मैंने इन इंजीनियर्स के साथ बहुत क्लोजली काम किया है. इसलिए अब मुझे इंजीनियरिंग पैरामीटर और डिजाइन क्राइटेरिया कुछ-कुछ समझ आते हैं. इसी वजह से हम इसे सॉफ्टवेयर में कन्वर्ट कर पाए.

इसका पूरा क्रेडिट मैं सर को दूंगी. उन्होंने बहुत अच्छी गाइडेंस दी कि यह किस तरह होना चाहिए. फ्यूचर में हम इसमें और चेंज और इंप्रूवमेंट करेंगे. थोड़ा और डेटा इकट्ठा होने के बाद उस पर AI लगाकर प्रेडिक्शन भी करेंगे.

सवाल: महज दो महीने में ऐसा सॉफ्टवेयर बनाना किसी टेक स्टार्टअप के लिए भी चुनौती है. सरकारी विभाग में फील्ड, फाइल और रोज के काम के बीच कोडिंग के लिए समय कैसे निकाला?

जवाब: टाइम निकालना बहुत मुश्किल था. अगर मैं आपको ऑनेस्टली बताऊं तो हम सुबह साढ़े 9 बजे ऑफिस पहुंच जाते हैं और शाम 6 बजे तक काम करते हैं. सर के अंडर हमारी जो टीम है, वह बहुत मोटिवेटेड है.

इस सॉफ्टवेयर के लिए मैंने सैटरडे और संडे को भी खूब टाइम दिया, क्योंकि ऑफिस में इतना टाइम नहीं मिलता था. सर गाइड करते थे और मैं कोशिश करती थी. मुझे भी इसमें इंटरेस्ट आता था. इसलिए मैंने अपने सैटरडे और संडे दिए.

लेकिन जब एंड प्रोडक्ट बनकर निकला तो मुझे बहुत खुशी हुई कि यह सब वर्थ इट था.

सवाल: जल जीवन मिशन और अमृत 2.0 जैसी योजनाओं में यह सॉफ्टवेयर जमीनी स्तर पर किस तरह गेम चेंजर साबित होगा? क्या आप कोई प्रैक्टिकल उदाहरण दे सकती हैं?

जवाब: इसके बारे में डिपार्टमेंट ज्यादा बता पाएगा, क्योंकि JJM के प्रोजेक्ट्स और अमृत में किस तरह का डेटा है, इसका मुझे अभी इतना आइडिया नहीं है.

अगर कोई मुझे आइडिया देगा तो क्योंकि मेरा इंटरेस्ट सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में है, मैं मदद कर सकूं तो अच्छी बात है. लेकिन अभी मुझे JJM के इन प्रोजेक्ट्स के बारे में कम जानकारी है, क्योंकि मैं JJM में नहीं हूं. मेरी पोस्टिंग ERT के अंडर में है.

अभी इसको लेकर अलग से कोई सॉफ्टवेयर का आइडिया नहीं आया है. भविष्य में मौका मिला तो डेफिनेटली मैं इसे एक्सप्लोर करूंगी.

सवाल: जल परियोजनाओं और उनके बजट का डेटा काफी सेंसिटिव होता है. इंटरनेट पर काम करने वाले इस सॉफ्टवेयर में डेटा लीक या हैकिंग से बचने के लिए क्या विशेष उपाय किए गए हैं?

जवाब: हमने जो आर्किटेक्चर बनाया है, उसमें सिक्योरिटी एम्बेडेड है. इसमें रोल बेस्ड एक्सेस है और यह SSO पर है. जो भी वैलिडेशन हैं, वे भी इनपुट हो रहे हैं. डेटाबेस एक्सेस भी हमने कंट्रोल कर रखा है.

दूसरा, हमारा सिस्टम स्टेट डेटा सेंटर पर होस्टेड है. स्टेट डेटा सेंटर में बैकअप और रिकवरी मैकेनिज्म है और इंफ्रास्ट्रक्चर लेवल की सिक्योरिटी भी है. मेरे हिसाब से यह सेफ और सिक्योर है.

सवाल: पूरे देश से 700 से ज्यादा एंट्रीज थीं. स्कॉच अवार्ड जीतना बड़ी बात है. आपको क्या लगता है कि जूरी को PHED_IT_PMU का कौन सा फीचर या एंगल सबसे यूनिक लगा?

जवाब: पूरे इंडिया में इस तरह के एस्टिमेशन क्रिएट हो जाएं, क्लियर वाटर रिजर्वायर और हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, चाहे वो WTP यानी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट हो या CWAR, ऐसा कुछ है नहीं, जितना मुझे मालूम है. हो सकता है कहीं और हो.

जब हमने उन्हें दिखाया कि किस तरीके से एस्टिमेट्स क्रिएट हो रहे हैं और आप इनकी मॉनिटरिंग कर सकते हैं, Gantt Chart बन रहे हैं, तो मुझे लगता है उन्हें कुछ अलग लगा होगा.

इसमें तीन लेवल पर उन्होंने स्क्रूटिनी की. उन्होंने इसे एक डेटा ड्रिवन डिजिटल इकोसिस्टम के रूप में देखा. फ्यूचर स्कोप को लेकर भी वहां काफी डिस्कशन हुआ. मुझे लगता है कि उन्होंने इसे एक डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन इनिशिएटिव के तौर पर अच्छा समझकर कंसिडर किया होगा.

सवाल: क्या यह सॉफ्टवेयर ओपन सोर्स बनेगा? क्या PWD, JDA और अर्बन जैसे दूसरे विभागों के हिसाब से भी इसे इस्तेमाल किया जा सकता है?

जवाब: हां, हम ऐसा फ्यूचर में कर सकते हैं. हमने इसमें इसका स्कोप छोड़ा है. अगर ऐसी कोई रिक्वायरमेंट आती है तो डेफिनेटली हम इसे ट्राई कर सकते हैं.

सवाल: इस प्रोजेक्ट से यह मिथ टूटता है कि सरकारी अफसर काम नहीं करते या नई टेक्नोलॉजी से डरते हैं. आपकी टीम ने इस सोच को बदला है. बाकी सरकारी अधिकारियों और इंजीनियर्स के लिए आपका क्या मैसेज है?

जवाब: एक्चुअली यह पर्सन टू पर्सन भी डिपेंड करता है. सरकारी नौकरी में मुझे लगता है कि बल्कि ज्यादा काम करना चाहिए, क्योंकि आपकी एक रिस्पॉन्सिबिलिटी होती है.

मुझे जितने साल हुए हैं, मुझे लगता है कि मेरे पास काफी काम है और मुझे काम करने का एक जुनून भी है. इससे सीखने को मिलता है. क्योंकि जिस दिन आप कुछ नहीं करते, कुछ नहीं सीखते, उस दिन मुझे लगता है कि मेरा दिन इतना सैटिस्फाइड नहीं होता.

यह अपनी-अपनी इच्छा की बात है कि कौन करना चाहता है और कौन नहीं. लेकिन मुझे लगता है कि सरकारी नौकरी में आप जैसे होते हैं, वैसी संगति ढूंढ ही लेते हैं. मेरे आसपास तो जितने लोग हैं, वे बहुत काम करते हैं. मैंने उन्हें रात 8 बजे तक भी काम करते हुए देखा है.

टचवुड, मुझे बहुत अच्छी टीम मिली है. यह जो सीनियर ऑफिसर्स हैं, उनसे यंग जेनरेशन को सीखना चाहिए, क्योंकि उनके पास बहुत ज्यादा नॉलेज है.

मैं बार-बार सर से यही कहती हूं कि जब आप लोग रिटायर हो जाएंगे, तब भी हमें एक एक्सपर्ट सिस्टम पहले से बना लेना चाहिए. जिस लेवल का एक्सपीरियंस आपको है और जिस लेवल के प्रोजेक्ट्स आपने बनाए हैं, वैसा एक्सपोजर अभी नए इंजीनियर्स के पास नहीं है.

इसलिए एक ऐसा एक्सपर्ट सिस्टम जरूर बनना चाहिए. हर डिपार्टमेंट में सीनियर लेवल के अधिकारी नॉलेज से भरे हुए हैं. अगर कोई ऐसा एक्सपर्ट सिस्टम बनाने का आइडिया दे और वह बन जाए तो फ्यूचर में और ग्रोथ और डेवलपमेंट हो सकता है. बाकी तो अच्छा है तो अच्छा चलेगा आगे. 

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सागर चौधरी, अप्रैल 2024 से वे ज़ी न्यूज़ संस्थान का हिस्सा हैं और अपनी मेहनत व काम करने की क्षमता से लगातार टीम में योगदान दे रहे हैं.सागर चौधरी का संबंध हरियाणा के फरीदाबाद से है, जहां उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की और मीडिया क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की.
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