त्रिकाल,पलायन और 'पंचकूटा':राजस्थान के महाअकालों का वो खौफनाक इतिहास,जो आज के जल संकट का आईना है
Rajasthan News : आज भले ही पानी की कमी हमें डराती है और हम जल संकट से जूझ भी रहे हैं, लेकिन इतिहास में ऐसे कई खौफनाक दौर आए हैं, जब बारिश की एक बूंद नहीं गिरी, कुएं-बावड़ियां पूरी तरह सूख गए और अन्न के एक-एक दाने के लिए लोग तरस गए.
मानसून की बेरुखी और कम बारिश ने जल संकट की जो आहट दी, वो राजस्थान के लिए कोई नई बात नहीं है. अरावली पर्वतमाला और थार के मरुस्थल की भौगोलिक परिस्थितियों के चलते राजस्थान का इतिहास भयंकर अकालों और सूखों की त्रासदियों से भरा पड़ा है.
अकाल के प्रकार और 'त्रिकाल' का खौफ
राजस्थान के जनजीवन में अकाल कोई एक रूप लेकर नहीं आता. इसके असर कितना खतरनाक हो सकता है, उसी आधार पर इसे मुख्य रूप से चार भागों में बांटा गया है.
अन्नकाल: जब खेतों में फसलें पैदा नहीं हों और अनाज की भारी कमी हो जाए.
जलकाल: जब पीने के पानी के स्रोत-तालाब, नाड़ियां और कुएं-पूरी तरह सूख जाएं.
तिणकाल (तृणकाल): जब बारिश नहीं हो, पशुओं के लिए घास और चारे का नामोनिशान मिट जाए.
त्रिकाल (महाअकाल): जब अन्न, जल और चारा-तीनों का एक साथ ना हो. ये हालात सबसे खतरनाक होते है. जिसने इतिहास में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है और लोग पलायन को मजबूर हो गये.
स्वतंत्रता के बाद के भयंकर सूखे (1987 और 2002)
आधुनिक भारत में, जब परिवहन, संचार और सरकारी राहत कार्य काफी बेहतर हो चुके थे, तब भी राजस्थान ने सदी के सबसे भीषण सूखों का सामना किया.
1987 का सूखा : इसे आजादी के बाद का सबसे भयंकर सूखा माना जाता है. ये एक तरह से 'त्रिकाल' था, जिसने राज्य के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बुरी तरह तोड़ दिया. इस दौरान पशुधन की भारी हानि हुई थी.
2002-03 का महासूखा: ये सदी का एक और भयानक सूखा था, इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश में लगभग 53.4% की भारी कमी दर्ज की गई थी. सबसे भयानक बात ये थी कि राजस्थान के सभी 32 जिले इस सूखे की चपेट में आ गए थे. भूजल स्तर पाताल में चला गया था, कुएं और हैंडपंप सूख गए थे. इस अकाल में लगभग 4 करोड़ लोग और 5 करोड़ पशुधन सीधे तौर पर प्रभावित हुए थे.
इतिहास का सबसे काला पन्ना : 'छप्पनिया अकाल' (1899-1900)
राजस्थान और पश्चिमी भारत के इतिहास में 1899-1900 का अकाल सबसे खौफनाक और जानलेवा माना जाता है. हिंदू कैलेंडर के मुताबिक ये विक्रम संवत 1956 में पड़ा था, जिसके कारण इसे स्थानीय भाषा में 'छप्पनिया अकाल' कहा गया. ये एक पूर्ण 'त्रिकाल' था, जिसने सामाजिक ताने-बाने को तोड़-मरोड़ कर रख दिया था.
भूख और महामारी : खाने के लिए अन्न का एक दाना नहीं था. जब अनाज खत्म हो गया, तो लोगों ने पेड़ों की छाल (विशेषकर खेजड़ी), पत्तियां और घास खाकर जिंदा रहने की कोशिश की. कुपोषण और गंदे पानी के चलते हैजा, मलेरिया और पेचिश जैसी महामारियां फैल गईं.
अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता: ब्रिटिश सरकार की नीतियां इस दौरान बेहद अमानवीय रहीं. फसलें नष्ट होने के बावजूद लगान की वसूली नहीं रोकी गई. इसके अलावा, रेलवे के विस्तार के चलते बचा हुआ अनाज भी ऊंचे दामों पर बाहरी बाजारों और विदेशों में निर्यात कर दिया गया, जिससे स्थानीय बाजार में कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गईं. हालात इतने खराब थे कि लोगों ने एक वक्त की रोटी के लिए अपने पुश्तैनी गहने, जमीनें और कई मामलों में अपने बच्चों तक को बेच दिया.
पशुधन का विनाश : चारे और पानी की कमी के साथ-साथ मवेशियों में 'रिंडरपेस्ट' (Rinderpest) जैसी बीमारी फैल गई, जिससे गायों, ऊंटों और बैलों की बड़े पैमाने पर मौत हुई. इस महाअकाल की खौफनाक यादें और मानवीय संघर्ष की कहानियां आज भी राजस्थानी लोकगीतों और कहावतों में जिंदा हैं.
राजपूताना अकाल (1868-1869) और चालीसा अकाल
छप्पनिया अकाल से पहले भी राजस्थान ने प्रकृति का भयंकर कोप झेला था.
राजपूताना अकाल (1868-69) : 1868 में मानसून के पूरी तरह गायब हो जाने से मारवाड़ (जोधपुर), बीकानेर, और अजमेर में भयानक सूखा पड़ा. जब स्थानीय जलस्रोत सूखे, तो मारवाड़ के लोगों ने मालवा (मध्य प्रदेश) और गुजरात की ओर बड़े पैमाने पर पलायन शुरू किया. लेकिन रास्तों में भी चारा और पानी नहीं था. लाखों मवेशी और इंसान रास्ते में ही दम तोड़ गए. इस अकाल और उसके बाद फैली हैजा की महामारी ने राजपूताना की एक बड़ी आबादी को साफ कर दिया था.
चालीसा अकाल (1783-84) : विक्रम संवत 1840 में आया यह अकाल (जिसे चालीसा कहा गया) भी उत्तर भारत और राजपूताना के लिए विनाशकारी साबित हुआ था. इसमें भी भयंकर जन-धन की हानि हुई थी और पूरे के पूरे गांव वीरान हो गए थे.
जब कुछ नहीं बचा, तो प्रकृति ने बचाया
अकालों के दौरान जब खेत बंजर हो जाते थे, तब थार की वनस्पतियों ने ही लोगों की जान बचाई. मरुस्थलीय लोगों ने सदियों से ये सीख लिया था कि संकट में क्या खाना है. कैर, सांगरी (खेजड़ी की फली), कुमटिया, और फोग जैसी चीजों को सुखाकर रखा जाता था, जिसे 'पंचकूटा' कहते हैं. आज ये पंचकूटा शादियों में एक शाही व्यंजन बन गया है, लेकिन अकाल के समय में ये ही मारवाड़ के लोगों का मुख्य जीवन रक्षक आहार हुआ करता था.
पलायन और अकाल राहत कार्य
भयंकर सूखे के समय राजस्थानी समाज का सबसे बड़ा हथियार 'पलायन' होता था. लोग अपने पशुओं के बड़े-बड़े रेवड़ (झुंड) लेकर मालवा या गुजरात की तरफ निकल जाते थे, जहां नदियां और चारागाह होते थे.
इन त्रासदियों के बीच स्थानीय रियासतों के राजाओं, सेठ-साहूकारों और धनाढ्य लोगों ने बड़ी भूमिका निभाई. अकाल पीड़ितों की मदद के लिए अन्नक्षेत्र (मुफ्त भोजन के लंगर) और पशुओं के लिए गौशालाएं खोली गईं.
जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह और बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने अकाल राहत (Famine Relief) के लिए बहुत काम किया था. लोगों को रोजगार देने के लिए 'काम के बदले अनाज' की तर्ज पर बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निर्माण कार्य शुरू किए गए. आज राजस्थान में दिखने वाली कई ऐतिहासिक झीलें, भव्य बावड़ियां और महल (जैसे जोधपुर का उम्मेद भवन पैलेस) अकाल राहत कार्यों के दौरान ही बनवाए गए थे, ताकि गरीब जनता को मजदूरी मिल सके.
इतिहास में दर्ज ये घटनाक्रम हमें याद दिलाते हैं कि आधुनिक तकनीक से हम भले ही 'अन्नकाल' को हरा दें, लेकिन अगर भूजल का अंधाधुंध दोहन नहीं रुका और पारंपरिक जलस्रोतों (बावड़ी, टांका, जोहड़) को सहेजा नहीं गया, तो 'जलकाल' का खतरा कभी भी छप्पनिया अकाल जैसी त्रासदी को दोहरा सकता है.