2028 में कौन बनेगा राजस्थान का CM? अशोक गहलोत के 3 बयानों से उठे बड़े सवाल, समझिए पूरा सियासी गणित
Rajasthan Politics: राजस्थान में 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले पूर्व CM अशोक गहलोत के हालिया बयानों ने मुख्यमंत्री पद को लेकर सियासी चर्चाएं तेज कर दी हैं. उन्होंने चौथी बार मुख्यमंत्री बनाने के नारों पर आपत्ति जताते हुए फैसला कांग्रेस हाईकमान पर छोड़ा है, लेकिन भविष्य में कोई जिम्मेदारी मिलने पर इनकार भी नहीं किया.
Rajasthan Politics: राजस्थान में विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हालिया बयानों ने मुख्यमंत्री पद को लेकर राजनीतिक चर्चाओं को अभी से हवा दे दी है. एक तरफ कांग्रेस के वॉर रूम में सचिन पायलट के सामने गहलोत का कहना- "हम तो परमानेंट इंचार्ज हैं", दूसरी तरफ बीकानेर के नाल में चौथी बार मुख्यमंत्री बनाने के नारों पर आपत्ति और फिर यह कहना कि "मेरा इंटरेस्ट अब किसी पद से ज्यादा पार्टी का है." इन तीनों बयानों को एक साथ पढ़ें तो राजस्थान कांग्रेस में गहलोत की भावी भूमिका को लेकर कई सवाल सामने आते हैं.
क्या गहलोत मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से दूरी बना रहे हैं. क्या वह अपने राजनीतिक अनुभव और संगठन में अपनी भूमिका का संकेत दे रहे हैं या फिर वह 2028 की नेतृत्व संबंधी बहस को अभी खुला रखना चाहते हैं. उनके बयानों में इन सभी सवालों के संदर्भ मौजूद हैं, लेकिन किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उनके शब्दों और राजनीतिक परिस्थितियों को अलग-अलग समझना जरूरी है.
पहला संकेत "हम तो परमानेंट इंचार्ज हैं"
7 अक्टूबर को जयपुर स्थित कांग्रेस के वॉर रूम में पंचायत चुनाव की रणनीति को लेकर बैठक के दौरान अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच हल्की-फुल्की बातचीत हुई. सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बनाए जाने के संदर्भ में गहलोत ने चुटकी ली कि पहले सुखजिंदर सिंह रंधावा पायलट के इंचार्ज थे, अब पायलट उनके इंचार्ज हो गए हैं. इस पर पायलट ने कहा कि गहलोत तो उन सभी के इंचार्ज हैं. जवाब में गहलोत ने कहा- “हम तो परमानेंट इंचार्ज हैं.”
यह संवाद अपने तत्काल संदर्भ में हास-परिहास का था. इसे सीधे मुख्यमंत्री पद की दावेदारी का ऐलान मानना उचित नहीं होगा, लेकिन राजनीतिक तौर पर इसने एक अलग संदेश जरूर दिया. अशोक गहलोत अपनी पहचान केवल पूर्व मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं रखते, बल्कि पार्टी के वरिष्ठ और अनुभवी नेता के रूप में अपनी भूमिका को रेखांकित करते हैं.
राजस्थान की राजनीति में अशोक गहलोत का लंबा अनुभव, संगठन के साथ उनका संबंध और गांधी परिवार के साथ उनके राजनीतिक समीकरण उन्हें कांग्रेस की नेतृत्व संबंधी चर्चाओं में प्रासंगिक बनाए रखते हैं. हालांकि, संगठन में वरिष्ठता और मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी दो अलग-अलग बातें हैं.
दूसरा संकेत "पद नहीं, पार्टी प्राथमिकता" लेकिन जिम्मेदारी से इनकार नहीं
अशोक गहलोत के राजनीतिक संकेतों को समझने के लिए उनका हालिया इंटरव्यू और भी महत्वपूर्ण है. उनसे पूछा गया कि अगर 2028 में पार्टी उन्हें चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की जिम्मेदारी देती है तो क्या वह तैयार होंगे. गहलोत ने जवाब में कहा कि "चौथी बार गहलोत सरकार" का नारा लोकप्रिय हो चुका है, लेकिन मुख्यमंत्री बनाने का फैसला हाईकमान करता है. उन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री बनने को बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि अब उनके लिए किसी पद से ज्यादा पार्टी का हित प्राथमिकता होना चाहिए.
उनके जवाब का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि पार्टी उन्हें पद के साथ या बिना पद के कोई भी जिम्मेदारी देगी, तो वह उससे इनकार नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि जिस पार्टी और गांधी परिवार ने उनपर इतना विश्वास किया, उसके आदेश को मानना उनका धर्म और फर्ज है. यहीं गहलोत के बयान की राजनीतिक बारीकी दिखाई देती है. वह मुख्यमंत्री पद की खुली मांग नहीं कर रहे, लेकिन अगर पार्टी उन्हें जिम्मेदारी देती है, तो उसे स्वीकार करने की संभावना से भी इनकार नहीं कर रहे. इसलिए उनके बयान को दावेदारी छोड़ने के बजाय दावेदारी पर अंतिम फैसला हाईकमान के लिए छोड़ने वाला रुख कहना अधिक सटीक होगा.
तीसरा संकेत- चौथी बार के नारों से बार-बार परहेज क्यों ?
बीकानेर के नाल में 13 अक्टूबर को आयोजित सम्मेलन में पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल ने अशोक गहलोत के समर्थन में मुख्यमंत्री पद के नारे लगवाए. गहलोत ने कार्यकर्ताओं को टोकते हुए कहा कि वह तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे नारे नेताओं के बीच गलतफहमी पैदा करते हैं और मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इसका फैसला हाईकमान करता है.
यह पहली बार नहीं है, जब गहलोत ने इस नारे से दूरी बनाई हो. अगस्त में जोधपुर में भी गहलोत ने चौथी बार मुख्यमंत्री बनाने के नारों से दूरी बनाई थी. उस समय उन्होंने कहा था कि सोनिया गांधी ने उन्हें तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाया था और उन्होंने खुद पद नहीं मांगा था. बार-बार एक जैसा संदेश देना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. इससे कम से कम तीन बातें सामने आती हैं.
पहली बात गहलोत सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री पद के लिए दबाव बनाते हुए नहीं दिखना चाहते. दूसरी बात वह अपने समर्थकों को ऐसी नारेबाजी से बचने का संदेश दे रहे हैं, जिसे प्रदेश कांग्रेस में दूसरे नेताओं के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा सकता है. तीसरी बात वह मुख्यमंत्री पद पर अंतिम निर्णय का अधिकार पार्टी हाईकमान के पास ही रखना चाहते हैं. यह भी संभव है कि गहलोत इन बयानों के जरिए पार्टी के भीतर अपने राजनीतिक विकल्प खुले रख रहे हों. हालांकि, इसे उनकी घोषित रणनीति नहीं, बल्कि बयानों से निकलने वाली संभावित राजनीतिक व्याख्या के रूप में ही देखना चाहिए.
गहलोत-पायलट समीकरण से क्या बदल रहा है ?
अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच वॉर रूम में हुई बातचीत को भी इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखना होगा. दोनों नेताओं के बीच अतीत में मुख्यमंत्री पद और संगठनात्मक नेतृत्व को लेकर मतभेद सार्वजनिक रहे हैं. अब पंचायत चुनाव से पहले दोनों की एक मंच पर मौजूदगी और हल्के-फुल्के संवाद को कांग्रेस की एकजुटता के संदेश के तौर पर प्रस्तुत किया गया. लेकिन यहां एक अंतर समझना जरूरी है. सार्वजनिक मंच पर सहज बातचीत होना और भविष्य के नेतृत्व पर सहमति बन जाना एक ही बात नहीं है.
गहलोत का "परमानेंट इंचार्ज" वाला बयान उनके राजनीतिक अनुभव और वरिष्ठता को रेखांकित करता है. दूसरी ओर पायलट की संगठनात्मक जिम्मेदारी और प्रदेश में उनकी सक्रियता उन्हें भी नेतृत्व की चर्चा में प्रासंगिक बनाए रखती है. ऐसे में गहलोत का मुख्यमंत्री पद पर फैसला हाईकमान पर छोड़ना पार्टी के भीतर किसी एक नेता को अभी से आगे रखने वाली बहस से बचने का तरीका भी हो सकता है. फिलहाल उपलब्ध बयानों से यह साबित नहीं होता कि गहलोत और पायलट के बीच 2028 के नेतृत्व को लेकर कोई सहमति बन चुकी है.
क्या गहलोत राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका का दे रहे संकेत ?
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का यह कहना कि पार्टी उन्हें पद के साथ या बिना पद के जो भी जिम्मेदारी देगी, वह निभाएंगे, केवल मुख्यमंत्री पद के सवाल तक सीमित नहीं है. इस बयान का दायरा व्यापक है. वह मुख्यमंत्री पद के अलावा संगठनात्मक जिम्मेदारी, राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के लिए काम या चुनावी अभियान में भूमिका निभाने की बात भी कर रहे हैं. हालांकि, उन्होंने किसी खास पद या नई जिम्मेदारी का नाम नहीं लिया है.
इसलिए यह कहना कि गहलोत राजस्थान की राजनीति से हटने जा रहे हैं या उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई नई भूमिका मिलने वाली है, अभी तथ्यों से आगे जाना होगा. लेकिन इतना जरूर है माना जा सकता बै कि उन्होंने अपनी उपयोगिता को किसी एक पद तक सीमित नहीं बताया.
अभी असली परीक्षा पंचायत चुनाव
गहलोत के हालिया बयानों का तत्काल राजनीतिक संदर्भ पंचायत चुनाव है. वह लगातार कांग्रेस की एकजुटता पर जोर दे रहे हैं और भाजपा सरकार को किसानों, ग्रामीण समस्याओं तथा सरकारी योजनाओं के मुद्दों पर घेर रहे हैं. बीकानेर में भी उनका जोर पार्टी को एकजुट होकर चुनाव लड़ने पर था. इसका मतलब है कि कांग्रेस के सामने फिलहाल दो स्तरों की चुनौती है. एक तरफ पंचायत चुनाव में संगठन और स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल बनाए रखना, दूसरी तरफ 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद को लेकर संभावित प्रतिस्पर्धा को संभालना.
अगर मुख्यमंत्री पद की चर्चा अभी ही प्रमुख हो जाती है, तो पार्टी के सामने यह सवाल खड़ा हो सकता है कि उसका केंद्रीय संदेश भाजपा सरकार के खिलाफ जनसमस्याएं हैं या अपने ही नेताओं के बीच नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा है. गहलोत का मौजूदा रुख इस चर्चा को फिलहाल सीमित रखने में मदद कर सकता है.
गहलोत ने दरवाजा बंद नहीं किया, फैसला हाईकमान पर छोड़ा
सबसे अहम बात यह है कि गहलोत ने मुख्यमंत्री पद की मांग नहीं की, लेकिन भविष्य में जिम्मेदारी मिलने पर इनकार भी नहीं किया. उनके बयान को न तो चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की घोषणा माना जा सकता है और न ही मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से पूर्ण विदाई. फिलहाल वह अपनी भूमिका को पार्टी के प्रति जिम्मेदारी से जोड़ रहे हैं और अंतिम फैसला हाईकमान पर छोड़ रहे हैं. 2028 में कांग्रेस किसे मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाएगी, यह अभी तय नहीं है. आने वाले पंचायत चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन, प्रदेश नेतृत्व के बीच तालमेल और हाईकमान के फैसले इस चर्चा को आगे आकार देंगे.
गहलोत के वायरल वीडियो पर भाजपा ने कसा तंज
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की जनसभा के दौरान नारेबाजी से जुड़े वायरल वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा कि शायद अशोक गहलोत को इस बात का डर है कि उनके प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा उनसे नाराज हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि इससे पहले भी महेंद्र सिंह मालवीय अपने कार्यकर्ताओं के साथ अशोक गहलोत से मिलने से पहले उनसे मिले थे, जिसपर गोविंद सिंह डोटासरा ने आपत्ति दर्ज कराई थी. शायद अशोक गहलोत को अब भी उसी बात का डर है.