राजस्थान के प्रतापगढ़ की सियासत में जिला प्रमुख की कुर्सी पर लंबे समय तक दो मीणा परिवारों का दबदबा रहा है, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग है. जिला परिषद चुनाव के लिए भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों ने नामांकन जमा करवा दिए हैं, मगर जिला प्रमुख पद की रेस में राजस्व मंत्री हेमंत मीणा के घर से कोई उम्मीदवार नहीं है. वहीं पूर्व विधायक रामलाल मीणा की पत्नी और पूर्व जिला प्रमुख इंदिरा देवी मीणा एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं.
पंचायती राज चुनाव 2026 में प्रतापगढ़ जिला प्रमुख का पद अनुसूचित जनजाति महिला के लिए आरक्षित है. इसी कारण जिला परिषद चुनाव पर पूरे जिले की नजर है. जिला परिषद के सभी 25 वार्डों में भाजपा और कांग्रेस ने अपने अधिकृत प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि अन्य दलों के प्रत्याशियों ने भी नामांकन दाखिल कर दिए हैं. जिले की राजनीति में अब तक दो परिवार जिला प्रमुख की कुर्सी को लेकर चर्चा में रहे हैं.
पूर्व मंत्री नंदलाल मीणा की पत्नी सुमित्रा मीणा चित्तौड़गढ़ की जिला प्रमुख रह चुकी हैं. इसके बाद उनकी पुत्रवधू सारिका मीणा ने भी जिला प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली. सारिका मीणा राजस्व मंत्री हेमंत मीणा की पत्नी हैं. इस तरह नंदलाल मीणा के परिवार में जिला प्रमुख का पद दो पीढ़ियों की महिलाओं तक पहुंचा.
दूसरी ओर पूर्व विधायक रामलाल मीणा की पत्नी इंदिरा देवी मीणा वर्ष 2020 में कांग्रेस की ओर से प्रतापगढ़ की जिला प्रमुख बनी थीं. उनके जिला प्रमुख बनने के बाद जिले की राजनीति में रामलाल मीणा के परिवार की भूमिका और मजबूत हुई थी. इस बार हालात बदले नजर आ रहे हैं. राजस्व मंत्री हेमंत मीणा के परिवार से न तो उनकी पत्नी और न ही घर का कोई अन्य सदस्य जिला परिषद चुनाव में प्रत्याशी है. मंत्री के घर से किसी को उम्मीदवार नहीं बनाए जाने को राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय माना जा रहा है.
हालांकि उनके परिवार से जुड़ी एक महिला जरूर चुनावी मैदान में हैं. भाजपा ने वार्ड नंबर 23 से कल्पना पत्नी रमेश मीणा को प्रत्याशी बनाया है, जो राजस्व मंत्री हेमंत मीणा की बुआ के बेटे की पत्नी हैं. वहीं कांग्रेस ने वार्ड नंबर 22 से पूर्व विधायक रामलाल मीणा की पत्नी और पूर्व जिला प्रमुख इंदिरा देवी मीणा को टिकट दिया है. इंदिरा देवी के मैदान में उतरने से इस सीट पर मुकाबले पर सबकी नजर रहेगी. इसी वार्ड से भाजपा ने पूजा कुंवर को प्रत्याशी बनाया है.
जिला प्रमुख का चुनाव जिला परिषद सदस्यों के मतदान से होता है. ऐसे में किसी राजनीतिक परिवार से जुड़ा होना पद मिलने की गारंटी नहीं है. पार्टी का समर्थन, जिला परिषद में सदस्यों की संख्या और चुनाव के बाद बनने वाले समीकरण निर्णायक भूमिका निभाएंगे. यही वजह है कि इस बार भले ही मंत्री के घर से कोई सीधा दावेदार नहीं है, लेकिन जिला प्रमुख की कुर्सी को लेकर सियासी गणित पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं. अब देखना होगा कि जिला परिषद चुनाव के नतीजों के बाद जिला प्रमुख की कुर्सी किसके हाथ जाती है और क्या इस बार जिले की राजनीति में परिवारों का वर्षों पुराना दबदबा टूटता है.