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नवरात्रि 2026: मन्नत पूरी होने पर चढ़ती हैं बेड़ियां और एक दिन में 3 रूप बदलती हैं माता, जानिए प्रतापगढ़ के प्रसिद्ध देवी धाम

Pratapgarh News: शारदीय नवरात्र पर जानिए राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले के 9 प्रमुख देवी धामों की खासियत. कहीं 350 साल पुरानी प्रतिमा है, तो कहीं तीन रूपों में दर्शन और मन्नत पूरी होने पर बेड़ियां चढ़ाने की अनूठी परंपरा निभाई जाती है.

Written BySandhya Yadav
Published: Oct 11, 2026, 10:39 AM IST|Updated: Oct 11, 2026, 10:43 AM IST
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नवरात्रि 2026: मन्नत पूरी होने पर चढ़ती हैं बेड़ियां और एक दिन में 3 रूप बदलती हैं माता, जानिए प्रतापगढ़ के प्रसिद्ध देवी धाम
Image Credit: प्रतापगढ़ के नौ प्रमुख देवी धामों के बारे में जानिए.

About the Author

Sandhya Yadav

Sandhya Yadav

लखनऊ यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने वाली संध्या ने Zee News से पहले Newstrack और ETV Bharat जैसे प्रतिष्ठित डिजिटल न्यूज़ संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं. जमीनी खबरों की गहरी समझ रखने वाली संध्या ने राजस्थान विधानसभा चुनाव, पंचायत चुनाव, गहलोत-पायलट राजनीतिक संकट और कोविड-19 महामारी समेत कई बड़े और जटिल घटनाक्रमों की बेहतरीन कवरेज की है.आप संध्या यादव से सीधे SANDHYA.YADAV@zeemedia.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा राजस्थान की खबरों के रियल-टाइम अपडेट्स के लिए आप उनसे लिंक्डइन (https://in.linkedin.com/in/sandhya-yadav-5734ba144) पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.
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Pratapgarh News: शक्ति की उपासना, परंपराओं और मां दुर्गा के प्रति अटूट श्रद्धा का पर्व शारदीय नवरात्र आज से शुरू हो रहा है. अगले नौ दिनों तक प्रतापगढ़ जिले के प्रमुख देवी मंदिरों में पूजा-अर्चना, आरती और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष माहौल रहेगा. जिले में कई ऐसे प्राचीन देवी धाम हैं, जो अपनी ऐतिहासिक विरासत, अनूठी प्रतिमाओं और सदियों से चली आ रही मान्यताओं के कारण अलग पहचान रखते हैं. कहीं दिन में तीन बार आरती होती है, तो कहीं करीब 350 वर्ष पुरानी प्रतिमा श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है. एक मंदिर में मनोकामना पूरी होने पर बेड़ियां चढ़ाने की परंपरा है, जबकि दूसरे धाम में माता के तीन अलग-अलग स्वरूपों में दर्शन करने की मान्यता है.

नवरात्र के अवसर पर आइए जानते हैं प्रतापगढ़ जिले के नौ प्रमुख देवी धामों और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराओं के बारे में.

1. राज राजेश्वरी माता मंदिर: तीनों पहर होती है आरती
प्रतापगढ़ शहर के कृषि मंडी चौराहे पर स्थित राज राजेश्वरी माता मंदिर श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आस्था स्थल है. वर्ष 1989 में निर्मित इस मंदिर में मां अंबे की सिंह पर सवार प्रतिमा विराजित है. चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां अखंड दीपक प्रज्वलित किया जाता है.

मंदिर में नवार्ण मंत्रों का जाप, कुंजिका स्तोत्र का पाठ और अष्टमी के दिन हवन प्रमुख धार्मिक परंपराएं हैं. यहां दिन में तीनों पहर आरती होती है. इसमें प्रतापगढ़ शहर के अलावा आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी श्रद्धालु शामिल होने पहुंचते हैं.

2. बाणेश्वरी माता मंदिर: सिसोदिया वंश की कुलदेवी
प्रतापगढ़ के किला परिसर में स्थित बाणेश्वरी माता मंदिर अपनी विशिष्ट प्रतिमा के कारण विशेष पहचान रखता है. यहां माता घोड़े पर सवार हैं. उनकी छह भुजाओं में धनुष, बाण, खड्ग, ढाल, घोड़े की लगाम और राक्षस का मुंड दर्शाया गया है. सिसोदिया वंश की कुलदेवी से जुड़ा यह मंदिर राजपरिवार की धार्मिक परंपराओं का प्रतीक भी माना जाता है. चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां अभिषेक, दुर्गापाठ, अखंड दीपक और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं.

3. बीजमाता मंदिर: करीब 350 वर्ष पुरानी प्रतिमा
देवगढ़ का प्राचीन बीजमाता मंदिर प्रतापगढ़ जिले के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल है. विशाल वटवृक्ष की छांव में स्थित इस मंदिर में विराजित माता की प्रतिमा लगभग 350 वर्ष पुरानी बताई जाती है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान शाक्त साधकों के लिए बीज मंत्रों की साधना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. नवरात्र के दौरान यहां दो दिवसीय मेले का आयोजन होता है. इस अवसर पर प्रतापगढ़ के साथ बांसवाड़ा, डूंगरपुर और चित्तौड़गढ़ सहित आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं.

4. भंवरमाता मंदिर: प्राचीन इतिहास और प्राकृतिक झरना
छोटीसादड़ी से करीब तीन किलोमीटर दूर अरावली की उपत्यकाओं के बीच स्थित भंवरमाता मंदिर मेवाड़ और मालवा के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. यहां मिले प्राचीन शिलालेख के अनुसार, मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 541 में हुई थी. मंदिर में भंवरमाता, कालिकामाता और सरस्वती माता की प्रतिमाएं विराजित हैं. वर्षा ऋतु में मंदिर के पास करीब 70 फीट की ऊंचाई से गिरने वाला प्राकृतिक झरना इस स्थान की सुंदरता बढ़ा देता है. नवरात्र के दौरान यहां मेले जैसा माहौल रहता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं.

5. पद्मावती माता मंदिर: तीन रूपों में दर्शन की मान्यता
निनोर में रोजड़ नदी के किनारे स्थित पद्मावती माता मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है. स्थानीय विश्वास के अनुसार, माता को त्रिरूप धारिणी के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि सुबह, दोपहर और शाम को माता के बाल्यावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था के स्वरूप में दर्शन होते हैं. माता की प्रतिमा की गोद में विराजित शिशु मंदिर की खास पहचान है. संतान प्राप्ति की कामना से भी श्रद्धालु यहां मन्नत मांगते हैं. होली के बाद रंग पंचमी तक मंदिर परिसर में मेला भरता है.

6. खेड़ा नाहरसिंह माता मंदिर: अखंड ज्योत की परंपरा
बारावरदा क्षेत्र के पास स्थित खेड़ा नाहरसिंह माता मंदिर वर्षों से चली आ रही अखंड ज्योत की परंपरा के लिए प्रसिद्ध है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, पहले खेरिया के पेड़ पर दीपक जलाया जाता था. इसकी रोशनी आसपास के गांवों तक दिखाई देती थी. इसी परंपरा से मंदिर में अखंड ज्योत प्रज्वलित करने की मान्यता जुड़ी हुई है. चैत्र महीने में पंचमी से सप्तमी तक यहां मेला लगता है. इसके अलावा प्रत्येक रविवार को भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

7. देवाकमाता मंदिर: मन्नत पूरी होने पर चढ़ाई जाती हैं बेड़ियां
देवगढ़ क्षेत्र के धारणी कोतवाल गांव के पास पहाड़ी पर स्थित देवाकमाता मंदिर अपनी अनूठी लोकपरंपरा के कारण प्रसिद्ध है. यहां माता की प्रतिमा लगभग 400 वर्ष पुरानी होने की मान्यता है. स्थानीय लोगों के अनुसार, प्राचीन समय में राजदरबार में सजा काट रहे एक व्यक्ति ने बेड़ियां खुलने पर माता के दरबार में बेड़ियां चढ़ाने की मन्नत मांगी थी. मनोकामना पूरी होने के बाद उसके द्वारा बेड़ियां चढ़ाने से इस परंपरा की शुरुआत होने की मान्यता है. आज भी श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर मंदिर में बेड़ियां चढ़ाकर माता के प्रति आभार व्यक्त करते हैं.

8. चामुंडामाता मंदिर: राजस्थान और मध्यप्रदेश के भक्तों की आस्था
शिवना नदी के तट पर अचनारा ग्राम पंचायत के अंतर्गत स्थित चामुंडामाता मंदिर राजस्थान और मध्यप्रदेश के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है. मंदिर में माता सिंह पर सवार हैं. नवरात्र के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. मंदिर तक पहुंचने वाला रास्ता दुर्गम होने के कारण श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ता है. स्थानीय लोगों ने दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए मंदिर तक डामरीकृत सड़क बनाने की मांग उठाई है, ताकि आवागमन आसान हो सके.

9. कामेश्वरी माता मंदिर: गुफा में विराजित हैं माता
प्रतापगढ़ जिले का नौवां प्रमुख देवी धाम मेरियाखेड़ी गांव के पास पहाड़ी पर स्थित कामेश्वरी माता मंदिर है. प्राचीन गुफा में बने इस मंदिर में माता की प्रतिमा मुर्गे पर सवार है. यही विशेषता इसे दूसरे देवी मंदिरों से अलग पहचान देती है. जिला मुख्यालय से करीब 27 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर में नवरात्र के दौरान धार्मिक आयोजन होते हैं. अष्टमी पर हवन और अखंड दीपक प्रज्वलित करने की परंपरा निभाई जाती है. मंदिर के पास स्थापित भगवान शिव की प्रतिमा पर वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से जलाभिषेक होने का दृश्य भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. हरियाली अमावस्या पर यहां मेला लगता है, जिसमें मध्यप्रदेश और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं.

आस्था और विरासत की पहचान हैं प्रतापगढ़ के देवी धाम
प्रतापगढ़ जिले के ये नौ देवी मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ यहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाते हैं. हर मंदिर की अपनी अलग मान्यता, पूजा पद्धति और लोकपरंपरा है. शारदीय नवरात्र के दौरान इन धामों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने के साथ भक्ति का विशेष वातावरण देखने को मिलता है. प्राचीन प्रतिमाओं से लेकर अखंड ज्योत और मन्नतों से जुड़ी परंपराएं इन मंदिरों को जिले की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती हैं.
 

Reporter- Hitesh Upadhyay

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