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झांसड़ी गांव: नाभि पर वार और नाक काटने की अनूठी रस्म
झांसड़ी गांव में स्कूल के पास सीमेंट से बने रावण के स्टैच्यू के सामने एक बड़ी शोभायात्रा निकाली गई. इसके बाद भगवान राम और रावण का रूप धरे कलाकारों के बीच जोरदार संवाद हुआ. संवाद खत्म होते ही तलवार से रावण की नाभि पर वार किया गया और नाक काटने की पारंपरिक रस्म निभाई गई. गांव के बुजुर्गों का कहना है कि ये परंपरा बीते 50 सालों से चली आ रही है. हालांकि, इसकी सटीक वजह किसी को नहीं पता, लेकिन माना जाता है कि यहां से करीब 30 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश का मंदसौर शहर रावण का ससुराल है. रावण को इस इलाके का 'दामाद' माने जाने के कारण ही यहां पुतला जलाने के बजाय केवल प्रतीकात्मक वध की परंपरा निभाई जाती है.
खेरोट गांव : बंदूकों की जगह इस बार चले पत्थर !
खेरोट गांव में हर साल दशहरे पर मिट्टी से रावण की प्रतिमा बनाई जाती है. यहां की परंपरा इतनी खास है कि रावण को जलाने के बजाय बंदूकों से गोलियां बरसाकर उसका वध किया जाता है. ग्रामीणों के मुताबिक जिस जगह रावण की प्रतिमा बनती है, वहां पहले कटाई के बाद फसलों के ढेर लगे होते थे. फसलों को आग से बचाने के लिए पुतला न जलाने और गोलियाँ चलाकर वध करने की रस्म शुरू हुई थी. लेकिन इस बार चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण सभी लाइसेंसी हथियार पुलिस थानों में जमा थे. ऐसे में ग्रामीणों ने अपनी परंपरा को जीवंत रखते हुए गोलियों की जगह रावण की प्रतिमा पर पथराव करके वध की रस्म निभाई.
खेरोट में कार्यक्रम की शुरुआत रावला मंदिर से हुई, जहां से ठाकुरजी रथ में सवार होकर रावण वध स्थल के लिए निकले. स्कूल मैदान पहुंचने पर सबसे पहले रावण की पूजा-आरती की गई. इसके बाद राम और रावण के दो गुटों में बंटे ग्रामीणों ने चौपाइयों के जरिए आपस में वाद-संवाद किया.
संवाद पूरा होने के बाद भगवान राम के भाले से रावण की नाक काटी गई और फिर ग्रामीणों ने पथराव कर वध की रस्म पूरी की. अंत में आतिशबाजी और पटाखों के साथ पूरा परिसर जयकारों से गूxज उठा. गोलियों की गूंज न होने के बावजूद ग्रामीणों के उत्साह और आस्था में कोई कमी नज़र नहीं आई.
रिपोर्टर- हितेष उपाध्याय