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चौपाल से संसद तक: पंचायती राज की सीढ़ी से दिल्ली-जयपुर पहुंचे राजस्थान के ये दिग्गज नेता!

राजस्थान में पंचायतीराज चुनाव सिर्फ गांव की सरकार नहीं चुनते, बल्कि बड़े नेताओं की सियासी पौध भी तैयार करते हैं. जयपुर के रामचरण बोहरा जिला प्रमुख से सांसद बने, तो शांति धारीवाल जिला प्रमुख से मंत्री की कुर्सी तक पहुंचे. कई नेताओं ने सरपंच और प्रधान रहते हुए राजनीति का ककहरा सीखा और फिर विधायक बने.

चौपाल से संसद तक: पंचायती राज की सीढ़ी से दिल्ली-जयपुर पहुंचे राजस्थान के ये दिग्गज नेता!
Image Credit: Jaipur Panchayat Chunav

पंचायतीराज चुनाव की सरगर्मियों के बीच गांवों की चौपाल से लेकर सियासी गलियारों तक चुनावी चर्चाएं तेज हैं. पंचायतीराज चुनाव सिर्फ गांव की सरकार चुनने का जरिया नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में नए नेतृत्व को आगे लाने का मंच भी रहे हैं. राजस्थान की राजनीति में कई ऐसे चेहरे हैं, जिन्होंने कभी सरपंच, प्रधान, पंचायत समिति या जिला परिषद सदस्य के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया और बाद में विधानसभा, लोकसभा और मंत्रिमंडल तक पहुंचे.

नेताओं की लंबी फेहरिस्त
जयपुर से लेकर कोटा, बूंदी और चूरू, सीकर तक ऐसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है. इनमें कोई जिला प्रमुख से सांसद बना तो कोई सरपंच से विधायक. दिलचस्प ये भी है कि कुछ नेताओं ने विधायक और मंत्री बनने के बाद भी पंचायत की राजनीति से नाता नहीं तोड़ा. वहीं जिला प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहने के बावजूद कुछ नेताओं को विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.

जयपुर जिला परिषद का गठन 1959 में हुआ
जयपुर जिला परिषद की बात करें तो जयपुर जिला परिषद का गठन 1959 में हुआ था. 67 साल के इतिहास में अब तक 10 जिला प्रमुख बने हैं. इनमें रामचरण बोहरा और सहदेव शर्मा ऐसे प्रमुख नाम हैं, जिन्होंने जिला प्रमुख की जिम्मेदारी संभालने के बाद बड़ी चुनावी राजनीति में भी पहचान बनाई. रामचरण बोहरा वर्ष 1995 से 2000 तक जयपुर के जिला प्रमुख रहे. इसके बाद उन्होंने लोकसभा की राजनीति में कदम रखा और लगातार दो बार जयपुर शहर से सांसद चुने गए. इसी तरह सहदेव शर्मा जिला प्रमुख रहे और चार बार विधायक का चुनाव जीतकर विधानसभा तक पहुंचे.

हालांकि जयपुर जिला प्रमुख की कुर्सी सभी नेताओं के लिए विधानसभा तक पहुंचने का रास्ता नहीं बन सकी. पूर्व जिला प्रमुख मधु शर्मा ने आमेर विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सकीं. इसी तरह पूर्व जिला प्रमुख दिवगंत हजारीलाल नागर ने भी विधानसभा चुनाव लड़ा, मगर उन्हें हार का सामना करना पड़ा. जयपुर जिला परिषद के सदस्य रहे बाबूलाल नागर और अशोक तंवर भी बाद में विधानसभा तक पहुंचे. इस तरह जयपुर जिला परिषद ने प्रदेश की राजनीति को कई ऐसे चेहरे दिए, जिन्होंने ग्रामीण राजनीति से आगे बढ़कर विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया.

2021 का चुनाव रहा चर्चा में
जयपुर जिला परिषद के इतिहास में वर्ष 2021 का चुनाव राजनीतिक घटनाक्रम के कारण चर्चा में रहा. कांग्रेस के टिकट पर वार्ड संख्या 17 से जिला परिषद सदस्य चुनी गईं, रमा देवी चौपड़ा जिला प्रमुख के चुनाव से पहले भाजपा खेमे में चली गईं. उस समय 51 सदस्यीय जिला परिषद में कांग्रेस के 27 सदस्य थे. इसके बावजूद जिला प्रमुख के चुनाव में क्रॉस वोटिंग हुई और भाजपा ने जिला प्रमुख का पद हासिल कर लिया.

अब तक ये रहे जयपुर जिला प्रमुख
नारायण चतुर्वेदी- अक्टूबर 1959 से अक्टूबर 1964
सहदेव शर्मा- नवंबर 1964 से अगस्त 1977 तक
सुरेश शर्मा - 1980 से 1983 तक
भगवान सहाय शर्मा- 1984 से 1991 तक
रामचरण बोहरा- 15 फरवरी 1995 से फरवरी 2000 तक
मधु शर्मा- 11 फरवरी 2000 से 10 फरवरी 2005 तक
रामगोपाल गार्ड- 11 फरवरी 2005 से 10 फरवरी 2010 तक
हजारीलाल नागर- 10 फरवरी 2010 से 6 फरवरी 2015 तक
मूलंचद मीना- 7 फरवरी 2015 से 6 फरवरी 2020 तक
रमादेवी चौपड़ा- 6 सितंबर 2021 से 5 सितंबर 2026 तक

पंचायतीराज की राजनीति में कोटा का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है. नगेंद्र बाला पहली महिला जिला प्रमुख के रूप में जानी जाती हैं. इसके बाद वे दो बार विधानसभा पहुंचीं। कोटा उत्तर से विधायक रहे शांति धारीवाल ने कोटा जिला प्रमुख बने. जिला प्रमुख बनने के दो साल बाद ही 1984 में धारीवाल कोटा लोकसभा सीट से सांसद चुने गए. इसके बाद वे विधानसभा पहुंचे और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे. कोटा के दिवंगत कांग्रेस नेता भरत सिंह कुंदनपुर की राजनीतिक यात्रा अलग रही. उन्होंने गांव की राजनीति से शुरुआत की. वे तीन बार कुंदनपुर ग्राम पंचायत के सरपंच और करीब 10 साल तक सांगोद पंचायत समिति के प्रधान रहे. इसके बाद चार बार विधायक चुने गए और प्रदेश सरकार में ग्रामीण विकास, पंचायतीराज और सार्वजनिक निर्माण विभाग के मंत्री रहे. लेकिन मंत्री और विधायक जैसे पदों पर रहने के बाद भी गांव की राजनीति से उनका जुड़ाव बना रहा. साल 2014 में उन्होंने कुंदनपुर ग्राम पंचायत से पंच का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इस तरह उनका राजनीतिक सफर सरपंच से मंत्री और फिर वापस पंच तक पहुंचा. कोटा जिले की पीपल्दा विधानसभा सीट से जुड़े कई नेताओं ने भी पंचायतीराज संस्थाओं से राजनीतिक सफर शुरू किया. पूर्व विधायक और सांसद रामनारायण मीणा ने सरपंच पद से राजनीति की शुरुआत की थी. वे आगे चलकर विधानसभा उपाध्यक्ष भी बने. वहीं चेतन पटेल वर्ष 2021 में पीपल्दा पंचायत समिति से निर्दलीय सदस्य चुने गए थे. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा और विधायक बने. पूर्व विधायक विद्या शंकर नंदवाना वर्ष 1987 से 1989 तक भांडाहेड़ा ग्राम पंचायत के सरपंच रहे. इसके बाद जिला परिषद सदस्य रहे और जिला प्रमुख बने. इसी तरह पूर्व विधायक प्रेमचंद नागर भी पंचायत की राजनीति से आगे बढ़े. वे बोरदा ग्राम पंचायत में पांच साल और तलाव ग्राम पंचायत में तीन साल तक सरपंच रहे. पंचायत समिति सदस्य की जिम्मेदारी भी संभाली और बाद में विधानसभा पहुंचे. हिण्डौली से विधायक रहे अशोक चांदना ने भी पंचायतीराज संस्थाओं से चुनावी राजनीति की शुरुआत की. वे 2010 में अजमेर जिला परिषद के सदस्य बने थे. इसके बाद विधानसभा पहुंचे और कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे. वहीं पूर्व विधायक चंद्रकांता मेघवाल वर्ष 2004 से 2008 तक जिला परिषद सदस्य रहीं. इसके बाद विधानसभा चुनाव का टिकट मिला। वे दो बार रामगंजमंडी और एक बार केशवरायपाटन से विधायक चुनी गईं. चूरू के भाजपा विधायक हरलाल सहारण का राजनीतिक सफर भी स्थानीय निकाय और पंचायतीराज संस्थाओं से जुड़ा रहा है. वे चूरू पंचायत समिति के प्रधान और इसके बाद जिला प्रमुख रहे। बाद में विधानसभा तक पहुंचे.

ग्रामीण नेतृत्व फिर चर्चा का केंद्र
बहरहाल, राजस्थान में चल रहे पंचायतीराज चुनावों ने एक बार फिर ग्रामीण नेतृत्व को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनावों में भाजपा-कांग्रेस के साथ निर्दलीय प्रत्याशी भी मैदान में हैं. गांव की समस्याओं, स्थानीय विकास और जनप्रतिनिधित्व से जुड़ी यह चुनावी राजनीति नए चेहरों को सार्वजनिक जीवन में आगे आने का मौका देती है. पिछले दशकों के राजनीतिक सफर बताते हैं कि राजस्थान में पंचायत की राजनीति सिर्फ सरपंच, प्रधान या जिला प्रमुख के पद तक सीमित नहीं रही. कई नेताओं ने इसी अनुभव के आधार पर विधानसभा और संसद तक का सफर तय किया.

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