बांस के धनुष से ओलंपिक तक: तीरंदाज लिंबा राम की अनसुनी कहानी
Limba Ram Archery : राजस्थान के उदयपुर से निकले महान तीरंदाज और पद्मश्री लिंबाराम की पूरी कहानी. बांस के देसी धनुष से लेकर ओलंपिक और विश्व रिकॉर्ड तक का उनका शानदार सफर और आज गंभीर बीमारी से उनका संघर्ष. पढ़ें भारतीय आर्चरी के पहले सुपरहीरो की अनसुनी बायोग्राफी
जापान में चल रहे 2026 एशियाई खेलों में भारतीय तीरंदाजों ने अब तक छह शानदार पदक जीतकर देश का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है. आधुनिक बो (Bow), अत्याधुनिक तकनीक और विश्वस्तरीय सुविधाओं के बीच हमारे तीरंदाज दुनिया पर छा रहे हैं. लेकिन एक वक्त वो भी था जब बिना किसी आधुनिक सुविधा के उदयपुर के एक आदिवासी लड़के लिंबा राम ने तीरंदाजी में भारत को पहला बड़ा मुकाम दिलाया था. लिंबाराम के लिए तीरंदाजी कोई 'खेल' नहीं,बल्कि बांस के धनुष से चिड़िया मारकर अपने परिवार की दिन भर की भूख मिटाने का जरिया था. फिर कैसे लिंबाराम ओलंपिक तक जा पहुंचे ?
उदयपुर के जंगलों से शुरू हुई कहानी
लिंबा राम का जन्म 30 जनवरी 1972 को राजस्थान के उदयपुर जिले के एक बेहद पिछड़े और गरीब आदिवासी गांव (सरदीत) में हुआ था. अहरी जनजाति से ताल्लुक रखने वाले लिंबा के बचपन में 'ओलंपिक','एशियन गेम्स' या 'स्पोर्ट्स' जैसे शब्दों का कोई अस्तित्व ही नहीं था. उनके लिए जीवन का सीधा सा गणित था-अगर आज पेट भरना है,तो शिकार करना होगा.लिंबा राम जब बहुत छोटे थे,तब उन्होंने अपने हाथों से बांस को छीलकर एक देसी धनुष और बाण तैयार किया था. जिससे जंगलों में उड़ती हुई चिड़ियों और छोटे जानवरों का शिकार करते थे. उनका निशाना इतना अचूक था कि उड़ती हुई चिड़िया भी उनके बाण से बच नहीं पाती थी.
स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) की वो खोज जिसने इतिहास बदल दिया
लिंबा राम की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ साल 1987 में आया. भारत सरकार और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) ने देश के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में छिपी खेल प्रतिभाओं को खोजने के लिए एक विशेष टैलेंट हंट शुरू किया था. इसी अभियान के तहत चयनकर्ताओं की एक टीम राजस्थान के आदिवासी बहुल इलाकों में पहुंची.मकराना और उदयपुर के आस-पास जब ट्रायल शुरू हुए, तो खेल अधिकारियों ने स्थानीय लड़कों को निशाना लगाने को कहा. लिंबा राम ने भी अपने उसी बांस के धनुष के साथ इस ट्रायल में हिस्सा लिया. लिंबा राम को और उनके एक अन्य साथी श्याम लाल मीणा को दिल्ली स्थित ट्रेनिंग कैंप के लिए चुन लिया गया.
जब हाथ में लिया फाइबर ग्लास और कार्बन वाला धनुष
लिंबा राम ने पहली बार आधुनिक फाइबर ग्लास और कार्बन वाले धनुष को हाथ लगाया था. जिस लड़के ने जीवन भर सिर्फ चिड़ियों को देखकर तीर छोड़ा था,उसे अब एक रंगीन टारगेट पर निशाना लगाना था. लेकिन लिंबा की सीखने की लगन और उनकी प्राकृतिक प्रतिभा इतनी अद्भुत थी कि उन्होंने कुछ ही महीनों में आधुनिक तीरंदाजी की बारीकियों को सीख लिया.
विश्व रिकॉर्ड से ओलंपिक तक का सफर
देसी बांस के धनुष से शुरू हुआ सफर बहुत जल्द अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तहलका मचाने लगा. 1989 में लिंबा राम ने बीजिंग में आयोजित एशियन आर्चरी चैंपियनशिप में पहली बार भारत का प्रतिनिधित्व किया. लेकिन उनका सबसे स्वर्णिम पल साल 1992 में आया.बीजिंग में ही आयोजित 1992 की एशियाई तीरंदाजी चैंपियनशिप में लिंबा राम ने वो कर दिखाया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी. उन्होंने 30 मीटर स्पर्धा में ताकायोशी मात्सुशिता के विश्व रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया. ये भारतीय तीरंदाजी के इतिहास में एक मील का पत्थर था. लिंबा राम ने एक या दो नहीं, बल्कि तीन-तीन ओलंपिक खेलों (1988 सियोल, 1992 बार्सिलोना और 1996 अटलांटा) में भारत का प्रतिनिधित्व किया. 1992 के बार्सिलोना ओलंपिक में वो पदक के बेहद करीब पहुंच गए थे और मात्र एक अंक से कांस्य पदक चूक गए. उनके इस अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2012 में देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' के साथ-साथ 'अर्जुन पुरस्कार'से भी सम्मानित किया.
आज कैसी है हमारे चैंपियन की हालत ?
एशियाई खेलों में आज जब हमारे युवा तीरंदाज पदकों की झड़ी लगा रहे हैं, तो हमें उस नींव को नहीं भूलना चाहिए जिसे लिंबा राम ने रखा था. हालांकि,वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है, जो हाथ कभी हवा को चीरते हुए अचूक तीर चलाते थे, साल 2018 के बाद से गंभीर बीमारी की चपेट में आ गये.लिंबा राम पिछले कुछ सालों से एक गंभीर न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी 'पार्किंसन' से जूझ रहे हैं. ये एक ऐसी बीमारी है जो तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है, जिससे शरीर में कंपन,संतुलन की कमी और मांसपेशियों में जकड़न आ जाती है. राजस्थान उदयपुर में उनके भाई शंकर लाल ने बात करने पर पता चला कि लिंबाराम की कोई संतान नहीं थी. मां और एक भाई का निधन हो चुका है और एक भाई गांव में ही अपने परिवार के साथ रहते हैं. साल 2018 से लिंबाराम इस बीमारी से लड़ रहे है और दिल्ली में ही इलाज करा रहे हैं.दिल्ली के खेल आश्रम में अपनी पत्नी के साथ लिंबाराम रहते हैं. जीवन के इस सबसे कठिन मुकाबले में भी वे हार माने बिना हर दिन संघर्ष कर रहे हैं. उम्मीद है कि देश का ये चमकता सितारा ,बीमारी को मात देकर एक बार फिर से स्वस्थ और मुस्कुराता हुआ हमारे बीच नजर आएगा.