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क्या इस दिवाली अंधेरे में रहेंगे दीये बनाने वाले हाथ? कुम्हारों ने सरकार से गुहार लगाकर की यह बड़ी मांग

दीपावली से पहले कोटपूतली के कुम्हारों का कारोबार मुश्किल में है. चाइनीज लाइटों और फ्रिज-RO के बढ़ते चलन से दीये और मटकों की मांग घटी है. कारीगरों ने सरकार से मिट्टी उपलब्ध कराने की मांग की है.

Written By Zee Rajasthan Web Team
Published: Nov 03, 2026, 07:22 AM IST | Updated: Nov 03, 2026, 07:27 AM IST
Image Credit: फ्रिज और RO ने कम कर दी मटकों की मांग.
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दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है. लोग घरों की सजावट और खरीदारी में जुट गए हैं. लेकिन त्योहार की इस चमक के बीच मिट्टी के दीपक और बर्तन बनाने वाले कुम्हारों की चिंता भी बढ़ रही है. आधुनिक सजावट और चाइनीज इलेक्ट्रिक लाइटों के बढ़ते चलन ने उनके पुश्तैनी कारोबार को प्रभावित किया है. कोटपूतली में कुम्हार परिवार आज भी अपनी पारंपरिक कला को बचाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं.

दिन-रात मेहनत कर तैयार कर रहे मिट्टी के दीपक
कोटपूतली में दीपावली की तैयारियों के बीच कुम्हार परिवारों के घरों में भी काम तेजी से चल रहा है. परिवार के पुरुष मिट्टी के दीपक, मटके और दूसरे बर्तन तैयार करने में जुटे हैं, वहीं घर की महिलाएं इन पर रंग-रोगन और नक्काशी कर इन्हें सुंदर रूप दे रही हैं.

कुम्हारों के हाथों से तैयार होने वाला हर दीपक सिर्फ मिट्टी का सामान नहीं, बल्कि हमारी पुरानी परंपरा और संस्कृति की पहचान है. इन दीपकों से कभी हर घर का आंगन रोशन होता था, लेकिन अब बाजार में इन्हें अपनी जगह बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

चाइनीज लाइटों ने बदला दीपावली का अंदाज
समय के साथ दीपावली मनाने का तरीका भी बदल रहा है. पहले लोग त्योहार पर घरों में मिट्टी के दीये जलाकर सजावट करते थे, लेकिन अब रंग-बिरंगी झालरों, चाइनीज लाइटों और इलेक्ट्रिक सजावट की मांग बढ़ गई है. इसका सीधा असर मिट्टी के दीपक बनाने वाले कारीगरों के कारोबार पर दिखाई दे रहा है. कुम्हारों का कहना है कि मेहनत और लागत लगाने के बावजूद पहले जैसी बिक्री नहीं हो रही है. ऐसे में उनके सामने परिवार की आजीविका चलाने के साथ अपनी पुश्तैनी कला को बचाए रखने की चुनौती भी है.

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फ्रिज और RO ने कम कर दी मटकों की मांग
मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल भी पहले के मुकाबले कम होता जा रहा है. पहले गर्मियों में लगभग हर घर में पीने का पानी मिट्टी के मटकों में रखा जाता था. लोग मटके का पानी पीना पसंद करते थे, लेकिन अब फ्रिज और RO का चलन बढ़ने से मटकों की मांग घट गई है.

कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी के मटकों में रखा पानी पीना पारंपरिक रूप से पसंद किया जाता था, लेकिन आधुनिक सुविधाओं के कारण लोग अब दूसरे विकल्प अपना रहे हैं. इसका असर मटके बनाने और बेचने वाले परिवारों की कमाई पर भी पड़ा है.

मिट्टी की कमी से भी बढ़ रही परेशानी
कुम्हारों के सामने सिर्फ बाजार में घटती मांग ही समस्या नहीं है, बल्कि मिट्टी की उपलब्धता भी चिंता का विषय बनती जा रही है. उनका कहना है कि अगर समय रहते मिट्टी उपलब्ध नहीं हुई तो आने वाले दिनों में बर्तन बनाना और मुश्किल हो जाएगा.

कारीगरों को डर है कि इसी तरह हालात बने रहे तो सदियों पुरानी मिट्टी के बर्तन बनाने की परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो सकती है. उन्होंने सरकार से मांग की है कि कुम्हारों को बर्तन बनाने के लिए पर्याप्त मिट्टी उपलब्ध करवाई जाए, ताकि उनका रोजगार और पारंपरिक हुनर दोनों सुरक्षित रह सकें.

स्थानीय कारीगरों से मिट्टी के दीये खरीदने की अपील
कुम्हारों का कहना है कि दीपावली पर लोग मिट्टी के दीये खरीदकर उनकी मेहनत को सहारा दे सकते हैं. इससे न केवल स्थानीय कारीगरों की आमदनी बढ़ेगी, बल्कि हमारी पारंपरिक कला और संस्कृति को भी आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी. त्योहार पर घरों को रोशन करने के साथ उन हाथों का भी ख्याल रखना जरूरी है, जो मिट्टी को आकार देकर दीपावली की खुशियां खास बनाते हैं.
 

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