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पचपहाड़ के सरकारी स्कूल की अनोखी कहानी, बच्चों की गलती से आया QR Code का आइडिया, डॉ. दिव्येंदु सेन को राष्ट्रपति सम्मान

Divyendu Sen Exclusive Interview: झालावाड़ के डॉ. दिव्येंदु सेन को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 से सम्मानित किया गया है. पचपहाड़ के सरकारी स्कूल में उन्होंने बच्चों को खगोल विज्ञान और तकनीक से जोड़ा. छात्रों ने 12 asteroid candidates खोजे और स्कूल में QR कोड आधारित पेड़ प्रोजेक्ट भी शुरू किया.

Reported By Pragati Pant Awasthi Written By Sandhya Yadav
Published: Sep 06, 2026, 09:14 AM IST | Updated: Sep 26, 2026, 10:37 AM IST
Image Credit: Divyendu Sen Exclusive Interview
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Divyendu Sen Exclusive Interview: राजस्थान के झालावाड़ जिले के लिए इस बार का शिक्षक दिवस खास उपलब्धि लेकर आया. पचपहाड़ स्थित महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय के जीव विज्ञान शिक्षक डॉ. दिव्येंदु सेन को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चुना गया. 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से सम्मानित किए जाने वाले शिक्षकों में उनका नाम शामिल रहा.

देशभर से चयनित 48 स्कूल शिक्षकों में डॉ. सेन राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने वाले शिक्षकों में शामिल रहे. उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों को विज्ञान, खगोल विज्ञान और आधुनिक तकनीक से जोड़कर कई पहल की हैं. इसी उपलब्धि और उनके शिक्षण मॉडल को लेकर उनसे खास बातचीत हुई. पढ़िए एक्सक्लूजिव इंटरव्यू.

सवाल: सरकारी स्कूल से कुछ अलग और असाधारण करने की प्रेरणा कहां से मिली?
डॉ. दिव्येंदु सेन: लोगों में सरकारी स्कूल के प्रति नकारात्मक छवि जरूर है, लेकिन सरकारी स्कूल कभी भी मेरे लिए संसाधनों की कमी का नाम नहीं रहा, बल्कि संभावना का स्थान रहा है. मैंने हमेशा महसूस किया कि अगर बच्चे में सीखने की जिज्ञासा है और शिक्षक में कुछ नया करने का जज्बा है तो सीमित संसाधनों में बहुत कुछ किया जा सकता है. मैंने यह सोचने के बजाय कि हमारे पास क्या नहीं है, यह सोचा कि जो है, उसका बेहतर उपयोग कैसे किया जाए. मेरी कोशिश हमेशा यही रही कि सरकारी स्कूल का बच्चा वही सपने देखे जो बड़े स्कूल के बच्चे देखते हैं.

सवाल: आपकी अपनी स्कूलिंग कैसी रही और आपको किस चीज से सीख मिली?
डॉ. दिव्येंदु सेन: मेरी शुरुआती शिक्षा एक प्राइवेट स्कूल से हुई. 11वीं और 12वीं मैंने झालावाड़ के एक सरकारी स्कूल से पूरी की. मैं कोई टॉपर नहीं रहा. आप मुझे एवरेज से नीचे भी कह सकते हैं. फिर जब मैं टीचर बना तो मेरा अनुभव ही मेरे लिए सीख बना. जब मैंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो समझ आया कि हर बच्चा अपने तरीके से सीखता है. मैं परसेंटेज को बैरियर नहीं मानता. मेरी कोशिश रहती है कि बच्चों की जिज्ञासा को शांत किया जाए.

सवाल: बच्चों को खगोल विज्ञान और तकनीक जैसे आधुनिक विषयों से जोड़ने का विचार कब आया?
डॉ. दिव्येंदु सेन: मेरे मन में यह विचार अचानक नहीं आया. एक शिक्षक के रूप में हमेशा यह सोचता रहा कि बच्चों को विज्ञान केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखा जाए. उनको प्रैक्टिकल करके दिखाकर समझाया जाए. खगोल विज्ञान में मुझे ऐसा ऑप्शन दिखा, जिसमें बच्चे बिना किसी लैब के किसी वैज्ञानिक विधि से जुड़ सकते हैं. इसके लिए पहले केवल एक लैपटॉप की जरूरत पड़ी. पहले कुछ बच्चे ऐसे भी थे, जिन्हें लैपटॉप चलाना नहीं आता था. मैंने उन्हें अब वास्तविक खगोल विज्ञान से जुड़ा डाटा पढ़ना और एनालाइज करना भी सिखा दिया है. मेरा मानना था कि बच्चों को सही दिशा और टूल्स मिल जाएं. अगर बच्चों को ये चीजें मिल जाएं तो संसाधनों की कमी बच्चों की जिज्ञासा में कभी बाधा नहीं बनेगी.

सवाल: ग्रामीण स्कूल के बच्चों को इस तरह की वैज्ञानिक गतिविधियों से जोड़ना कितना चुनौतीपूर्ण रहा?
डॉ. दिव्येंदु सेन: चुनौती संसाधनों की कमी से ज्यादा सही दिशा और अवसर देने की थी. मेरा मानना रहा कि बच्चों को सही दिशा और टूल्स मिल जाएं तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं. मैंने शुरुआत उपलब्ध संसाधनों से ही की. जरूरी नहीं था कि पहले सारी सुविधाएं मिलें और उसके बाद काम शुरू किया जाए.

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सवाल: प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय लोगों को अपनी मुहिम से जोड़ने का तरीका कैसे विकसित किया?
डॉ. दिव्येंदु सेन: मेरा मानना है कि सरकारी व्यवस्था में संसाधन महत्वपूर्ण तो हैं, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है लोगों को अपने उद्देश्य से जोड़ पाना. मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि पहले सभी संसाधन उपलब्ध हों, फिर काम शुरू करूं. मैंने जो उपलब्ध था, उसी से शुरुआत की और जब उसके परिणाम सामने आने लगे तो लोगों का विश्वास जगा.

जब उन्हें दिखाई दिया कि ग्रामीण सरकारी स्कूल के बच्चे वास्तव में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की वैज्ञानिक गतिविधियों से जुड़ रहे हैं तो उनका सहयोग अपने आप बढ़ता गया. स्थानीय लोगों को जोड़ने में भी यह तरीका काम आया. मैंने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि यह सिर्फ स्कूल का प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के बच्चों के लिए अवसर पैदा करने का प्रयास है. मेरे लिए नेतृत्व का मतलब अकेले सब कुछ करना नहीं है. जब आप अपनी सोच पर लोगों का विश्वास कायम कर सकें और उन्हें यह महसूस करा सकें कि यह काम उनका भी है, तभी कोई मुहिम आगे बढ़ती है.

सवाल: पेड़ों पर QR कोड लगाने का अनूठा आइडिया कैसे आया?
डॉ. दिव्येंदु सेन: पेड़ों पर QR कोड लगाने का विचार अर्बन एरिया में विद्यार्थियों को पेड़ों के बारे में कम जानकारी होने से आया. एक दिन बच्चे गार्डन की सफाई कर रहे थे. वे मेरे पास आए और बोले कि हम खर-पतवार फेंकने जा रहे हैं, जबकि वह अश्वगंधा का पौधा था. यानीकी बच्चों को पता ही नहीं था कि वह है क्या.

तब मेरे दिमाग में आया कि जो स्थिति विद्यार्थियों की है, वही बाकी लोगों की भी हो सकती है. हमने स्कूल परिसर के पेड़ों की पहचान की और सोचा कि क्यों न हर पेड़ को एक डिजिटल फीचर में बदल दिया जाए. हमने संबंधित पौधे की जानकारी बच्चों की आवाज में रिकॉर्ड की और फिर उसे QR कोड में परिवर्तित कर पेड़ के सामने लगा दिया. हमने इसकी शुरुआत 2024 में की थी. पहले PDF की जानकारी ओपन होती थी और अब "ट्री टॉक" का इनिशिएटिव किया है.

सवाल: इस "ट्री टॉक" पहल में क्या खास है?
डॉ. दिव्येंदु सेन: इसमें पेड़ बोलता है कि मैं नीम का पेड़ हूं, मैं पीपल का पेड़ हूं. आवाज बच्चों की होती है. हर बच्चे को एक पेड़ अलॉट किया और उसी की आवाज में QR कोड तैयार किया. जैसे ही कोई विजिटर, बच्चा या कोई टीचर पेड़ के सामने लगे QR कोड को स्कैन करता है, वह पेड़ बोलता है कि मैं नीम का पेड़ हूं, मैं पीपल का पेड़ हूं. फिर वह पूरी जानकारी देता है. इसमें कक्षा 6 से लेकर 12 तक के विद्यार्थियों की आवाज होती है. हमने कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी की भी आवाज रिकॉर्ड की है. ग्रामीण क्षेत्र को टारगेट करते हुए इसे मौलिक भाषा में भी तैयार किया, ताकि आम लोग इसे समझ सकें और अपनी स्थानीय भाषा में जानकारी हासिल कर सकें.

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सवाल: इस पूरी पहल से आपको शिक्षा को लेकर सबसे बड़ी सीख क्या मिली?
डॉ. दिव्येंदु सेन: मेरी कोशिश हमेशा यही रही कि बच्चों को केवल अंक या परीक्षा परिणाम तक सीमित न रखा जाए. बच्चों में जिज्ञासा पैदा करना और उन्हें सीखने के अवसर देना ज्यादा जरूरी है. अगर सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थी भी बड़े वैज्ञानिक अभियानों में भागीदारी कर सकते हैं.

सवाल: आपके मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने किस तरह की वैज्ञानिक गतिविधियों में हिस्सा लिया?
डॉ. दिव्येंदु सेन: हमारे स्कूल के विद्यार्थियों ने NASA समर्थित International Astronomical Search Campaign जैसी वैज्ञानिक गतिविधियों में हिस्सा लिया. छात्रों ने 12 Asteroid Candidates की पहचान की, जिनमें से चार को provisional discovery के तौर पर मान्यता मिली.

सवाल: राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चयन और राष्ट्रपति से सम्मान मिलने को आप किस तरह देखते हैं?
डॉ. दिव्येंदु सेन: यह सम्मान मेरे लिए व्यक्तिगत उपलब्धि से ज्यादा उन बच्चों और पूरे स्कूल की उपलब्धि है, जिन्होंने इन गतिविधियों में हिस्सा लिया. मेरा मानना है कि ग्रामीण सरकारी स्कूल के बच्चों में भी बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने की क्षमता है. जरूरत सिर्फ उन्हें सही दिशा, अवसर और प्रोत्साहन देने की है.
 

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मीडिया की दुनिया में 18 साल का सफर... एंकरिंग से लेकर डिजिटल की स्क्रीन तक, हर नया बदलाव दिल से अपनाया, जो सोचती हूं, वही कहती हूं, बातों को घुमाना मेरी आदत नहीं, दिल की बात जुबां पर रखना पहचान है. फिलहाल 'ज़ी राजस्थान डिजिटल' के साथ सफर जारी है और हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बरकरार है और रहेगी. Pragati.Pant@india.com ईमेल के जरिए आप संपर्क कर सकते हैं.
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