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राजस्थान के बालोतरा में कपड़ा धुलाई उद्योग से निकलने वाले दूषित पानी और पर्यावरण प्रदूषण को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की कार्रवाई के बाद अब सीमावर्ती जिले जैसलमेर के ग्रामीण इलाकों में भी प्रदूषण का खतरा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. आरोप है कि बालोतरा में बंद हुई कुछ कपड़ा धुलाई इकाइयों के संचालकों ने अब जैसलमेर का रुख कर लिया है. यहां फतेहगढ़ उपखंड के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि किराए पर लेकर कपड़ों की धुलाई के लिए केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन इकाइयों से निकलने वाले रासायनिक पानी के निस्तारण को लेकर सवाल उठ रहे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि केमिकलयुक्त पानी को खुले में छोड़ा जा रहा है. यदि ऐसा जारी रहा तो इससे न केवल खेतों की मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, बल्कि जमीन के बंजर होने और भूजल दूषित होने का खतरा भी बढ़ सकता है.
बालोतरा में कार्रवाई के बाद जैसलमेर पहुंचे कपड़ा कारोबारी
जैसलमेर मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर फतेहगढ़ उपखंड के ग्रामीण इलाकों में कपड़ा धुलाई की इकाइयों के संचालन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. बताया जा रहा है कि बालोतरा में एनजीटी की कार्रवाई के बाद वहां कपड़ा धुलाई से जुड़ी कई इकाइयां बंद हो गई थीं. इन इकाइयों पर दूषित पानी खुले में छोड़ने और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के आरोप थे.
इसी के बाद कुछ कपड़ा कारोबारियों ने अपनी गतिविधियों के लिए जैसलमेर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों को चुना है. आरोप है कि यहां ग्रामीणों से किराए पर कृषि भूमि लेकर कपड़े धोने का काम शुरू किया गया है. इन इकाइयों में कपड़ों की सफाई के लिए रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जा रहा है. ग्रामीणों के मुताबिक, इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले केमिकलयुक्त पानी को खुले स्थानों पर छोड़ा जा रहा है. इससे आसपास की जमीन और प्राकृतिक जल स्रोतों पर बुरा असर पड़ने की आशंका है.
कृषि भूमि पर फैक्ट्रियां संचालित करने की अनुमति किसने दी?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल कृषि भूमि पर औद्योगिक गतिविधियां संचालित करने को लेकर है. ग्रामीण क्षेत्रों में जिन स्थानों पर कपड़ा धुलाई की इकाइयां चलने की बात सामने आ रही है, वहां जमीन के उपयोग और फैक्ट्री संचालन की वैधता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं.
क्या कृषि उपयोग के लिए दर्ज खातेदारी भूमि पर कपड़ा धुलाई जैसी औद्योगिक गतिविधियां शुरू करने के लिए संबंधित विभागों से अनुमति ली गई है? क्या इन इकाइयों के पास राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल की आवश्यक सहमति है? क्या केमिकलयुक्त पानी को साफ करने और उसके सुरक्षित निस्तारण के लिए कोई व्यवस्था की गई है?
यदि फैक्ट्रियां जरूरी अनुमतियों के बिना संचालित हो रही हैं, तो यह नियमों के उल्लंघन का मामला हो सकता है. हालांकि, इस संबंध में वास्तविक स्थिति संबंधित दस्तावेजों और विभागीय जांच के बाद ही साफ हो पाएगी.
खुले में छोड़ा जा रहा केमिकलयुक्त पानी, ग्रामीणों में नाराजगी
फतेहगढ़ क्षेत्र के ग्रामीणों में इन इकाइयों के संचालन को लेकर नाराजगी बताई जा रही है. ग्रामीणों का कहना है कि कपड़ा धुलाई के दौरान इस्तेमाल होने वाले रसायनों के कारण निकलने वाला गंदा पानी खुले में छोड़ा जा रहा है.
ग्रामीण इलाकों में इस तरह की गतिविधियों का असर केवल आसपास की जमीन तक सीमित नहीं रह सकता. रासायनिक अपशिष्ट यदि मिट्टी में पहुंचता है तो जमीन की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. वहीं, इसके भूजल तक पहुंचने की स्थिति में पानी के दूषित होने का खतरा भी पैदा हो सकता है.
जैसलमेर पहले से ही मरुस्थलीय और कम वर्षा वाला जिला है. यहां पानी के सीमित संसाधनों और कृषि भूमि का संरक्षण बेहद जरूरी है. ऐसे में यदि रासायनिक पानी के निस्तारण की उचित व्यवस्था नहीं है, तो भविष्य में ग्रामीणों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.
क्या स्थानीय प्रशासन को नहीं थी फैक्ट्रियों की जानकारी?
इस मामले ने स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. फतेहगढ़ उपखंड मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर के आसपास ग्रामीण क्षेत्रों में यदि कपड़ा धुलाई की इकाइयां संचालित हो रही हैं, तो क्या इसकी जानकारी प्रशासन को नहीं थी?
राजस्व विभाग, पटवारी, ग्राम सेवक और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी भी इस मामले में महत्वपूर्ण हो जाती है. सवाल यह है कि कृषि भूमि पर इस तरह की गतिविधियां शुरू होने के दौरान भूमि उपयोग और फैक्ट्री संचालन की जांच क्यों नहीं हुई? अभी तक किसी अधिकारी की मिलीभगत या जानबूझकर अनदेखी करने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. इसलिए संबंधित अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच के बाद ही किया जा सकता है.
प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने जल्द कार्रवाई की बात कही
इस मामले में जैसलमेर प्रदूषण नियंत्रण मंडल के क्षेत्रीय अधिकारी भलाराम सियाग ने जानकारी देते हुए बताया कि बालोतरा में कपड़ा धुलाई की कई इकाइयों पर एनजीटी ने कार्रवाई की थी. इन इकाइयों से दूषित पानी खुले में छोड़ा जा रहा था, जिससे आसपास का वातावरण प्रदूषित हो रहा था. इसी वजह से बालोतरा में लंबे समय से कई कपड़ा धुलाई इकाइयां बंद पड़ी हैं.
भलाराम सियाग के अनुसार, विभाग को जानकारी मिली है कि बालोतरा की कुछ बंद इकाइयों के मालिकों ने जैसलमेर जिले के फतेहगढ़ क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में कृषि भूमि किराए पर लेकर कपड़ा धुलाई की फैक्ट्रियां शुरू की हैं. उन्होंने बताया कि इन इकाइयों के संचालन को लेकर विभाग की ओर से जल्द कार्रवाई की जाएगी.
समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो बढ़ सकती है परेशानी
जैसलमेर जैसे शुष्क और सीमावर्ती जिले में जमीन और पानी को प्रदूषण से बचाना बेहद जरूरी है. यदि कपड़ा धुलाई इकाइयों से निकलने वाले रासायनिक पानी का उचित उपचार नहीं किया जा रहा है, तो संबंधित विभागों को जल्द मौके पर पहुंचकर जांच करनी चाहिए.
फैक्ट्रियों के दस्तावेजों, भूमि उपयोग की अनुमति और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी व्यवस्थाओं की जांच के साथ दूषित पानी के नमूने लेना भी जरूरी है. यदि नियमों का उल्लंघन मिलता है तो संबंधित इकाइयों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए.
बालोतरा में एनजीटी की कार्रवाई के बाद अब जैसलमेर के ग्रामीण इलाकों में इसी तरह की गतिविधियों के आरोप सामने आना चिंता बढ़ाने वाला है. ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण मंडल इस मामले को गंभीरता से लेंगे. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जैसलमेर प्रशासन समय रहते इन इकाइयों की जांच कर कृषि भूमि और भूजल को प्रदूषित होने से बचा पाएगा, या फिर बालोतरा के बाद प्रदूषण का यह खतरा जैसलमेर के ग्रामीण इलाकों में भी बढ़ता जाएगा?