Explainer: संकरी गलियां और 300 साल पुराना बाजार, पढ़ें आग को शांत करने में कहां हुई चूक?
Purohit Ji Ka Katla, Fire Explainer: जयपुर के चारदीवारी क्षेत्र में बड़ी चौपड़ के पास स्थित पुरोहित जी के कटला में गुरुवार सुबह भीषण आग लगने से हड़कंप मच गया. तीन मंजिला इमारत और आसपास की दुकानों में आग फैलने की सूचना के बाद दमकल की कई गाड़ियां मौके पर पहुंचीं. लेकिन बाजार की संकरी गलियां, अतिक्रमण और पुरानी इमारतों के कारण राहत एवं बचाव कार्य चुनौतीपूर्ण रहा.
Jaipur Purohit Ji Ka Katla Fire: जयपुर की पहचान सिर्फ उसके किलों, महलों और गुलाबी रंग की इमारतों से नहीं है. शहर की पुरानी चारदीवारी के भीतर ऐसे कई बाजार हैं, जिनकी पहचान सदियों पुरानी व्यापारिक परंपराओं से जुड़ी हुई है. इन्हीं में एक नाम पुरोहित जी का कटला है. कपड़ों और शादी-ब्याह से जुड़े सामान के बड़े बाजार के तौर पर पहचान रखने वाले इस कटले में गुरुवार सुबह लगी आग ने एक बार फिर पुराने शहर की बाजार व्यवस्था और उसकी सुरक्षा तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए.
आग की घटना के दौरान सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ आग की लपटें नहीं थीं. चुनौती थी उस आग तक दमकल की पहुंच. संकरी गलियां, दुकानों के बाहर सामान, पुराने निर्माण और भीड़भाड़ वाला इलाका. इन सबके बीच दमकलकर्मियों को आग बुझाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी. राजस्थान सरकार के नगर नियोजन एवं नगरीय विकास विभाग से जुड़े एक दस्तावेज में भी पुरोहित जी के कटला को घनी आबादी और तंग गलियों वाला बाजार बताते हुए यहां पहले हुई आग की घटनाओं तथा दमकल पहुंचाने में आने वाली मुश्किलों का उल्लेख किया गया था. तो आखिर पुरोहित जी का कटला है क्या? इसका इतिहास कितना पुराना है? आग के दौरान कौन-कौन सी चुनौतियां सामने आईं? फायर सेफ्टी को लेकर क्या सवाल हैं? और अतिक्रमण इस पूरे मामले को कितना गंभीर बनाता है? आइए समझते हैं.
आग कब और कहां लगी?
गुरुवार सुबह करीब 8 बजे जयपुर के चारदीवारी इलाके में बड़ी चौपड़ के पास पुरोहित जी के कटला में आग लगने की जानकारी सामने आई. शुरुआती जानकारी के मुताबिक आग कटले की एक तीन मंजिला इमारत में लगी और देखते ही देखते धुआं पूरे इलाके में फैल गया. घटना की सूचना मिलते ही दमकल विभाग की कई गाड़ियां मौके पर पहुंचीं. पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंचे. आग के कारण बाजार के आसपास धुएं का बड़ा गुबार दिखाई देने लगा. पुरोहित जी का कटला कपड़ों का बड़ा थोक बाजार है. यहां कपड़े, साड़ियां, महिलाओं के परिधान, ब्राइडल लहंगे और शादी से जुड़े सामान का कारोबार होता है. ऐसे बाजार में आग लगने का खतरा इसलिए भी गंभीर हो जाता है क्योंकि बड़ी मात्रा में कपड़ा और अन्य सामान मौजूद रहता है.
इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि आग सुबह बाजार खुलने से पहले लगी. स्थानीय स्तर पर यह बात सामने आई कि उस समय ज्यादातर दुकानें बंद थीं. अगर यही आग बाजार के व्यस्त समय में लगती तो आग के साथ-साथ भीड़ और भगदड़ का खतरा भी बढ़ सकता था. ताजा रिपोर्टों के अनुसार आग से कई दुकानों में लाखों रुपये के माल के नुकसान की बात सामने आई है और दमकलकर्मियों को संकरी गलियों के कारण काफी मशक्कत करनी पड़ी.
पुरोहित जी का कटला क्या है?
पुरोहित जी का कटला जयपुर के पुराने शहर के व्यापारिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह जौहरी बाजार और बड़ी चौपड़ के आसपास स्थित है और लंबे समय से कपड़ों तथा शादी-ब्याह से जुड़े सामान की थोक खरीदारी के लिए जाना जाता है. यहां खास तौर पर साड़ियां, कपड़े, महिलाओं के परिधान, ब्राइडल ड्रेस और दूसरे वैवाहिक सामान का कारोबार होता है. अलग-अलग रिपोर्टों और बाजार से जुड़ी जानकारियों में इसे जयपुर के प्रमुख थोक बाजारों में गिना जाता है. लेकिन इसकी कहानी सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है.
सदियों पुराना है बाजार
पुरोहित जी के कटले के इतिहास को लेकर मिली जानकारी के मुताबिक, यह बाजार करीब 300 साल पुराना है. बताया जाता है कि जयपुर बसने के समय महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने घासीरामजी को यहां बसाया था. बाद में उन्हीं के नाम से यह जगह पुरोहित जी का कटला कहलाने लगी. उनके बेटे सूरतरामजी ने यहां आगे और निर्माण करवाया.
यानी पुरोहित जी का कटला सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि करीब तीन सौ साल पुरानी जयपुर की पहचान से जुड़ी जगह है. जयपुर के पुराने शहर को लेकर तैयार की गई हेरिटेज योजना में भी पुरोहित जी के कटले को पुराने बड़े घरों से बने खास बाजारों में शामिल किया गया है. यहां लंबे समय से दुकानदारी और खरीद-बिक्री का काम होता आ रहा है.
फायर सेफ्टी के दावों पर उठे सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल बाजार की फायर सेफ्टी को लेकर है.
आग लगने के बाद बाजार में लगे फायर हाइड्रेंट और आग बुझाने के दूसरे इंतजामों पर सवाल उठ रहे हैं. स्थानीय लोगों और व्यापारियों का दावा है कि कुछ फायर हाइड्रेंट खराब हैं. कहीं वाल्व और कपलिंग नहीं होने की बात भी सामने आई है. इसके अलावा दुकानों के आसपास बिजली के खुले स्विच और लटकते तारों को लेकर भी चिंता जताई गई है. इस आग ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि बाजार में लगे आग बुझाने के इंतजाम कितने कारगर हैं. क्या आग लगने पर मदद समय पर पहुंच सकती है? फायर सेफ्टी का मतलब सिर्फ हाइड्रेंट और अग्निशमन यंत्र लगा देना नहीं है. असली बात यह है कि आग लगने पर ये इंतजाम काम भी करें.
ऐसे में कुछ सवालों के जवाब जरूरी हैं...
क्या आग लगने पर दमकल की गाड़ी बाजार के अंदर पहुंच सकती है?
क्या फायर हाइड्रेंट में पानी की पर्याप्त सप्लाई है?
क्या दुकानदारों और कर्मचारियों को आग बुझाने की ट्रेनिंग दी गई है?
क्या बिजली के तारों और वायरिंग की समय-समय पर जांच होती है?
क्या बाजार में इमरजेंसी एग्जिट की पर्याप्त व्यवस्था है?
क्या आग से बचने के लिए नियमित फायर ड्रिल कराई जाती है?
भीड़भाड़ वाले पुराने बाजारों में आग से बचाव के लिए इन सभी सवालों के जवाब बेहद जरूरी हैं.
अतिक्रमण और संकरी गलियों ने बढ़ाई परेशानी
जयपुर के पुरोहित जी के कटले में लगी आग के बाद सबसे ज्यादा सवाल बाजार की संकरी गलियों और अतिक्रमण को लेकर उठ रहे हैं. पुरोहित जी का कटला पुराने शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके में है. बाजार के अंदर आने-जाने के रास्ते कई जगह काफी संकरे हैं. ऐसे में आग लगने के दौरान दमकल की गाड़ियों को अंदर पहुंचने में परेशानी का सामना करना पड़ा. एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ जगहों पर दुकानों के बाहर कई फीट तक सामान रखा हुआ था. इस अतिक्रमण के कारण बड़ी दमकल गाड़ियों को बाजार के अंदर ले जाना मुश्किल हुआ.
पहले भी सामने आ चुकी है समस्या
राजस्थान सरकार के 2021 के एक आधिकारिक दस्तावेज में पुरोहित जी के कटला को घनी आबादी और तंग गलियों वाला बाजार बताया गया था. दस्तावेज में यह भी बताया गया था कि यहां पहले आग की कई घटनाएं हो चुकी हैं और दमकल की गाड़ियों को पहुंचने में काफी दिक्कत होती है. ऐसे में अब बड़ा सवाल यह है कि जब यह समस्या पहले से सामने थी, तो इसे दूर करने के लिए स्थायी इंतजाम क्यों नहीं किए गए?
अतिक्रमण हटाने के लिए पहले भी हुई कार्रवाई
पुरोहित जी के कटला और आसपास के इलाकों में अतिक्रमण हटाने को लेकर नगर निगम की कार्रवाई का रिकॉर्ड भी मौजूद है. एक कार्रवाई के दौरान बड़ी चौपड़, जौहरी बाजार और पुरोहित जी के कटला समेत कई इलाकों से अस्थायी अतिक्रमण हटाया गया था. इस दौरान सामान जब्त करने की जानकारी भी सामने आई थी. इससे पता चलता है कि अतिक्रमण के खिलाफ पहले भी कार्रवाई होती रही है. लेकिन अब सवाल यह है कि क्या इन कार्रवाइयों से समस्या का स्थायी समाधान हो पाया? या कुछ समय बाद फिर वही स्थिति बन गई?
व्यापारी का नुकसान सिर्फ दुकान तक सीमित नहीं
आग लगने के बाद सबसे ज्यादा चिंता उन व्यापारियों की होती है, जिनकी दुकानें प्रभावित होती हैं. कपड़ा बाजार में एक दुकान के अंदर लाखों रुपये का स्टॉक होना असामान्य नहीं है. खासकर त्योहारी और शादी के सीजन से पहले व्यापारी बड़ी मात्रा में माल जमा करके रखते हैं. ऐसे में आग से दुकान का ढांचा ही नहीं, बल्कि महीनों की कमाई और पूरा स्टॉक भी प्रभावित हो सकता है. मौके पर पहुंचे व्यापारियों ने आग और धुएं का मंजर देखा तो उनका आक्रोश और चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ी. ताजा रिपोर्टों में भी लाखों रुपये के नुकसान की बात सामने आई है. व्यापारियों की शिकायतों का एक दूसरा पहलू दमकल की पहुंच और आग बुझाने में लगने वाला समय है. अगर किसी बाजार में दमकल की बड़ी गाड़ी सीधे आग वाली जगह तक नहीं पहुंच सकती तो आग बुझाने का पूरा ऑपरेशन जटिल हो जाता है. ऐसे में व्यापारियों का सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि आग क्यों लगी, बल्कि यह भी होता है कि आग लगने के बाद सिस्टम कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी तरीके से प्रतिक्रिया कर सकता है.
प्रशासनिक लापरवाही या सिस्टम की पुरानी चुनौती?
यह सबसे संवेदनशील सवाल है.
किसी भी आग के बाद सीधे प्रशासन को दोषी ठहरा देना आसान है, लेकिन वास्तविक स्थिति समझने के लिए कई स्तरों पर जांच जरूरी होती है.
यह पता करना होगा कि...
पहला: आग की वास्तविक वजह क्या थी?
दूसरा: जिस इमारत में आग लगी, वहां फायर सेफ्टी मानकों का पालन कितना था?
तीसरा: बाजार के फायर हाइड्रेंट और दूसरे सुरक्षा उपकरण वास्तव में काम कर रहे थे या नहीं?
चौथा: बाजार में अतिक्रमण की स्थिति क्या थी और उसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर थी?
पांचवां: क्या दमकल विभाग के पास ऐसे संकरे बाजार के लिए छोटे आकार के फायर टेंडर, पाइपलाइन या वैकल्पिक फायरफाइटिंग व्यवस्था उपलब्ध है?
छठा: क्या बाजार में समय-समय पर फायर ऑडिट किया जाता है?
इन सवालों के जवाब के बाद ही यह तय किया जा सकेगा कि इस हादसे में प्रशासनिक स्तर पर कहां कमी रही और कहां बाजार की अपनी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर थी.
सबसे बड़ा सबक क्या है?
पुरोहित जी के कटला की आग सिर्फ एक बाजार में हुई आग की घटना नहीं है. यह जयपुर की पुरानी चारदीवारी के उन बाजारों के लिए भी चेतावनी है जहां पुरानी इमारतें, घनी आबादी, व्यावसायिक गतिविधियां, संकरी गलियां और बड़ी मात्रा में ज्वलनशील सामान एक साथ मौजूद हैं. ऐसे बाजारों के लिए सामान्य फायर सेफ्टी व्यवस्था से ज्यादा जरूरी है विशेष आपदा प्रबंधन योजना.
बाजार में नियमित फायर ऑडिट हो. खराब हाइड्रेंट को तत्काल दुरुस्त किया जाए. बिजली की वायरिंग की जांच हो. दुकानों के बाहर होने वाले अतिक्रमण को नियंत्रित किया जाए. इमरजेंसी रास्तों को हर समय खाली रखा जाए. छोटे फायर टेंडर या वैकल्पिक उपकरणों की व्यवस्था की जाए. व्यापारियों और कर्मचारियों को फायर सेफ्टी ट्रेनिंग दी जाए. सबसे जरूरी बात. फायर सेफ्टी को सिर्फ कागज पर मौजूद व्यवस्था नहीं, बल्कि मौके पर काम करने वाली व्यवस्था बनाना होगा.
आग बुझ गई तो क्या खतरा भी खत्म हो गया?
पुरोहित जी का कटला करीब तीन शताब्दियों से जयपुर की व्यापारिक पहचान का हिस्सा रहा है. इसकी ऐतिहासिक विरासत जितनी महत्वपूर्ण है, आज इसकी सुरक्षा उतनी ही बड़ी चुनौती है. गुरुवार की आग ने एक बार फिर दिखाया कि पुराने शहर के संकरे बाजार में आग लगने पर सिर्फ दमकल की गाड़ी भेज देना पर्याप्त नहीं है. दमकल वहां कितनी जल्दी पहुंच सकती है, पानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, रास्ते कितने खुले हैं और फायर सेफ्टी उपकरण वास्तव में काम करते हैं या नहीं—यही किसी बाजार की असली सुरक्षा तय करते हैं. और यही वजह है कि पुरोहित जी के कटला की इस आग के बाद सबसे बड़ा सवाल सिर्फ “आग कैसे लगी?” नहीं है.
बड़ा सवाल यह है...
“अगर कल फिर ऐसी आग लगी, तो क्या व्यवस्था उसे पहले से बेहतर तरीके से संभाल पाएगी?”
इसका जवाब सिर्फ एक जांच रिपोर्ट नहीं, बल्कि फायर सेफ्टी ऑडिट, अतिक्रमण नियंत्रण, सुरक्षित रास्तों और नियमित निगरानी की जमीन पर होने वाली कार्रवाई से मिलेगा.