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Jaipur News: जयपुर में किडनी स्टोन की एक सामान्य प्रक्रिया के बाद 21 वर्षीय युवक की हालत गंभीर हो गई. दूसरे अस्पताल में किडनी स्टोन के इलाज के लिए युवक की PCNL (पर्क्यूटेनियस नेफ्रोलिथोटॉमी) प्रक्रिया की गई थी. इसके बाद उसे लगातार पेशाब में काफी खून आने लगा. रक्तस्राव ज्यादा होने के कारण मामला गंभीर हो गया और मरीज को इलाज के लिए बॉम्बे हॉस्पिटल जयपुर लाया गया.
यूरोलॉजिस्ट ने इंटरवेंशनल विशेषज्ञ को किया रेफर
बॉम्बे हॉस्पिटल जयपुर में मरीज की जांच सीनियर यूरोलॉजिस्ट डॉ. अंकित कयाल ने की. लगातार हो रहे रक्तस्राव को देखते हुए उन्होंने मामले को सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सौम्यता शर्मा को रैफर किया. मरीज की स्थिति को देखते हुए बिना देरी किए आगे की प्रक्रिया शुरू की गई.
डॉ. सौम्यता शर्मा ने तत्काल रीनल DSA (डिजिटल सब्ट्रैक्शन एंजियोग्राफी) की. इस जांच के दौरान किडनी की रक्त वाहिकाओं की बारीकी से जांच की गई. इसमें सामने आया कि किडनी की तीन अलग-अलग रक्त वाहिकाओं से ब्लीडिंग हो रही थी.

तीन जगहों से हो रहा था रक्तस्राव
जांच में तीन अलग-अलग ब्लीडिंग पॉइंट मिलने के बाद इंटरवेंशनल प्रक्रिया के जरिए रक्तस्राव को नियंत्रित करने का फैसला लिया गया. डॉ. सौम्यता शर्मा के अनुसार, ब्लीडिंग वाली दो रक्त वाहिकाओं को कॉइलिंग तकनीक की मदद से बंद किया गया. वहीं तीसरे और अपेक्षाकृत छोटे ब्लीडिंग पॉइंट को PVA पार्टिकल एम्बोलाइजेशन के जरिए नियंत्रित किया गया.
इस तकनीक में कैथेटर की मदद से शरीर के अंदर उस विशेष रक्त वाहिका तक पहुंचा जाता है, जहां से रक्तस्राव हो रहा होता है. इसके बाद उसी स्थान को बंद कर ब्लीडिंग को रोकने का प्रयास किया जाता है.
बड़ी सर्जरी के बिना नियंत्रित हुई ब्लीडिंग
इस इंटरवेंशनल प्रक्रिया का एक अहम फायदा यह रहा कि गंभीर रक्तस्राव को बड़ी सर्जरी किए बिना नियंत्रित किया जा सका. प्रक्रिया के दौरान ब्लीडिंग वाली रक्त वाहिकाओं को लक्षित किया गया, जिससे आसपास के स्वस्थ किडनी टिश्यू को बचाते हुए रक्तस्राव रोकने में मदद मिली.
इलाज के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार आया. प्रक्रिया के करीब 48 घंटे के भीतर पेशाब में खून आना पूरी तरह बंद हो गया.
मल्टी स्पेशियलिटी टीम के तालमेल से मिला फायदा
इस मामले में यूरोलॉजी और इंटरवेंशनल टीम के बीच बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण रहा. मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल रीनल DSA और उसके बाद जरूरी एम्बोलाइजेशन प्रक्रिया की गई. समय पर किए गए इस इमरजेंसी इंटरवेंशन से किडनी से हो रही लगातार ब्लीडिंग को नियंत्रित किया जा सका और मरीज की समस्या ठीक हुई.