100 करोड़ की महाठगी का 'मैथमैटिक्स': 2.25 करोड़ ही बरामद, क्या है बाकी 97 करोड़ का क्रिप्टो कनेक्शन?
Rajasthan News: जयपुर में प्रॉपर्टी और USDT में निवेश के नाम पर करीब 100 करोड़ रुपये की कथित ठगी का खुलासा हुआ है. सोडाला पुलिस ने मुख्य आरोपी मोहित कालोया और सहयोगी घनश्याम कांडेल को गिरफ्तार किया है. मर्सिडीज-बाइक बरामद कर 1 करोड़ की FD फ्रीज की गई.
Rajasthan Crime: जयपुर शहर पुलिस ने निवेश के नाम पर करीब 100 करोड़ रुपये की कथित ठगी के मामले में मुख्य आरोपी मोहित कालोया और उसके सहयोगी घनश्याम कांडेल को गिरफ्तार किया है. मामला सोडाला थाने में दर्ज हुआ था. आरोप है कि लोगों को प्रॉपर्टी और USDT में निवेश के नाम पर कुछ ही समय में भारी मुनाफा देने का झांसा देकर रकम ली गई. पुलिस ने आरोपियों के पास से ठगी की रकम से खरीदी गई करीब 1.25 करोड़ रुपये की मर्सिडीज कार और ट्राइंफ बाइक बरामद की है. इसके अलावा करीब एक करोड़ रुपये की एफडी भी फ्रीज कराई गई है. दोनों आरोपियों पर दो-दो हजार रुपये का इनाम घोषित था. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि ठगी की रकम कहां-कहां भेजी गई और इस पूरे नेटवर्क में और कौन लोग शामिल हैं.
भारी मुनाफे का लालच देकर निवेश के नाम पर ठगी
सोडाला थाने में परिवादी ऋषि मेहता ने शिकायत दर्ज कराई थी. उन्होंने पुलिस को बताया कि आरोपियों ने मैसर्स ईजी वे होम्स के नाम से निवेश का भरोसा दिया था. दावा किया गया था कि कुछ ही महीनों में निवेश की गई रकम पर भारी मुनाफा मिलेगा. इस भरोसे में आकर पीड़ित ने 1 करोड़ 55 लाख रुपये चेक के जरिए और 4 करोड़ रुपये नकद दे दिए.
रकम देने के बाद जब भुगतान और मुनाफा मिलने का समय आया तो आरोपियों के मोबाइल फोन बंद मिले. काफी कोशिश के बाद भी संपर्क नहीं हो सका. इसके बाद पीड़ित को निवेश योजना पर शक हुआ और उसने सोडाला थाने में मामला दर्ज कराया.
फर्जी वेबसाइटों के जरिए लोगों को फंसाने का आरोप
मामला दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की. जांच में सामने आया कि निवेश के नाम पर लोगों को आकर्षित करने के लिए कई फर्जी वेबसाइटों का इस्तेमाल किया जा रहा था. इन वेबसाइटों पर निवेश करने और कम समय में मोटा मुनाफा मिलने का भरोसा दिलाया जाता था.
पुलिस के अनुसार, इसी तरीके से लोगों से रकम जुटाई गई. जांच आगे बढ़ने पर पुलिस ने मुख्य आरोपी मोहित कालोया को कालाडेरा इलाके के गुढ़गांव से गिरफ्तार किया. उससे पूछताछ के बाद उसके सहयोगी घनश्याम कांडेल को भी पकड़ा गया. पुलिस अब दोनों से नेटवर्क से जुड़े दूसरे लोगों और पैसों के लेनदेन को लेकर पूछताछ कर रही है.
सीसीटीवी और मुखबिर की सूचना से गिरफ्तारी
आरोपियों तक पहुंचने के लिए पुलिस ने इलाके के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली. इसके साथ ही मुखबिरों से मिली जानकारी को भी जांच में शामिल किया गया. इन दोनों माध्यमों से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने आरोपियों की तलाश की और उन्हें गिरफ्तार किया.
पुलिस का कहना है कि मामले की जांच अभी जारी है. आरोपियों से पूछताछ के दौरान यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि कथित तौर पर ठगी गई करीब 100 करोड़ रुपये की रकम का कितना हिस्सा कहां इस्तेमाल हुआ और बाकी रकम किसके खातों या दूसरे माध्यमों से आगे भेजी गई.
ठगी के पैसों से खरीदी मर्सिडीज और बाइक
पुलिस कार्रवाई के दौरान आरोपियों के पास से करीब 1.25 करोड़ रुपये की मर्सिडीज कार बरामद की गई है. इसके साथ ही एक ट्राइंफ मोटरसाइकिल भी जब्त की गई है. पुलिस के अनुसार, दोनों वाहन कथित तौर पर ठगी की रकम से खरीदे गए थे.
इसके अलावा आरोपियों द्वारा ठगी की राशि से कराई गई करीब एक करोड़ रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट को भी पुलिस ने फ्रीज करवा दिया है. इससे जांच में रकम के इस्तेमाल और उसे सुरक्षित रखने के तरीके को समझने में मदद मिल सकती है.
आरोपियों पर पहले से भी दर्ज हैं मामले
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि गिरफ्तार दोनों आरोपियों के खिलाफ पहले से अलग-अलग थानों में मामले दर्ज हैं. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इन मामलों का इस नेटवर्क से क्या संबंध है और आरोपियों ने इससे पहले भी इसी तरह लोगों को निवेश के नाम पर निशाना बनाया था या नहीं.
जांच में पीड़ितों की संख्या और कथित तौर पर ठगी गई पूरी रकम का भी पता लगाया जा रहा है. पुलिस यह भी देख रही है कि फर्जी वेबसाइटों के जरिए कितने लोगों से संपर्क किया गया और उनसे मिली रकम को किन-किन खातों या माध्यमों से आगे ट्रांसफर किया गया.
अब 100 करोड़ की रकम का 'डिजिटल ट्रेल' खंगाल रही पुलिस
इस तरह के मामलों में सिर्फ नकद या बैंक खाते ही अहम सबूत नहीं होते. कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल फोन में मौजूद चैट, ईमेल, वेबसाइट की जानकारी, बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल लेनदेन से पैसों की पूरी कड़ी का पता लगाया जा सकता है. जयपुर मामले में भी जब्त किए गए डिजिटल उपकरण जांच के लिए अहम हो सकते हैं.
हालांकि, अभी पुलिस की ओर से यह पुष्टि नहीं की गई है कि इस मामले की रकम को हवाला, शेल कंपनियों या क्रिप्टो के जरिए विदेश भेजा गया था. इसलिए इन तरीकों को फिलहाल संभावित जांच के एंगल के तौर पर ही देखा जा सकता है.
शेल कंपनियां क्या होती हैं?
शेल कंपनी का मतलब ऐसी कंपनी से है जिसका इस्तेमाल कई बार असली कारोबारी गतिविधि के बजाय पैसा रखने, लेनदेन करने या कंपनी के असली मालिक की पहचान छिपाने के लिए किया जा सकता है. हर शेल कंपनी गैरकानूनी नहीं होती, लेकिन अपराध से मिले पैसे को छिपाने के लिए इनका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है.
आसान भाषा में समझें तो किसी व्यक्ति के पास अपराध से मिली बड़ी रकम है. वह सीधे अपने खाते में पूरी रकम रखने के बजाय किसी कंपनी के बैंक खाते का इस्तेमाल कर सकता है. अगर उस कंपनी के पीछे असली मालिक की पहचान छिपाई जाए और उसके जरिए कई लेनदेन किए जाएं तो पैसों का असली स्रोत समझना मुश्किल हो सकता है.
FATF यानी Financial Action Task Force के अनुसार, अपराध से मिले पैसे को छिपाने के लिए गुमनाम या जटिल कॉर्पोरेट ढांचे और शेल कंपनियों का गलत इस्तेमाल किया जाता है. कुछ मामलों में अलग-अलग कंपनियों के खातों के जरिए रकम को कई लेयर में घुमाया जाता है, जिससे असली स्रोत तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है.
मनी लॉन्ड्रिंग में कैसे इस्तेमाल होती हैं शेल कंपनियां?
मनी लॉन्ड्रिंग को आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब अपराध से कमाए गए पैसे को इस तरह अलग-अलग लेनदेन में घुमाना है कि वह पैसा सामान्य या वैध कमाई जैसा दिखाई देने लगे.
उदाहरण के तौर पर अपराध से मिली रकम किसी कंपनी के खाते में पहुंचाई जा सकती है. इसके बाद उसे दूसरी कंपनी, किसी कारोबार, फर्जी बिल, लोन या दूसरे लेनदेन के नाम पर आगे भेजा जा सकता है. कई बार अलग-अलग खातों और कंपनियों के बीच रकम घुमाने से पैसों की असली कड़ी छिपाने की कोशिश की जाती है. FATF की रिपोर्ट में भी शेल कंपनियों के कई खातों और अलग-अलग देशों में लेनदेन के जरिए पैसे की परतें बनाने के मामलों का जिक्र है.
यही वजह है कि किसी बड़े वित्तीय अपराध की जांच में पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियां कंपनी के असली मालिक, बैंक खातों, लेनदेन, टैक्स रिकॉर्ड, डिजिटल डिवाइस और दूसरे दस्तावेजों की जांच करती हैं.
कैश से क्रिप्टो और विदेश तक पैसा कैसे पहुंच सकता है?
क्रिप्टोकरेंसी यानी वर्चुअल एसेट का इस्तेमाल भी अपराध से जुड़े पैसे को छिपाने या अलग-अलग जगह ट्रांसफर करने की कोशिश में किया जा सकता है. लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि हर क्रिप्टो लेनदेन गैरकानूनी है. समस्या तब होती है जब अपराध से मिले पैसे को छिपाने या उसकी पहचान मुश्किल बनाने के लिए डिजिटल एसेट का इस्तेमाल किया जाए.
किसी मामले में अगर अपराध की रकम पहले किसी बैंकिंग या दूसरे वित्तीय माध्यम से क्रिप्टो एसेट में बदली जाती है, तो उसके बाद उसे अलग-अलग डिजिटल वॉलेट या दूसरे वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर के जरिए ट्रांसफर करने की कोशिश हो सकती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्चुअल एसेट की सीमा-पार प्रकृति के कारण ऐसे मामलों की जांच में कई देशों की एजेंसियों और वित्तीय संस्थाओं के बीच जानकारी साझा करना जरूरी हो सकता है. FATF ने भी वर्चुअल एसेट से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग जोखिमों और offshore VASPs के दुरुपयोग को लेकर चेतावनी दी है.
हालांकि, इस जयपुर मामले में अभी तक पुलिस ने यह नहीं बताया है कि आरोपियों ने कथित तौर पर ठगी की रकम को क्रिप्टो में बदलकर विदेश भेजा. इसलिए इस मामले में क्रिप्टो या विदेश भेजने की बात को फिलहाल जांच की संभावना के तौर पर ही देखना चाहिए.
पुलिस अब किस-किस एंगल पर कर रही जांच?
करीब 100 करोड़ रुपये की रकम बड़ी होने के कारण पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल कथित तौर पर ठगी गई रकम का पूरा रास्ता पता करना है. पुलिस यह जांच कर रही है कि पैसा किन बैंक खातों में गया, किन लोगों या कंपनियों तक पहुंचा और उससे कौन-कौन सी संपत्तियां खरीदी गईं.
इसके साथ ही फर्जी वेबसाइटों को बनाने और चलाने वाले लोगों, निवेश के नाम पर ग्राहकों से संपर्क करने वालों और पैसों के लेनदेन में मदद करने वाले लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में है. पुलिस आरोपियों से पूछताछ के आधार पर नेटवर्क के दूसरे सदस्यों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है.
फिलहाल मोहित कालोया और घनश्याम कांडेल की गिरफ्तारी, मर्सिडीज और बाइक की बरामदगी तथा एक करोड़ रुपये की एफडी फ्रीज होने के बाद जांच आगे बढ़ रही है. अब इस पूरे मामले में पुलिस की जांच इस बात पर टिकी है कि 100 करोड़ रुपये की कथित ठगी की रकम आखिर किन-किन रास्तों से होकर गुजरी और इस नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे.