Bravery of the Indian Pilot and Israel : इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुले मंच से इस भारतीय पायलट स्मित मच्छार को 'सच्चा हीरो' बताया. लेकिन, इजरायल के लोगों के लिए किसी भारतीय द्वारा अपनी जान पर खेलकर उन्हें बचाने का ये कोई पहला वाकया नहीं है. आसमान में घटे इस घटनाक्रम ने इजरायलियों के जेहन में 100 साल से भी पुरानी एक ऐसी याद को फिर से ताजा कर दिया है, जिसे इजरायल का बच्चा-बच्चा जानता है. आज जब कैप्टन स्मित मच्छार ने इजरायलियों की जान बचाई, तो इजरायल की धरती पर एक बार फिर जोधपुर के उस महान लड़ाके की यादें जीवंत हो उठीं, जिसे इतिहास 'हीरो ऑफ हाइफा' (हाइफा का शूरवीर) के नाम से पूजता है, नाम है मेजर दलपत सिंह.
इतिहास का वो पन्ना जब घोड़ों ने जीती थी तोपों से जंग
आज के इस आधुनिक हीरो की कहानी को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटकर 23 सितंबर 1918 के दिन लौटना होगा. प्रथम विश्व युद्ध अपने चरम पर था. इजरायल का एक प्रमुख तटीय शहर 'हाइफा' उस समय ऑटोमन (तुर्क) साम्राज्य और जर्मन सेना के कब्जे में था. हाइफा पर कब्जा किए बिना मित्र राष्ट्रों की सेनाएं आगे नहीं बढ़ सकती थीं. लेकिन दुश्मन ऊंचाई पर स्थित 'माउंट कार्मेल' पर भारी तोपखानों और मशीनगनों के साथ अभेद्य किलेबंदी करके बैठा था. ब्रिटिश सेना ने इस शहर को आजाद कराने की जिम्मेदारी भारतीय सैनिकों की टुकड़ी को सौंपी, जिसमें मुख्य रूप से जोधपुर लांसर्स और मैसूर लांसर्स शामिल थ.। इस टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे जोधपुर के वीर सपूत मेजर दलपत सिंह. ये युद्ध सैन्य इतिहास के सबसे अकल्पनीय और साहसिक युद्धों में से एक माना जाता है, क्योंकि दुश्मन के पास जहां आधुनिक मशीनगनें और तोपें थीं, वहीं भारतीय सैनिकों के पास सिर्फ उनके घोड़े, तलवारें और भाले थे.
मेजर दलपत सिंह का वो विजयनाद
जब मेजर दलपत सिंह ने देखा कि दुश्मन की गोलियों की बौछार के सामने रुकना मौत को दावत देना है, तो उन्होंने पीछे हटने के बजाय सामने से मौत की आंखों में आंखें डालने का फैसला किया. उन्होंने अपनी 'जोधपुर लांसर्स' को सीधे दुश्मन के तोपखाने पर हमला करने का आदेश दिया. अब आप कल्पना कीजिए - ऊंचाई से बरसती गोलियों और तोप के गोलों के बीच, राजपूताने की मिट्टी के वे शूरवीर अपने घोड़ों पर सवार होकर, हाथों में भाले लिए अंधड़ की तरह आगे बढ़ रहे थे. मेजर दलपत सिंह सबसे आगे थे. उनका ये आत्मघाती लेकिन प्रचंड हमला इतना तेज था कि जर्मन और तुर्क सेना भौचक्की रह गई. वे समझ ही नहीं पाए कि केवल भालों और तलवारों से लैस कोई सेना मशीनगनों को कैसे रौंद सकती है. भारतीय सैनिकों ने दुश्मन की छावनियों में घुसकर उन पर फतह हासिल की. इस भीषण युद्ध में हाइफा शहर तो आजाद हो गया और लगभग 1350 दुश्मन सैनिकों को बंदी बना लिया गया, लेकिन इस जीत की एक बहुत बड़ी कीमत भारत को चुकानी पड़ी. अपने सैनिकों का नेतृत्व करते हुए और दुश्मन को चीरते हुए मेजर दलपत सिंह बुरी तरह घायल हो गए और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए.
इजरायल के दिल में आज भी धड़कते हैं दलपत सिंह
हाइफा का वो युद्ध केवल एक सैन्य जीत नहीं थी. ये इजरायल के लोगों के लिए जीवनदान था. आज भी इजरायल के इतिहास में 23 सितंबर का दिन 'हाइफा दिवस' के रूप में मनाया जाता है. हाइफा शहर के पाठ्यपुस्तकों में मेजर दलपत सिंह की शौर्यगाथा बच्चों को पढ़ाई जाती है. वहां उनके नाम का एक स्मारक है, जहां हर साल इजरायल के नेता और सेना के अधिकारी सिर झुकाकर इस भारतीय शूरवीर को श्रद्धांजलि देते हैं. भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित चौक (जिसका नाम अब तीन मूर्ति हाइफा चौक है) भी इन्हीं रियासतों के सैनिकों की याद में बनाया गया है.
अतीत से वर्तमान का एक गौरवशाली जुड़ाव
आज जब आसमान में उड़ते विमान में 174 लोगों की जान पर बन आई थी, तो इजरायलियों को एक बार फिर वही भारतीय निडरता वाला जज्बा देखने को मिला. 1918 में दलपत सिंह के पास आधुनिक हथियार नहीं थे, केवल अदम्य साहस और एक भाला था. आज 2026 के इस दौर में, लहूलुहान होने के बावजूद कॉकपिट में लड़ रहे कैप्टन स्मित मच्छार के पास अपनी सूझबूझ और भारतीय पुश्तैनी हौसला था. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का उस भारतीय कैप्टन की खुले दिल से प्रशंसा करना, केवल एक हालिया घटना का सम्मान नहीं है. ये उस ऐतिहासिक विश्वास की मुहर है जो इजरायल भारत पर करता है. इजरायल आज केवल एक विमान हादसे के टलने का शुक्रगुजार नहीं है. वो असल में भारत के साथ अपने उस खून के रिश्ते को याद कर रहा है, जिसकी नींव मेजर दलपत सिंह ने अपने प्राणों की आहुति देकर रखी थी और जिसे आज कैप्टन स्मित मच्छार ने अपने खून से सींच कर फिर से हरा कर दिया है.