)
देशभर में दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है. लेकिन राजस्थान के झुंझुनूं जिले के बिसाऊ कस्बे में दशहरे की परंपरा कुछ अलग है. यहां करीब 180 साल से ऐसी रामलीला का मंचन हो रहा है, जिसमें कोई भी कलाकार संवाद नहीं बोलता. इतना ही नहीं, विजयादशमी के दिन रावण का पुतला भी नहीं जलाया जाता. यहां रावण वध की लीला दशहरे के तीन से चार दिन बाद होती है. अपनी इसी खास पहचान के कारण यह आयोजन 'मूक रामलीला' के नाम से प्रसिद्ध है.
बिना संवाद के जीवंत होती है रामायण की कथा
बिसाऊ की मूक रामलीला लगभग 15 दिनों तक चलती है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका मंचन किसी पारंपरिक रंगमंच पर नहीं, बल्कि बाजार के खुले गलियारों में किया जाता है. भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता और हनुमान से लेकर रावण, कुंभकर्ण, मंथरा और कैकेयी जैसे पात्र बिना कुछ बोले अपनी भूमिका निभाते हैं.
कलाकार विशेष मुखौटों के साथ चेहरे के भाव, आंखों की गतिविधियों और शारीरिक मुद्राओं के जरिए रामायण के अलग-अलग प्रसंगों को प्रस्तुत करते हैं. युद्ध के दृश्यों से लेकर भावनात्मक प्रसंगों तक, हर घटना को अभिनय के माध्यम से दर्शकों के सामने जीवंत किया जाता है.
इस पूरी प्रस्तुति में ढोल और नगाड़ों की थाप भी अहम भूमिका निभाती है. इनकी लय के जरिए दृश्यों के भाव, युद्ध का रोमांच और घटनाओं की गंभीरता को उभारा जाता है. कलाकारों की भाव-भंगिमाएं और आंगिक चेष्टाएं इतनी प्रभावशाली होती हैं कि बिना संवाद के भी दर्शक कथा को आसानी से समझ लेते हैं.
दशहरे के बाद क्यों होता है रावण वध?
देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी के दिन रावण दहन किया जाता है, लेकिन बिसाऊ में रामलीला के युद्ध प्रसंगों को क्रमवार प्रस्तुत करने की परंपरा है. विजयादशमी के दिन राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध की शुरुआत और शक्ति प्रदर्शन के दृश्य दिखाए जाते हैं.
इसके बाद खर-दूषण, कुंभकर्ण, नरांतक, अतिकाय और मेघनाद जैसे प्रमुख राक्षस योद्धाओं के वध का मंचन होता है. इन सभी प्रसंगों के बाद भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध की लीला संपन्न की जाती है. दशहरे के करीब तीन से चार दिन बाद होने वाला यह आयोजन शरद पूर्णिमा के आसपास होता है. आयोजन समिति और कस्बेवासियों के अनुसार, रामायण के युद्ध प्रसंगों को विस्तार और क्रमबद्ध तरीके से दिखाने के लिए यह परंपरा लंबे समय से निभाई जा रही है.
देश-विदेश से पहुंचते हैं दर्शक
करीब 180 वर्ष पुरानी यह परंपरा आज भी अपनी मौलिकता बनाए हुए है. मूक रामलीला और दशहरे के बाद होने वाले रावण वध को देखने के लिए शेखावाटी सहित राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों से लोग बिसाऊ पहुंचते हैं. देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले प्रवासी और विदेशी पर्यटक भी इस आयोजन के प्रति आकर्षित होते हैं.
आधुनिक दौर में जब धार्मिक आयोजनों में तकनीक और भव्य मंच सज्जा का इस्तेमाल बढ़ रहा है, तब बिसाऊ की मूक रामलीला अभिनय, हाव-भाव और ढोल-नगाड़ों की थाप के सहारे अपनी अलग पहचान बनाए हुए है. यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ शेखावाटी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही लोककला का भी अनूठा उदाहरण है.
Reporter: Sandep Kedia