वोट के वक्त 'नागरिक', पानी के वक्त 'अवैध' ? बाड़मेर की वो बस्ती जहां पाइपलाइन पंक्चर कर बुझाई जा रही प्यास
बाड़मेर की शरणार्थी बस्ती में बदहाली चरम पर है. यहां रह रहे सैंकड़ों परिवार , पानी के लिए आधी रात तक जागते हैं. साल 1971 में पाकिस्तान से जान बचाकर आए ये परिवार अब अपने ही देश में बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे है.
सरहद पार पाकिस्तान से जान बचाकर हिंदुस्तान आए परिवारों ने कभी सोचा भी नहीं होगा, कि जिस देश को उन्होंने अपना वतन बनाया, वहां उनकी अगली पीढ़ियों को पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा, बाड़मेर की शरणार्थी बस्ती में आज हालात ऐसे हैं कि पानी की सप्लाई अगर आधी रात को होती है तो पूरी बस्ती के लोग नींद छोड़कर बर्तन लेकर पानी भरने पहुंच जाते हैं.
ये केवल पेयजल संकट की कहानी नहीं है, बल्कि पुनर्वास, जमीन के अधिकार और सरकारी तंत्र की जवाबदेही पर बड़ा सवाल है. इस बस्ती में रहने वाले परिवारों का इतिहास 1971 के भारत-पाक युद्ध से जुड़ा है. युद्ध के दौरान पाकिस्तान से विस्थापित होकर बड़ी संख्या में परिवार भारत पहुंचे थे. इन परिवारों ने स्थानीय लोगों से भूखंड खरीदकर अपना आशियाना बनाया. धीरे-धीरे परिवार बढ़े और बस्ती आबाद होती चली गई.
गृह मंत्रालय की 1984-85 की वार्षिक रिपोर्ट में पाकिस्तान से आए विस्थापितों के पुनर्वास का आधिकारिक उल्लेख मिलता है. रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में करीब 8,600 परिवार विस्थापित होकर आए थे. मार्च 1978 में इन परिवारों को भारतीय नागरिकता देने और स्थायी पुनर्वास की प्रक्रिया का फैसला लिया गया था. इसके बावजूद पुनर्वास की चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं.
जिस जमीन पर बसाया घर, उसी पर खड़ा हो गया विवाद
बस्ती की बदहाली के पीछे स्थानीय लोगों की ओर से जमीन का विवाद प्रमुख कारण बताया जा रहा है. उनका कहना है कि जिन भूखंडों को खरीदकर परिवारों ने मकान बनाए, बाद में संबंधित जमीन का खसरा पुलिस फायरिंग रेंज के नाम दर्ज हो गया. इसके बाद बस्ती में सड़क, पानी और अन्य विकास कार्यों को लेकर मुश्किलें बढ़ती चली गईं.
ये सबसे बड़ा सवाल राजस्व रिकॉर्ड और जमीन के वास्तविक स्वामित्व का है. क्या भूखंड खरीदने वाले परिवारों के दस्तावेजों की जांच हुई ? पुलिस फायरिंग रेंज के लिए भूमि आवंटन कब और किस आदेश से हुआ ? क्या बस्ती का पूरा हिस्सा उसी खसरे में आता है या केवल आसपास की जमीन विवादित है ? इन सवालों का जवाब प्रशासन को सार्वजनिक करना चाहिए.
पानी के लिए आधी रात तक जागती बस्ती
पेयजल संकट की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों को पाइपलाइन में अस्थायी व्यवस्था करवानी पड़ी. पाइपलाइन को पंक्चर करवाकर पानी की आपूर्ति का इंतजाम किया गया, ताकि परिवारों को तत्काल राहत मिल सके. लेकिन ये स्थायी समाधान नहीं है. आधी रात को पानी छोड़े जाने पर महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे बर्तन लेकर पहुंचते हैं. पानी भरने की जद्दोजहद में लोगों की रात गुजर जाती है. सवाल है कि आखिर नियमित पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही ?
राजस्थान विधानसभा में फरवरी 2018 में भी पाक विस्थापित परिवारों के पुनर्वास और जमीन से जुड़े मुद्दे उठे थे. सरकार ने पूर्व में जारी परिपत्रों और पात्र परिवारों को राहत देने की प्रक्रिया का उल्लेख किया था. राजस्थान सरकार की 2018 की पुनर्वास नीति में भी पात्र पाक विस्थापितों को आवासीय भूखंड देने का प्रावधान किया गया था.
वोट के वक्त याद आते हैं, बाद में कौन सुध लेता है ?
लोकतंत्र में इन परिवारों का वोट भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी दूसरे नागरिक का. चुनाव आते हैं तो जनप्रतिनिधि इनके दरवाजे तक पहुंचते हैं, लेकिन पानी, सड़क और दूसरी सुविधाओं की बात आते ही बस्ती की आवाज अनसुनी रह जाती है. अब जिला प्रशासन, नगर परिषद, जलदाय विभाग और राजस्व विभाग को संयुक्त रूप से इस मामले की पड़ताल करनी चाहिए. जमीन की स्थिति स्पष्ट हो, पात्र परिवारों के अधिकारों की रक्षा हो और पेयजल की स्थायी व्यवस्था की जाए.
बड़ा सवाल ये है कि 1971 में पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए इन परिवारों को अपने ही देश में सम्मानजनक जीवन और पीने के पानी के लिए आखिर कब तक संघर्ष करना पड़ेगा ? सरहद पर देश के लिए भरोसा लेकर आए इन परिवारों को अब अपने ही शहर में सरकारी व्यवस्था के भरोसे की दरकार है.