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Barmer News: राजस्थान के बाड़मेर आने वाले हर व्यक्ति को शहर से कई किलोमीटर दूर से ही पहाड़ी पर लहराती धर्मध्वजा नजर आने लगती है. दूर से दिखाई देती यह ध्वजा मानो थार की धरती पर बसे बाड़मेर की पहचान और मां के प्रति अटूट आस्था का संदेश देती है. यह बाड़मेर का ऐतिहासिक गढ़ मंदिर है, जहां पहाड़ी की चोटी पर मां जोगमाया का दरबार है, जहां सदियों से श्रद्धालु सिर झुकाते आए हैं.
थार की धरती पर बसा ऐतिहासिक गढ़ मंदिर
थार के रेगिस्तान में बसा बाड़मेर अपनी विशिष्ट भौगोलिक पहचान, ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है. इसी शहर की एक पहाड़ी पर गढ़ मंदिर स्थित है, जिसकी पहचान दूर से नजर आने वाली धर्मध्वजा से भी जुड़ी हुई है. राजस्थान पर्यटन विभाग के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, वर्तमान बाड़मेर शहर की स्थापना साल 1552 में रावत भीमा ने की थी. इसी ऐतिहासिक दौर में पहाड़ी पर गढ़ का निर्माण हुआ, जिसने शहर को एक विशिष्ट पहचान दी.
पहाड़ी की चोटी पर विराजित हैं मां जोगमाया
गढ़ की सबसे ऊंची चोटी पर मां जोगमाया विराजित हैं. श्रद्धालु उन्हें मां जगदंबा के स्वरूप में पूजते हैं. मंदिर की स्थापना की सटीक तारीख और इसके शुरुआती निर्माण को लेकर स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, लेकिन स्थानीय धार्मिक परंपराओं में इस मंदिर का विशेष महत्व है. गढ़ पहाड़ी पर पुराने काल के अवशेष आज भी बीते दौर की याद दिलाते हैं. ये उस समय की कहानी कहते हैं, जब पहाड़ियां सुरक्षा, सत्ता और धार्मिक आस्था के महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करती थीं.
दूर से नजर आती है मंदिर की धर्मध्वजा
बाड़मेर की ओर आने वाले यात्रियों के लिए पहाड़ी पर लहराती धर्मध्वजा एक परिचित दृश्य है. शहर से कई किलोमीटर पहले ही नजर आने वाली यह ध्वजा मानो आने वालो का स्वागत करती है. यह केवल कपड़े का एक ध्वज नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के विश्वास और शहर की धार्मिक पहचान का प्रतीक है. बाड़मेर के लोगों के लिए गढ़ मंदिर का महत्व पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है.
सीढ़ियां चढ़कर मां के दरबार में पहुंचते हैं श्रद्धालु
मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को पहाड़ी की सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. कोई परिवार की सुख-समृद्धि की कामना लेकर आता है, कोई अपनी मनोकामना के साथ मां के दरबार में माथा टेकता है, तो कोई जीवन की कठिनाइयों के बीच मानसिक संबल पाने के लिए यहां पहुंचता है. गढ़ की इसी पहाड़ी पर मां नागणेची का मंदिर भी स्थित है. ये दोनों धार्मिक स्थल बाड़मेर की आस्था और स्थानीय परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
नवरात्रि में बढ़ जाता है देवी उपासना का महत्व
नवरात्रि जैसे पर्वों पर देवी उपासना का विशेष महत्व रहता है. पूजा, दर्शन और धार्मिक आयोजनों के बीच यहां की परंपराएं जीवंत दिखाई देती हैं. समय बदलता रहा, पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन मां के प्रति श्रद्धा की यह परंपरा आज भी कायम है.
1965 और 1971 के युद्धों से जुड़ी हैं जनश्रुतियां
बाड़मेर सीमावर्ती राजस्थान का वह हिस्सा है, जिसने भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धों और सुरक्षा चुनौतियों का दौर भी देखा है. गढ़ मंदिर को लेकर वर्ष 1965 और 1971 के युद्धों से जुड़ी कई जनश्रुतियां स्थानीय स्तर पर प्रचलित हैं. इन कहानियों में मंदिर और मां की कृपा को लोगों की सुरक्षा तथा विश्वास से जोड़कर देखा जाता है. आज गढ़ मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि बाड़मेर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
पुराने गढ़ के अवशेष और धर्मध्वजा बनाते हैं खास पहचान
एक तरफ पुराने गढ़ के अवशेष हैं, दूसरी तरफ पहाड़ी पर लहराती धर्मध्वजा. नीचे बसा शहर और ऊपर मां का दरबार , यह दृश्य बाड़मेर की पहचान को एक अलग स्वरूप देता है. किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों, सड़कों और विकास से नहीं बनती. उसकी पहचान उन परंपराओं से भी बनती है, जिन्हें लोग पीढ़ियों तक सहेजकर रखते हैं.
बाड़मेर की विरासत और आस्था का प्रतीक है गढ़ मंदिर
बाड़मेर का गढ़ मंदिर इसी विरासत का प्रतीक है. दूर से नजर आने वाली धर्मध्वजा, पहाड़ी पर विराजित मां जोगमाया और श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास. इन सबमें समाहित है थार की धरती की एक अनूठी कहानी. गढ़ मंदिर बाड़मेर की पहचान, इतिहास की विरासत और आस्था का अटूट केंद्र है.
Report-Durag singh Rajpurohit