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भुजिया-मिठाई के बाद अब मौली से पहचान बना रहा बीकानेर: 10 हजार से खड़ा हुआ कारोबार, 100 लोगों को मिला रोजगार

बीकानेर की कृष्णा खत्री ने साल 2012 में महज 10 हजार रुपये से घर पर मौली बनाने का कारोबार शुरू किया था. आज उनकी मेहनत से यह कारोबार देशभर में पहचान बना चुका है और करीब 100 लोगों को रोजगार मिल रहा है. दिवाली से छठ तक मौली की मांग बढ़ जाती है.

Written By Aman Singh
Published: Nov 01, 2026, 10:18 PM IST | Updated: Nov 01, 2026, 10:50 PM IST
Image Credit: Zee Media
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राजस्थान के बीकानेर का नाम आते ही जुबां पर भुजिया और मिठाई का स्वाद आ जाता है, लेकिन अब इस शहर की पहचान में एक और चीज जुड़ रही है. आस्था का धागा... जी हां, जिस मौली या कलावा को हम पूजा-पाठ और हर मांगलिक अवसर पर कलाई में बांधते हैं वही धागा अब बीकानेर से निकलकर देशभर की कलाई तक पहुंच रहा है.

10 हजार रुपये से शुरू हुआ कारोबार

खास बात यह है कि इस कारोबार की शुरुआत एक महिला ने महज 10 हजार रुपये से अपने घर से की थी और आज उनका उद्यम करीब 100 लोगों की रोजी-रोटी का जरिया बन चुका है. यह कहानी है परंपरागत हुनर, महिला उद्यमशीलता और छोटे से सपने के बड़े कारोबार में बदलने की.

किसी की कलाई पर बंधा यह लाल-पीला धागा देखने में भले ही छोटा हो, लेकिन सनातन परंपरा में इसका महत्व बेहद खास है. पूजा हो, हवन हो, विवाह हो या कोई भी मांगलिक कार्य कलावा यानी मौली के बिना धार्मिक रस्में अधूरी मानी जाती हैं. इसी आस्था को बीकानेर के हुनरमंद हाथ अब कारोबार की नई पहचान दे रहे हैं.

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दिवाली से छठ तक बढ़ जाती है मौली की मांग

दिवाली से लेकर छठ तक त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के चलते मौली की मांग बढ़ जाती है. ऐसे में बीकानेर की इस यूनिट में इन दिनों काम की रफ्तार तेज है. मशीनों के दौर में भी यहां परंपरागत हुनर और मेहनत का मेल देखने को मिल रहा है. धागों को तैयार करने से लेकर उन्हें अलग-अलग रूप देने तक, हर चरण में बड़ी संख्या में लोग जुटे हैं.

इस कारोबार की कहानी भी किसी प्रेरणा से कम नहीं, कृष्णा खत्री ने बताया कि उन्होंने साल 2012 में महज 10 हजार रुपये की पूंजी से इस काम की शुरुआत की थी. शुरुआत छोटी थी, लेकिन सपना बड़ा था. धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और बीकानेर में तैयार होने वाली उनकी मौली आज देश के कई राज्यों तक पहुंच रही है.

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स्थानीय हुनर को मिल रही नई पहचान

कृष्णा खत्री के मुताबिक, आज उनका यह कारोबार करीब 100 लोगों को रोजगार दे रहा है. यानी एक छोटे से घरेलू प्रयास ने न केवल बाजार में अपनी जगह बनाई, बल्कि कई परिवारों की आजीविका से भी जुड़ गया. लोकल फॉर वोकल की भावना के साथ आगे बढ़ता यह उद्योग स्थानीय हुनर और महिला उद्यमशीलता की मिसाल पेश कर रहा है. एक तरफ आधुनिक मशीनें उत्पादन को रफ्तार दे रही हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ा यह धागा आज भी लोगों की आस्था का हिस्सा बना हुआ है.

बीकानेर की पहचान अब सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं रही. यहां का बना आस्था का धागा भी देशभर में पहुंच रहा है. महज 10 हजार रुपये से शुरू हुआ यह सफर बताता है कि छोटे से विचार, मेहनत और हौसले के दम पर स्थानीय हुनर को राष्ट्रीय पहचान दिलाई जा सकती है.

Reporter- Raunak Vyas

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जून 2023 से ज़ी राजस्थान के साथ कार्यरत अमन लगातार अपनी क्रिएटिविटी और प्रोफेशनल स्किल्स के जरिए पाठकों तक तेज, सटीक और भरोसेमंद खबरें पहुंचा रहे हैं. वे उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के रहने वाले हैं, अमन ने जौनपुर से ही अपनी इंटरमीडिएट तक की शिक्षा पूरी की. इसके बाद उन्होंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन किया. डिजिटल पत्रकारिता में गहरी समझ, तेज खबर पकड़ने की क्षमता के कारण अमन सिंह एक उभरते हुए और भरोसेमंद मीडिया प्रोफेशनल के रूप में तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं.
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