ज्यादातर लोगों को लिए सांप का दिख जाना, उनके डर जाने के लिए काफी होता है. लेकिन तिरुमाला की पवित्र पहाड़ियों में एक शख्स ऐसा भी है, जिसके लिए हर सांप की जान बचाना मायने रखता है. आइए आपको मिलवाते हैं भास्कर नायडू से, जिन्हें लोग प्यार से ‘स्नेक नायडू’ कहकर बुलाते हैं. नायडू निडर होकर सांपों को बचाने वाले ऐसे रेस्क्यूअर हैं, जिन्होंने कथित तौर पर बीते तीस सालों में 30 हजार से ज्यादा सांपों की जान बचाई है. भास्कर पहले टीटीडी के वन विभाग में कर्मचारी थे. आगे चलकर उन्होंने अपना पूरा जीवन तिरुमाला और तिरुपति के आसपास सांपों को बचाने और लोगों की सुरक्षा करने के लिए समर्पित कर दिया.
भास्कर नायडू के लिए सांपों को बचाना सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भगवान वेंकटेश्वर की सेवा हैं. भास्कर का यह असाधारण सफर साल 1995 में शुरू हुआ, जब उनका सामना 15 फुट लंबे एक विशाल अजगर से हुआ. शुरुआत में जिस चीज ने उनके मन में डर पैदा किया, वही धीरे-धीरे साहस, करुणा और वन्यजीव संरक्षण के मिशन में बदल गई. समय बीतने के साथ भास्कर ऐसे शख्स बन गए, जिनसे लोग तब संपर्क करते हैं, जब कोई सांप उनके घर, बगीचे या किसी सार्वजनिक जगह पर दिखाई देता है.
सांप नुकसान न पहुंचाने वाला हो या बेहद जहरीला, भास्कर हर रेस्क्यू के दौरान गजब के दृढ़ संकल्प के साथ काम करते हैं. सांप की जान बचाना, इंसानों की सुरक्षा करना और बचाए गए सांप को सुरक्षित उसके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ना ही उनकी जिंदगी का एक मात्र मिशन है. अपने इसी मिशन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की 2022 में उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी.
ड्यूटी के दौरान उन्हें बेहद जहरीले रसेल वाइपर सांप ने काट लिया था, जिससे उनकी हालत गंभीर हो गई थी. तब उन्हें लगातार 11 दिन गहन चिकित्सा निगरानी कक्ष यानी आईसीयू में रहना पड़ा था. ऐसे खौफनाक अनुभव के बाद बहुत से लोग शायद सांपों की सेवा का यह सफर खत्म कर देते. लेकिन भास्कर का हौसला नहीं टूटा. वह स्वस्थ हुए और फिर उसी मिशन में लौट आए, जिसमें उनकी जान तक जाते-जाते बची थी.
जी मीडिया से खास बातचीत में भास्कर नायडू ने सांपों को बचाने के लिए जीवन समर्पित करने के पीछे की प्रेरणादायक कहानी साझा की.
जी मीडिया ने उनके असाधारण सेवाभाव को करीब से देखते समझते हुए अपने कैमरे में भी कैद किया. काम के प्रति उनके समर्पण को देखकर ये पता चलता है कि ऐसा करना हर किसी के बस की बात नहीं है.
उनके हर रेस्क्यू के पीछे एक गहरा विश्वास छिपा है. भास्कर मानते हैं कि उनकी ये सेवा भगवान तिरुपति बालाजी के आशीर्वाद से ही संभव हो पाती है.
नायडू का मानना है कि शेषाचलम के जंगलों में सांपों की रक्षा करना और तिरुमाला आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा करना, दोनों ही यहां के अधिष्ठाता भगवान की सेवा के रूप हैं.
भास्कर नायडू के लिए तिरुमाला की पवित्र पहाड़ियां सिर्फ काम करने की जगह नहीं हैं. इसलिए वह अपने काम को एक आध्यात्मिक जिम्मेदारी समझकर पूरा करते हैं.
उनके लिए हर सफल रेस्क्यू भगवान वेंकटेश्वर की सेवा करने का एक अवसर है. उनका विश्वास है कि सांप के जानलेवा हमले का सामना करने के बाद भी काम जारी रखने की ताकत उन्हें भगवान के आशीर्वाद से ही मिलती है.
उनका संदेश है कि सांप भी हमारे इकोसिस्टम का अहम हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें मारने के बजाय संरक्षण दिया जाना चाहिए.
भास्कर नायडू ने कहा, 'मैंने जो कुछ भी हासिल किया है, वो भगवान बालाजी के आशीर्वाद से ही संभव हुआ है. इसलिए आखिरी सांस तक भगवान बालाजी की इसी तरह सेवा करता रहूंगा.'
भास्कर नायडू के लिए ये सिर्फ उनकी जिंदगी के उस सफर को बयां करने के लिए काफी हैं, जो दूसरों की जान बचाने के लिए समर्पित रही है. भगवान वेंकटेश्वर की धरती जिसे भूलोक का बैकुंठ कहा जाता है. लाखों लोग उनका आशीर्वाद लेने जहां पहुंचते हैं, वहीं एक शख्स अपनी तरह से अनोखी भक्तिभाव में डूबकर काम कर रहा है. नायडू उस जीव को जीने का मौका दे रहे हैं, जिनसे इंसान सबसे ज्यादा डरते हैं.
टीटीडी के अतिरिक्त कार्यकारी अधिकारी वेंकैया चौधरी ने नायडू की कड़ी मेहनत को पहचाना. इसके बाद उन्हें टीटीडी की ओर से नियमित वेतन और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं दी गईं. तिरुपति में आने वाले श्रद्धालु हो यां तिरुमाला के निवासी, सभी नायडू के सेवा भाव की सराहना कर रहे हैं.