App

'न्यायालय' नहीं, ये 'अदालती' व्यवस्था है... यहां न्याय भी पैसे वालों के लिए: रिटायर्ड जस्टिस ढींगरा

अफजल गुरु को मौत की सजा सुनाने वाले रिटायर्ड जस्टिस एस.एन. ढींगरा ने भारतीय न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं. Zee News की स्‍पेशल इंटरव्‍यू सीरीज में भारतीय न्‍याय व्‍यवस्‍था, VVIP के लिए रात में कोर्ट खुलने, पैसे और पावर, तारीख पर तारीख, कॉलेजियम और जजों की जवाबदेही जैसे कई मुद्दों पर जानें जस्टिस ढींगरा से की गई बातचीत.

'न्यायालय' नहीं, ये 'अदालती' व्यवस्था है... यहां न्याय भी पैसे वालों के लिए: रिटायर्ड जस्टिस ढींगरा

इन्‍हें 'न्यायालय' न कहें, यहां न्याय नहीं मिलता, ये 'अदालती व्‍यवस्‍था' है...ये बात किसी आम आदमी ने नहीं, बल्कि दिल्‍ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस ने कही है. जिन्‍होंने अपनी जिंदगी के कई साल इसी सिस्‍टम में गुजारे हैं. भारत की संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को मौत की सजा सुनाने वाले रिटायर्ड जस्टिस एस.एन. ढींगरा ने भारतीय न्याय व्यवस्था पर कई बेहद तीखी टिप्पणियां की हैं. Zee News से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि देश की व्यवस्था को 'न्याय व्यवस्था' कहना ही गलत है, क्योंकि यहां न्याय नहीं मिलता बल्कि अदालती प्रक्रिया चलती है. ये सिस्‍टम पैसे वालों के लिए ही है, आम आदमी की जिंदगी तो कोर्ट के चक्‍कर लगाने में गुजर जाती है.

जस्टिस ढींगरा ने VVIP मामलों में आधी रात को अदालत खुलने, अमीरों को मिलने वाली कथित प्राथमिकता, तारीख पर तारीख, कॉलेजियम सिस्टम, जजों की नियुक्ति और जवाबदेही जैसे कई मुद्दों पर भी बेबाक राय रखी. यहां पढ़ें उनसे की गई विस्‍तार से बातचीत.

श्रद्धा जैन - मेरा आपसे पहला सवाल है कि अफजल गुरु को जिस दिन आपने फांसी की सजा सुनाई, उस दिन आपके दिमाग में क्या चल रहा था?

जस्टिस ढींगरा- उसने उन पाकिस्तानी आतंकियों को लॉजिस्टिक्‍स और यहां रहने की जगह मुहैया कराई थी. जिन्‍होंने देश की संसद पर हमला किया और हमले में कई लोग मारे गए. ऐसे लोगों को कानून में जो सबसे कड़ी सजा है मृत्यु दंड, वो दी ही जानी चाहिए. लिहाजा यह फैसला सुनाते समय मैं पूरी तरह संतुष्‍ट था, मेरे मन में कोई संदेह या डबल थिंकिंग नहीं थी.

श्रद्धा जैन- ये बात बार बार उठती है कि VVIPs के लिए तो रात में कोर्ट खुल जाता है. उनके केस जल्दी लिस्‍टेड हो जाते हैं, जल्दी बेल मिल जाती है, सुनवाई जल्दी हो जाती है. लेकिन आम आदमी सालों तक कोर्ट के चक्‍कर लगाता रहता है. कुछ मामलों में सामने आया है कि 50 से 100 रुपये की चोरी के आरोप के केस 25 से 30 साल तक चले हैं. व्‍यक्ति की पूरी उम्र कोर्ट के चक्‍कर लगाने में ही गुजर जाती है. ऐसा डबल ट्रीटमेंट क्‍यों?

जस्टिस ढींगरा- जब भारत स्वतंत्र हुआ और संविधान बनाया गया तो ये अफसोस और दुर्भाग्य की बात है कि न्याय व्यवस्था के बारे में किसी प्रकार का मंथन ही नहीं हुआ. बस, सीधे तय हो गया कि अंग्रेजों के जमाने से जो चल रहा है उसे चलने दो. आप जांचेंगे तो पाएंगे कि भारतीय संविधान का लगभग 75 फीसदी हिस्‍सा भारत सरकार अधिनियम 1935 (Government of India Act 1935) का कॉपी है. 
संविधान सभा की बहस में ये कहा गया था कि हमने ऐसा संविधान बनाया है जो हमारे वर्तमान ढांचे में फिट हो जाए.

आप सोचिए उस समय हमारा ढांचा क्या था? अंग्रेजी व्यवस्था चल रही थी. अंग्रेजों ने जो कानून लागू किए थे, वही चल रहे थे और हमने संविधान बनाया कि वही व्यवस्था आगे भी चालू रहे.

जहां तक बात न्यायालयों की है तो मुझे लगता है कि उन्‍हें न्यायालय तो कहना ही नहीं चाहिए, क्योंकि उनमें न्याय तो होता ही नहीं है. मैं इस व्यवस्था को अदालती व्यवस्था मानता हूं, न्याय व्यवस्था नहीं मानता. यहां अदालतें लगती हैं जो कॉमन लॉ सिस्‍टम के हिसाब से काम करती है. वहां न्यायाधीश एक अंपायर की तरह बैठता है और दोनों तरफ की पार्टियां गवाही देती हैं. न्यायाधीश को ये अधिकार नहीं है कि वो अपनी तरफ से कहे कि नहीं, इस गवाह को लाओ. तो ये व्यवस्था न्याय के लिए बनी ही नहीं है.

 

श्रद्धा जैन - ये गंभीर मुद्दा है, आपने सिस्‍टम की खामियों को इतने सालों तक करीब से देखा है, आपको नहीं लगता कि आजादी मिले हुए 80 साल हो गए हैं. इतने सालों में जो बदलाव लाने चाहिए थे, उनके लिए क्‍यों प्रयास नहीं किए गए? न्‍यायाधीशों ने ही क्‍यों इस दिशा में कोशिश नहीं की?

जस्टिस ढींगरा- दो इंस्‍टीट्यूशन हैं जो बदलाव ला सकते हैं. पहला संसद और दूसरा न्‍यायाधीश. संसद का ये कर्तव्य बनता है कि यदि न्याय  व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है, लोगों को समय पर न्‍याय नहीं मिल पा रहा है. वे सालों तक इस अदालती व्यवस्था में एड़ियां घिस रहे हैं, दादा का केस पोता लड़ रहा है, तो उन्‍हें इसमें बदलाव लाने चाहिए.

आप कह रही हैं न्यायाधीशों ने बदलाव क्‍यों नहीं किए? हमारे न्यायाधीश कौन हैं? उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के वकीलों में से चुने हुए लोग ही न्‍यायाधीश हैं. ये वो लोग हैं जिन्होंने इस न्याय व्यवस्था का बेड़ा गर्क कर रखा है. आज हमारी सारी न्याय व्यवस्था वकील आधारित है. वकील आएगा तो अदालत चलेगी, बहस होगी. न्यायाधीश के अंदर इतना साहस नहीं है कि वो कहे कि वकील आए या ना आए, ये केस आगे चलेगा.

ये साहस तो हमारे सुप्रीम कोर्ट के जजों में भी नहीं है. वहां भी यदि वकील ना आए तो जज फाइल पटक के चले जाते हैं कि जब वकील आए तो मुझे बुला लेना. तो आप नीचे की अदालतों से क्या उम्मीद करते हैं? ये जो तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख है...इसका मुख्य कारण यही है कि हमारे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट नीचे के न्यायालयों को काम ही नहीं करने देते. आप तारीख नहीं देंगे तो वकील ऊपर जाकर हाई कोर्ट से तारीख ले आएंगे. हाई कोर्ट में अगर तारीख नहीं मिलेगी तो सुप्रीम कोर्ट से ले आएंगे.

एक बार इस सिस्‍टम को खत्‍म करने की कोशिश साल 1976 में हुई थी. तब हमारी संसद ने कानून बनाया कि वकील का किसी दूसरी कोर्ट में व्यस्त होना अगली तारीख देने का कोई कारण नहीं है. ये भी कानून बना कि किसी भी पार्टी को पूरे केस में तीन से ज्यादा तारीखें नहीं दी जाएंगी, लेकिन ये लागू ही नहीं हो पाया.

इसके पीछे तर्क दिया गया, ''Heaven will not fall if a date has been given.'' यानी कि यदि आगे की तारीख दे दी गई तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा. अरे! आसमान तो पहले टूट पड़ा है. कई केस ऐसे हैं जो 3 तारीख तो छोड़िए जिनमें 100-100 बार तारीखें आगे बढ़ती हैं और नतीजे नहीं आते.

अभी भी जो नई CRPC बनाई है, उसके अंदर ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि जो जज 3 से ज्‍यादा तारीखें देता है या तय समय में चार्ज फ्रेम नहीं कर पाता है तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई हो.

श्रद्धा जैन - आपको क्या लगता है कि इन सब चीजों को लागू करने के लिए क्या-क्या होना चाहिए?

जस्टिस ढींगरा - पहली बात तो नियम स्पष्ट होने चाहिए कि यदि समय पर काम न हो तो कौन जिम्‍मेदार होगा? जबकि जिम्‍मेदारी तय करनी चाहिए. जजों में ऐरोगेंस है कि मैं हाई कोर्ट का जज हूं या सुप्रीम कोर्ट का जज हूं तो मैं कुछ भी कर सकता हूं. ये बहुत खतरनाक चीज है.

इसी के कारण अमीर आदमी के लिए रात को 12:00 बजे कोर्ट लग जाता है. ये सब सुप्रीम कोर्ट में ही होता, नीचे की अदालतों में ऐसा नहीं होता क्‍यों? क्योंकि वहां आम आदमी जाता है, उसके पास पैसा नहीं है.

साफ बात है कि यदि आपके पास पैसा है तो आप सुप्रीम कोर्ट के जजों को मजिस्‍ट्रेट में कंवर्ट कर सकते हैं. बस, आपके पास पैसा और पॉवर होनी चाहिए. ऐसे कई उदाहरण हैं जब अमीर लोगों के लिए छुट्टी के दिन भी सुप्रीम कोर्ट खोले गए, आधी रात को कोर्ट लगा और उन्‍हें जमानतें दी गईं. पैसे वाले लोग सुप्रीम कोर्ट में आते हैं कि ये केस जल्‍दी कर दो तो उसकी सुनवाई जल्‍दी होने लगती है. ऐसा क्‍यों, उसे भी लाइन में लगाइए. लेकिन ऐसा नहीं है, ये सिस्‍टम उसी के लिए काम करता है, जिसके पास पैसा है.

श्रद्धा जैन - ऐसे में जस्टिस वर्मा के घर पर लगी आग में बोरों में भरे अधजले नोट बरामद हुए हैं और करप्‍शन को लेकर इस मामले की सोशल मीडिया पर जो आलोचना हो रही है. लोग जजों का मीडिया ट्रायल कर रहे हैं, वह गलत तो नहीं है? इस भ्रष्‍टाचार की जड़ें कहां हैं?

जस्टिस ढींगरा - भ्रष्‍टाचार की जड़ें हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की अपॉइंटमेंट में हैं. जो वकीलों में से होती है और जिसके लिए कोलेजियम बैठता है. जबकि असलियत ये है कि किसी भी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस बनता है तो बार एसोसिएशन को पहले से पता होता है कि किसका नाम जाएगा. ये मेरा अपना अनुभव है. ये सिस्‍टम खत्‍म होना चाहिए कि जज ही जज को अपॉइंट करे.

श्रद्धा जैन - तो इसका हल क्या है?

जस्टिस ढींगरा - NJAC नाम की एक बनाई थी National Judicial Appointment Commission. यह कोलेजियम सिस्‍टम को हटाकर जजों की नियुक्ति के लिए बनाई गई थी, जिसमें जज भी थे, आम आदमी की ओर से भी 2 लोगों को प्रतिनिधित्‍व दिया गया था. कानून मंत्री भी थे. संसद से भी लोग थे. लेकिन उसे काम ही नहीं करने दिया गया. जजों ने कहा कि हम खुद करेंगे. हम किसी और को इंटरफेयर नहीं करने देंगे. ये सिस्‍टम ही गलत है इसकी तारीफ आप जज और वकीलों के मुंह से ही सुनेंगे, आम आदमी से नहीं जो वहां सालों तक चक्‍कर लगा रहा है. वो कभी नहीं कहता कि ये बहुत बढ़िया सिस्‍टम है. हां, राजनेता तारीफ कर सकते हैं क्‍योंकि उनका अपना स्‍वार्थ है. इसका नतीजा आप साफ देख रहे हैं कि लोग सोशल मीडिया पर खुलकर बोल रहे हैं.


श्रद्धा जैन - सोशल मीडिया पर आजकल जजों के नाम लेकर उन पर पर्सनल अटैक किए जा रहे हैं, इसको आप सही मानते हैं या गलत?

जस्टिस ढींगरा - ये लोगों का फ्रस्‍ट्रेशन बाहर निकल रहा है. जजों को यदि कोर्ट में बैठकर कमेंट करने की छूट है तो आम आदमी को भी बोलने की आजादी है.

श्रद्धा जैन - मुकदमों की इस बाढ़ से निपटने के लिए क्‍या करना चाहिए?

जस्टिस ढींगरा- इसके लिए कई बदलाव लाने होंगे, जिसका जवाब 2 मिनट में नहीं दिया जा सकता. लेकिन मौजूदा सिस्‍टम का डिस्‍कंटीन्‍यू करना होगा. इसे हटाकर नया सिस्‍टम लाना होगा. अभी जो कॉमन लॉ सिस्‍टम है इसमें न्‍याय की व्यवस्था है ही नहीं. ये अंग्रेजों का सिस्‍टम था. इस CRPC को बनाने वाले ने कहा था कि मैंने ऐसी CRPC बनाई है कि मेरे 100 मजिस्‍ट्रेट पूरे भारत को काबू कर सकेंगे.

आप ये बताइए कि हमारे देश में उस जज के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है, जो जानबूझकर किसी को अपराधी घोषित करता है या किसी को बरी करता है. उदाहरण के लिए जज ने जजमेंट लिख दिया कि ये मर्डर इस आदमी ने नहीं किया है संदेह का लाभ देकर हम उसे छोड़ रहे हैं. फिर आप उसके खिलाफ कंप्‍लेंट क्‍यों नहीं करते कि सामने वाले ने झूठा केस क्‍यों किया. लेकिन ऐसा एक भी केस नहीं है जिसमें जज ने झूठा केस लगाने वाले को सजा दी हो. इसके लिए एक अलग व्‍यवस्‍था है कि जिस पर झूठा केस हुआ वो अलग से अपने ऊपर केस लगाने वाले के खिलाफ केस करे. यानी कि वो फिर से कोर्ट के चक्‍कर लगाने की नई मुसीबत मोल ले. उस पर सरेआम मुख्‍य गवाह को मार देने के मामले तो आपको छोटे से लेकर बड़े शहर तक हर जगह मिलेंगे.

ऐसे में आम आदमी कहां जाए, क्‍या करे? अब तो बस एक ही तरीका है कि वो या तो विद्रोह करे या जजों को घर से बाहर ना निकलने दे कि पहले मेरा केस निपटाओ.

श्रद्धा जैन - दुनिया में किन देशों में न्‍याय को लेकर क्‍या बेस्‍ट प्रोसेस है जो हमें अपनानी चाहिए?

जस्टिस ढींगरा - सिविल लॉ सिस्‍टम होना चाहिए इसमें जज केस में इंन्‍वॉल्‍व होता है, उसमें पुलिस अपनी मनमानी नहीं कर सकती है. जबकि हमारे यहां की व्‍यवस्‍था वकील आधारित है. लेकिन इसे नहीं बदला जाता है. ऐसा इसलिए है कि अभी इसमें वकीलों को जितना धंधा और जितना पैसा मिलता है शायद दूसरे सिस्‍टम में न मिले. इसीलिए वो इस सिस्‍टम के सपोर्ट में डंडे लेकर खड़े हो जाते हैं.

श्रद्धा जैन - मामलों को जल्‍दी निपटाने, पारदर्शिता बरतने, जवाबदेही तय करने आदि में AI या टेक्‍नॉलाजी कितनी मदद कर सकती है?

जस्टिस ढींगरा - लोग AI का गलत तरीके से इस्‍तेमाल कर रहे हैं, उससे ऑर्ग्‍यूमेंट लिखवा रहे हैं, जिसमें वो कई गलतियां कर देता है. इसके अलावा मामलों की लाइव स्‍ट्रीमिंग से पारदर्शिता आई है, आम आदमी को पता चला है कि कोर्ट में क्‍या होता है. छिपी हुई बातें सामने आई हैं. लेकिन इससे केस को जल्‍दी निपटाने में कोई मदद नहीं मिलेगी. 
 

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

Shraddha Jain

Shraddha Jain

पत्रकारिता में 15 वर्षों का व्यापक अनुभव रखने वाली श्रद्धा जैन वर्तमान में Zee News की नेशनल डिजिटल टीम में बतौर असिस्‍टेंट न्‍यूज एडिटर सक्रिय हैं. जहाँ वे धर्म, ज्योतिष, ग्रह गोचर, अंक शास्‍त्र और वास्तु शास्त्र जैसे विषयों पर अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन और सिम्बॉयसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से क्रिएटिव राइटिंग की पढ़ाई की है. बतौर फोटो जर्नलिस्ट करियर शुरू करने वाली श्रद्धा ने दूरदर्शन, दैनिक भास्कर और चौथी दुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं.12 वर्षों की फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ बनाने के बाद, उन्होंने डिजिटल मीडिया की ओर रुख किया और देश 24*7 जैसे पोर्टल्स में नेतृत्व की भूमिका निभाई. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, वास्तु और हस्तरेखा जैसे विषयों पर गहन अध्ययन और लेखन करते हुए जटिल विषयों को सरल और रोचक भाषा में पाठकों के सामने पेश कर रही हैं.
Read More