तीन दरबार, तीन ऐतिहासिक ऐलान और राजधानी का बदलता ठिकाना; क्या है बुराड़ी के कोरोनेशन पार्क की कहानी?
आज से जंतर-मंतर प्रदर्शन करने वाली जगह नहीं रह गई है. सरकार ने इसकी जगह तीन दूसरी जगहों को प्रदर्शन की तय जगह करार दिया गया है. इसमें उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी का कोरोनेशन पार्क भी शामिल है.
केंद्रीय दिल्ली में मौजूद जंतर-मंतर की सुर्ख दीवारें अब नारों की गूंज और प्रदर्शन की सुगबुगाहट को कभी महसूस नहीं कर पाएंगी. इन लाल पत्थरों को यह कबूल करने में शायद लंबा समय लग जाए कि अब यहां कोई भी शख्स सरकार से सवाल पूछने वाला नहीं आएगा. इन्हीं लाल पत्थरों ने कई बरसों तक सत्ता से सवाल पूछने वाली आवाजों को अपने अंदर समेटे रखा. इन्हीं के सामने किसी ने इंसाफ की गुहार लगाई, तो किसी ने अपने हक के लिए मुट्ठियां उठाईं, लेकिन अब वहां एक अजीब-सी खामोशी उतरने वाली है.
कभी यही जगह किसी आंदोलन की पहली दस्तक बनती थी, जंतर-मंतर की सड़कों ने धरने देखे, नारे सुने, पोस्टर उठते देखे और उन आंखों में उम्मीद भी देखी, जो शायद कहीं और सुनी नहीं गईं, लेकिन अब दिल्ली के इस ऐतिहासिक कोने से विरोध की वह आवाज सुनने को नहीं मिलेगी. सरकार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की लिस्ट से बाहर कर दिया है और दिल्ली के अंदर तीन जगहों को प्रदर्शन के लिए तय कर दिया है. इन तीन जगहों में पुरानी दिल्ली में रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली में CBD ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी मैदान शामिल है. ये तीनों जगहें मध्य दिल्ली में मौजूद जंतर-मंतर से क्रमशः 3 किमी, 13.5 किमी और 44 किमी दूर हैं.
इस खबर में हम आपको बुराड़ी मैदान के बराबर में मौजूद कोरोनेशन पार्क के दिलचस्प इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं. क्योंकि इस मैदान ने भी अपने अंदर कई प्रमुख घटनाओं को समेटा हुआ है. ये वही जगह है, जहां 1877 में महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी घोषित किए जाने से जुड़ा दरबार लगा था. 1903 में राजा एडवर्ड सप्तम की ताजपोशी का जश्न मनाया गया और यही वह ऐतिहासिक मैदान था, जहां 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार के दौरान राजा जॉर्ज पंचम ने ब्रिटिश भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली शफ्ट करने का ऐलान किया था.
कोरोनेशन पार्क उत्तर दिल्ली के बुराड़ी में मौजूद है. यह भैरो परमानंद मार्ग के पास, किंग्सवे कैंप से लगभग 2 किलोमीटर उत्तर की तरफ स्थित है. इसका संबंध ब्रिटिश शासन के दौरान आयोजित तीन ऐतिहासिक दिल्ली दरबारों से है. अंग्रेजी शब्द कोरोनेशन का अर्थ होता है राज्याभिषेक, जबकि दरबार का अर्थ शाही दरबार या औपचारिक सभा होता है. ब्रिटिश भारत में दिल्ली दरबार ऐसे भव्य आयोजन थे, जिनके माध्यम से ब्रिटिश सम्राट की सत्ता और भारतीय रियासतों पर उनकी सर्वोच्चता का प्रदर्शन किया जाता था.
1877 का दिल्ली दरबार
- महारानी विक्टोरिया को भारत की सम्राज्ञी (Empress of India) घोषित किए जाने के मौके पर यह दरबार आयोजित हुआ था.
- आयोजन लॉर्ड लिटन के कार्यकाल में हुआ.
- इस आयोजन में ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत और शाही प्रतिष्ठा का प्रदर्शन देखने को मिला था.
1903 का दिल्ली दरबार
- किंग एडवर्ड सप्तम के ब्रिटिश सम्राट बनने के मौके पर दूसरे दरबार आयाजित हुआ.
- आयोजन लॉर्ड कर्जन ने कराया.
- एडवर्ड सप्तम खुद भारत नहीं आए थे.
- बेहद भव्य समारोह के जरिए ब्रिटिश राज की ताकत का प्रदर्शन किया गया.
1911 का दिल्ली दरबार
- तीसरे दरबार में खुद किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी भारत आए.
- 12 दिसंबर 1911 को यहीं से सबसे ऐतिहासिक घोषणा हुई कि ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित की जाएगी.
- इसी दौरान बंगाल विभाजन को रद्द करने का भी ऐलान हुआ था.
- बाद में दिल्ली के अंदर नई राजधानी के लिए रायसीना हिल को चुना गया और यहीं से नई दिल्ली के निर्माण की शुरुआत हुई.
राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाने का फैसला क्यों लिया गया?
ब्रिटिश शासन के इस फैसले के पीछे कोई एक वजह नहीं थी. इसके पीछे प्रशासनिक सुविधा, राजनीतिक परिस्थितियां, बंगाल में बढ़ता राष्ट्रवादी आंदोलन और दिल्ली का ऐतिहासिक-राजनीतिक महत्व जैसे कई पहलू थे. 18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता का प्रमुख केंद्र कलकत्ता बन गया था. 1858 में भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश क्राउन के हाथों में जाने के बाद भी कलकत्ता केंद्रीय सत्ता का प्रमुख केंद्र बना रहा.
लेकिन कलकत्ता की एक बड़ी प्रशासनिक दिक्कत यह थी कि वहां से एक तरफ बंगाल रियासत का शासन चलाया जाता था, तो दूसरी तरफ पूरे ब्रिटिश भारत की केंद्रीय सरकार भी काम करती थी. इस व्यवस्था में रियासती सरकार और केंद्र की तकत को लेकर तनाव की स्थिति पैदा हो सकती थी. उस समय के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने 1911 में ब्रिटिश सरकार के सामने इस समस्या को उठाया. उनका तर्क था कि भारत की केंद्रीय सरकार का हेडक्वॉर्टर किसी एक रियासती सरकार के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र से अलग होना चाहिए. इसलिए राजधानी बदलने का फैसला सिर्फ किसी नए शहर को चुनने का मामला नहीं था. इसके पीछे केंद्र और प्रांत के प्रशासनिक अधिकारों को अलग करने की जरूरत भी थी.
इसे समझने के लिए 1905 में हुए बंगाल विभाजन को भी समझना चाहिए. दरअसल उस समय के वायसराय लॉर्ड कर्जन थे. उन्हीं के कार्यकाल में बंगाल को विभाजित करने का फैसला लिया गया था. ब्रिटिश सरकार के इस फैसले के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए. स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा और ब्रिटिश शासन के खिलाफ राजनीतिक लामबंदी भी तेज हुई. बंगाल ब्रिटिश शासन के खिलाफ राष्ट्रवादी गतिविधियों का सेंटर बन गया था. ऐसे हालात में ब्रिटिश सरकार के लिए कलकत्ता में बना रहना थोड़ा संवेदनशील भी हो गया था. 12 दिसंबर 1911 को राजधानी बदलने की घोषणा के साथ बंगाल विभाजन को रद्द करने का ऐलान भी किया गया.
हालांकि, सिर्फ यही एक वजह थी ऐसा कहना भी गलत होगा, क्योंकि दिल्ली के ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व भी इस फैसले के पक्ष में हैं. क्योंकि दिल्ली सदियों से अलग-अलग राजवंशों और साम्राज्यों की सत्ता का केंद्र रह चुकी थी. दिल्ली सल्तनत से लेकर मुगल शासन तक, इस शहर ने भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
राजधानी बदलने का ऐलान करने के बाद दिल्ली में जगह चुनने का काम शुरू हुआ है. इसके लिए एक समिति बनाई गई, जिसने अलग-अलग जगहों का आकलन किया. आखिर में आखिरकार रायसीना हिल और उसके आसपास के इलाके को चुना गया. यह क्षेत्र उस समय दिल्ली के पुराने आबादी वाले हिस्से से दक्षिण की ओर था.
नई दिल्ली का नक्शा किसने बनाया और इसके निर्माण में कितना समय लगा?
नई दिल्ली को शहर बनाने का काम दो ब्रिटिश वास्तुकारों को सौंपा गया था, जिनमें सर एडविन लुटियंस और सर हर्बर्ट बेकर थे. एडविन लुटियंस ने नई दिल्ली की नगर योजना और वायसराय के निवास को डिजाइन किया था. जिसे आज राष्ट्रपति भवन भी कहा जाता है. इसके अलावा हर्टबर्ट ने केंद्रीय सचिवालय की इमारतों और नई राजधानी के अन्य महत्वपूर्ण सरकारी भवनों के डिजाइन बनाए थे.
नई दिल्ली की इमारतों को बनाते समय ब्रिटिश, यूरोपीय शैली के साथ-साथ इसमें भारतीय स्थापत्य परंपराओं को भी शामिल किया गया. जैसे कि राष्ट्रपति भवन के अंदर गुंबद पर सांची स्तूप को भी ले सकते हैं. इमारतों में छतरियों, जालियों और छज्जों जैसे भारतीय शैली से जुड़ी चीजों को भी शामिल किया गया है.
दिल्ली को राजधानी बनने में कितना समय लगा?
- 1911: राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा
- 1912: दिल्ली ब्रिटिश भारत की राजधानी बनी
- 1913: नई राजधानी के निर्माण और प्रबंधन के लिए इम्पीरियल दिल्ली कमेटी का गठन; राष्ट्रपति भवन के निर्माण की शुरुआत
- 1931: नई दिल्ली का औपचारिक उद्घाटन