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'मलाई-छाछ' पर भिड़ गए सपा-कांग्रेस के सांसद! UP चुनाव से पहले फिर छिड़ गई 'बड़ा भाई' बनने की जंग?

यूपी चुनाव से पहले 'मलाई-छाछ' बयान पर छिड़ गई सपा-कांग्रेस के सांसदों के बीच रार. सीट शेयरिंग और 'बड़े भाई' की भूमिका को लेकर गरमाई सियासत, पढ़ें गठबंधन में तकरार की पूरी वजह.

Written By Ravindra Pratap Singh
Published: Sep 05, 2026, 06:29 PM IST | Updated: Sep 05, 2026, 07:02 PM IST
Image Credit: (AI Generated Image) कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने 'मलाई कोई और खाए, हमें छाछ मंजूर नहीं' वाला बयान देकर साफ संकेत दे दिया कि कांग्रेस कम सीटों पर समझौता करने के मूड में नहीं है.
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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब 6 महीने पहले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (SP) का गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है, लेकिन सीटों का बंटवारा, नेताओं की बयानबाजी और आपसी तकरार ने इस राह को आसान नहीं रहने दिया है. सहारनपुर के कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और सलेमपुर के सपा सांसद रामाशंकर विद्यार्थी राजभर के बीच सामने आई तल्खी ने गठबंधन के भीतर की खींचतान को उजागर कर दिया है. सवाल यही है कि 'बड़े भाई' बनने की ये लड़ाई कहीं कांग्रेस-सपा की गाड़ी के पहिए न अटका दे.

वहीं अगर हम साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की बात करें तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में इस गठबंधन की करारी शिकस्त हुई थी. समाजवादी पार्टी ने 298 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जिसमें उन्हें मात्र 47 सीटों पर कामयाबी मिली थी जबकि कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे महज 7 सीटों पर जीत हासिल हुई. अब ऐसे में उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच एक बार फिर से बड़ा भाई बनने को लेकर ठन गई है.

2017 में कांग्रेस कमजोर थी तो 105 सीटों पर लड़ी थी...

इस विवाद की शुरुआत 3 सितंबर 2026 को मथुरा में हुए एक कार्यक्रम से हुई. मंच से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सपा के साथ सीट शेयरिंग को लेकर कहा कि कांग्रेस गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने के लिए तैयार है, लेकिन किसी की दया पर नहीं. इमरान ने कहा कि अगर 2027 में बीजेपी को हराना है तो अभी से सीटों का बंटवारा तय करना होगा, नहीं तो बाद में बहुत देर हो जाएगी.

'मलाई कोई और खाए, हमें छाछ मंजूर नहीं'

इसी दौरान कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने 'मलाई कोई और खाए, हमें छाछ मंजूर नहीं' वाला बयान देकर साफ संकेत दे दिया कि कांग्रेस कम सीटों पर समझौता करने के मूड में नहीं है. पार्टी बराबरी के हिस्से की मांग कर रही है. उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का श्रेय राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' को देते हुए कहा कि इस यात्रा ने देश का माहौल बदला और इसका फायदा सपा-कांग्रेस गठबंधन को उत्तर प्रदेश में मिला. इमरान ने 2017 का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि बेहद कमजोर स्थिति के बावजूद उस समय कांग्रेस 105 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. अब कांग्रेस पहले से मजबूत है, इसलिए 2027 में पार्टी की हिस्सेदारी भी उसी हिसाब से तय होनी चाहिए.

दामाद के सपा में जाने से भी बढ़ी तल्खी

इमरान मसूद के दामाद शायान मसूद ने 20 अगस्त 2026 को कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया था. इसे इमरान के लिए निजी और राजनीतिक, दोनों स्तरों पर झटका माना गया. इस पर इमरान ने कहा, 'मेरी बेटी 6 महीने से घर पर बैठी है. उस बाप की हालत क्या होगी जिसकी बेटी अपने घर आकर बैठ जाए. सियासत के लिए किसी का घर बर्बाद करना ठीक नहीं है.' जब उनसे पूछा गया कि क्या वह इसके लिए अखिलेश यादव को जिम्मेदार मानते हैं, तो इमरान ने कहा, 'मैं किसको दोषी ठहराऊं... मैं तो वक्त को दोषी ठहरा रहा हूं.'

'नतीजों का भी विश्लेषण कर लें'- सपा

इमरान मसूद के बयान पर सपा सांसद रामाशंकर राजभर ने भी पलटवार किया. उन्होंने कहा, 'कांग्रेस सीटें लेती है, लेकिन नतीजों की समीक्षा नहीं करती.' राजभर के बयान का सीधा संदेश यही था कि कांग्रेस चुनाव में सीटों की मांग तो करती है, लेकिन नतीजे आने के बाद उनकी जिम्मेदारी लेने से बचती है. इससे पहले भी रामाशंकर राजभर इमरान मसूद पर निशाना साध चुके हैं. उन्होंने इमरान को 'छुट्टभैया' नेता तक बताया था और आरोप लगाया था कि वह असदुद्दीन ओवैसी और पश्चिम बंगाल के नेता हुमायूं कबीर के रास्ते पर चल रहे हैं.

सहारनपुर में भी आमने-सामने आए सपा-कांग्रेस नेता

सपा और कांग्रेस के बीच तनाव सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रहा है. 19 अगस्त 2026 को सहारनपुर में DISHA मीटिंग के दौरान कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और सपा विधायक आशु मलिक के बीच सार्वजनिक झड़प हुई. मामला 'UP के लड़के' या 'UP के लड़ाके' जैसे शब्दों को लेकर शुरू हुआ था, लेकिन इसे दोनों दलों के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान और सीट शेयरिंग के तनाव से जोड़कर देखा गया.

आखिर 'बड़े भाई' बनने की लड़ाई क्यों?

इन तमाम बयानों के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा सीट शेयरिंग का है.

सीटों की लड़ाई:  कांग्रेस 115-120 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, जबकि सपा उसे 70-80 सीटों तक सीमित रखना चाहती है. दोनों दलों की मांग में यही बड़ा अंतर विवाद की सबसे बड़ी वजह है. जुलाई 2026 में इमरान ने अखिलेश यादव को निशाने पर लेते हुए कहा था, 'CM बनना है तो दिल बड़ा करो और अगर गठबंधन करना है तो जमीन पर उतारो, सिर्फ टीवी पर बयानों से काम नहीं चलेगा.' इमरान ने यह भी कहा था कि 2024 में सपा ने कांग्रेस को सिर्फ 17 सीटें दी थीं, जबकि 60 सीटें दी जा सकती थीं.

जीत का श्रेय किसे? : 2024 की लोकसभा जीत का श्रेय भी दोनों दल अपने-अपने तरीके से लेना चाहते हैं. सपा अपने 37 सांसदों के दम पर गठबंधन में अपनी बड़ी भूमिका का दावा करती है, जबकि कांग्रेस राहुल गांधी की लोकप्रियता को अहम मानती है. इमरान का तर्क है कि 2024 में सपा को मिली 37 सीटों के पीछे राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' की भी बड़ी भूमिका थी.

मुस्लिम वोटों पर नजर: इमरान मसूद ने सपा पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप लगाया और कहा कि पार्टी मुस्लिम नेताओं को किनारे कर रही है. वहीं रामाशंकर राजभर ने इमरान पर ऐसे बयान देने का आरोप लगाया, जिनसे बीजेपी को फायदा पहुंच सकता है.

क्या चलेगी सपा-कांग्रेस की गाड़ी?

इमरान मसूद और यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम 150 सीटों तक की मांग कर रहे हैं. कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, पार्टी चाहती है कि उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 50 फीसदी सीटें उसके हिस्से में आएं. पार्टी 115 से 120 सीटों से नीचे जाने के लिए तैयार नहीं है. दूसरी तरफ सपा प्रमुख अखिलेश यादव का कहना है कि गठबंधन का फॉर्मूला 'जीत चाहिए, सीटें नहीं' होगा. यानी सपा का जोर सीटों की संख्या से ज्यादा उन सीटों पर जीत हासिल करने पर है, जहां गठबंधन के उम्मीदवार मजबूत स्थिति में हों.

सपा कांग्रेस को 70-80 सीटों तक सीमित रखना चाहती है. ऐसे में दोनों दलों की मांग के बीच करीब 40 से 70 सीटों का अंतर दिखाई देता है. सपा नेता एमएच खान का कहना है कि चुनाव नजदीक आने दीजिए, सीटों का बंटवारा हो जाएगा. उन्होंने मध्य प्रदेश के फॉर्मूले का हवाला देते हुए कहा कि जिस तरह वहां सीटों का बंटवारा हुआ था, उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी रास्ता निकाला जा सकता है.

गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि, 'यह सिर्फ दो नेताओं की लड़ाई नहीं है, बल्कि सपा-कांग्रेस गठबंधन के अंदर चल रही गहरी कलह की झलक है.' उनका कहना है कि अगर अक्टूबर-नवंबर 2026 तक सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय हो जाता है, तो गठबंधन बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकता है. लेकिन अगर विवाद दिसंबर 2026 तक भी जारी रहा तो गठबंधन की गाड़ी ऐसे ही न्यूट्रल गियर में चलती रह सकती है और चुनाव से पहले बिखरने का खतरा भी पैदा हो सकता है. जितनी देर होगी, दोनों दलों के बीच अविश्वास उतना ही बढ़ेगा और इसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है.

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About the Author

रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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